सामाजिक-समीकरण एवं प्रदर्शन के अनुरूप है 'केंद्रीय मंत्रिमंडल-विस्तार' - Modi cabinet expansion, Irani, Javdekar, Hindi Article



सरकारें कैसे चलती हैं और किस प्रकार मंत्रियों को समय देकर उनकी परफॉरमेंस आंकी जाती है, यह कोई नरेंद्र मोदी से सीखे. अपने कार्यकाल का लगभग आधा समय बीतने के बाद जो मंत्रिमंडल-विस्तार (Modi cabinet expansion) पीएम ने किया है वह न केवल संतुलित दिखता है, बल्कि प्रदर्शन के आधार पर किया गया विस्तार भी नज़र आता है. हालाँकि, पीएम ने आने वाले दिनों में राज्यों के चुनावों को भी ध्यान में रखा है, किन्तु कोई यह आरोप नहीं लगा सकता है कि यह सिर्फ चुनावी-विस्तार ही है, जैसा कि पहले की सरकारों में होता रहा है. पिछले कुछ दिनों से काफी चर्चा थी कि प्रधानमंत्री मोदी अपने मंत्रिमंडल में बहुत  बड़ा फेरबदल करने वाले हैं. तो वहीं पीएम मोदी ने इस बदलाव को विस्तार का नाम देते हुए कहा कि न्यूनतम सरकार और अधिकतम सुशासन के एजेंडे के मुताबिक, फाइलों का तेजी से निपटारा, कारोबार के माहौल को सुगम बनाने, कैबिनेट नोट को अंतिम रूप देने का समय कम करने में और सरकर के काम सुदृढ़ करने में इससे सरलता होगी. 5 जुलाई की सुबह ही अपने मंत्रिमंडल में विस्तार करते हुए नरेन्द्र मोदी ने 19 नए मंत्रियों को शपथ दिलाई, जिनमें शामिल हैं फग्गन सिंह कुलस्ते, अनिल माधव दवे, एसएस अहलुवालिया, रमेश चंदप्पा, राजेन गोहेन, रामदास अठावले, जसवंत सिंह भाभोर, अर्जुनराम मेघवाल, पुरुषोतम रुपाला, अजय टम्टा, महेंद्र नाथ पांडेय, कृष्णा राज, मनसुख भाई मंडविया, अनुप्रिया पटेल, सीआर चौधरी, पीपी चौधरी, सुभाष भामरे और एमजे अकबर. इन 18 मंत्रियों को राज्यमंत्री का पद दिया गया है. जबकि 19वें मंत्री के रूप में प्रकाश जावड़ेकर को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया है. इस दिन शाम तक पता चला कि प्रकाश जावड़ेकर का कद काफी बढ़ा दिया गया है और उसे स्मृति ईरानी की जगह 'मानव संशाधन मंत्रालय (HRD Ministry) जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गयी है. 

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इसके पहले वे केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग के राज्यमंत्री थे और उन्होंने पर्यावरण को विकास कार्यों में बाधा नहीं बनने दिया. आपको याद तो होगा ही कि 2014 के आम चुनाव में किस प्रकार नरेंद्र मोदी पर्यावरण को लेकर 'जयंती टैक्स' की बात किया करते थे. बहरहाल प्रकाश जावड़ेकर का कद बढ़ गया है तो स्मृति ईरानी को 'कपड़ा मंत्रालय' देकर उन्हें नसीहत दी गयी है कि वह विवाद से ज्यादा अपने काम पर ध्यान दिया करें. स्मृति ईरानी को अपेक्षाकृत लो-प्रोफाइल मिनिस्ट्री देकर पीएम ने यह भी इशारा किया है कि उन्हें कोई भी मंत्री काम के आधार पर ही प्रिय या अप्रिय होगा और अगर किसी मंत्री का प्रदर्शन अपेक्षाकृत ठीक नहीं रहता है तो वह उन्हें हटाने से भी परहेज नहीं करेंगे. इसी क्रम में, पांच पुराने कैबिनेट मंत्रियों को  उनके कार्यभार से मुक्त कर दिया गया है, जिनका नाम रामशंकर कठेरिया, निहाल चंद, सांवरलाल जाट, मनसुख वसावा, एमके कुंदेरिया हैं. शिवसेना भी मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर बयान देती रही, किन्तु प्रधानमंत्री उसके दबाव में नहीं झुके, जिससे साफ़ संकेत मिला है कि 'उन्हें सिर्फ और सिर्फ काम' ही प्यारा है, कुछ और नहीं! इस मंत्रिमंडल विस्तार की बात करें तो अनुप्रिया पटेल जोकि अपना दल से और रामदास आठवले आरपीआई से हैं, उन्हें भी इस नए मंत्रिमंडल (Modi cabinet expansion) में शामिल किया गया है, बाकी सभी मंत्री बीजेपी से ही हैं. यह बात सर्वविदित है कि प्रधानमंत्री हमेशा से ही अपने मंत्रिमंडल में काम करने वाले लोगों को चाहते थे. इसीलिए वो बीच-बीच में अपने मंत्रियों का रिपोर्ट-कार्ड मांगते थे और उनके काम का गहन निरीक्षण भी किया करते थे. जाहिर है, उन सभी फीडबैक का ध्यान इस विस्तार में भी नज़र आ रहा है. 

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एक बात गौर करने लायक ये भी है कि नए मंत्रियों को चुनते समय जातिगत, सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को भी बेहद सावधानी से ध्यान में रखा गया है. अगर हम देखें तो दो नए मंत्री- जसवंत सिंह भाभोर, फग्गन सिंह- अनुसूचित जनजाति से हैं, जबकि अजय टम्टा, रामदास आठवले, अर्जुन राम मेघवाल, रमेश चंदप्पा समेत कृष्णा राज पांच मंत्री अनुसूचित जाति से हैं, तो वहीं  एमजे अकबर और एसएस अहलुवालिया को अल्पसंख्यक समुदाय से लिया गया है. जाहिर है, भाजपा में इस बार जो मंत्रिमंडल विस्तार (Modi cabinet expansion) हुआ है, उसमें किसी लॉबिंग की बजाय अमित शाह और नरेंद्र मोदी का अपना दिमाग ही पूरा चला है.  ऐसे में, इस विस्तार से भाजपा को ब्राह्मण-बनियों की पार्टी से आगे की सोच देने की मंशा भी दिखी है, तो महिलाओं को भी बराबरी का अवसर देते हुए अनुप्रिया पटेल और कृष्णा राज को मंत्रिमंडल में जगह दी गयी है. इस मंत्रिमंडल में रविशंकर प्रसाद भी ताकतवर होकर उभरे हैं. दिल्ली के सक्रीय नेता रहे विजय गोयल को भी महत्वपूर्ण प्रोफाइल मिला है और एक तरह से वनवास से उनकी वापसी हुई है, क्योंकि दिल्ली में जब केजरीवाल से मुकाबले की बात हुई थी तब विजय गोयल को साइड करके पहले डॉ. हर्षवर्धन और फिर किरण बेदी को तरजीह दी गयी थी. तब उन्हें राज्यसभा सांसद बनाकर संतोष रखने को कह दिया गया था, जबकि उनकी काबिलियत और वरिष्ठता कहीं ज्यादे थी. कुल मिलाकर इसे एक संतुलित और परफॉर्मेंस-बेस्ड विस्तार कहा जा सकता है और उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे नरेंद्र मोदी और अमित शाह की पकड़ सरकार और पार्टी पर और बढ़ेगी. हालाँकि, आने वाले विधानसभा चुनावों में इस विस्तार का ज़मीनी प्रभाव कितना पड़ेगा, यह जरूर देखने वाली बात होगी.

- मिथिलेश कुमार सिंहनई दिल्ली.



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