प्रशासनिक लापरवाही के साये में दलितों, महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध! Crime Against Oppressed, Women, Hindi Article



अपराध का विषय आज इतना आसान नहीं रह गया है और यदि आज के समाज में कोई सुरक्षित है, तो वह वाकई बहुत ही भाग्यशाली माना जायेगा. साफ़ है कि आज के समाज में सुरक्षा व्यवस्था बहुत बड़ी चिंता का विषय बन चुकी है. कहीं महिलायें असुरक्षित हैं, तो कहीं दलित तो कहीं बच्चे और बुजुर्ग! इसी क्रम में यदि भारत के सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की बात करें, तो वहां मामला और भी गंभीर नज़र आता है. इसके लिए ही आये दिन तमाम सोशल नेटवर्किंग साइटों पर उत्तर प्रदेश प्रशासन का मजाक भी उड़ाया जाता है, किन्तु क्या मजाल जो सुधार आये! मामला सिर्फ उत्तर प्रदेश का ही नहीं है, बल्कि देश के कई हिस्से आपराधिक मानसिकता से ग्रसित (Crime Against Oppressed, Women, Hindi Article) हो चुके हैं और हमारे समाज में दलितों पर तो पहले से ही जुल्म ढाये जाते रहे हैं, जिसके फलस्वरूप हमारे देश ने काफी बुरे परिणाम भी झेले हैं. अफ़सोस की बात तो यह है कि यह सब सहने के बाद भी न तो प्रशासन की सोच और मुस्तैदी में कहीं बदलाव नज़र आता है और न ही नज़र आता है हमारे समाज की सोच में बदलाव! अभी हाल ही में, कानपूर में पुलिस ने दो दलित व्यक्तियों को लूट-पाट के जुर्म में हिरासत में लिया था, जिसमें से एक व्यक्ति की मौत हो गई, वहीं दूसरा व्यक्ति भी गायब हो गया. यह बेहद अजीब वाकया है, क्योंकि पुलिस हिरासत में यदि किसी की तबियत भी ख़राब होती है तो इलाज के लिए उसे हॉस्पिटल भेजा जाता है. ऐसे में थाने में किसी की मौत होना पुलिस के गैर जिम्मेदराना रवैये को ही दर्शाता है. 



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ऐसे ही, आरोपी का पुलिस हिरासत से गायब होने वाली बात बिलकुल भी तर्कसंगत नही है. वैसे भी पुलिस के डंडे ज्यादा बेगुनाहों और कमजोरों पर ही चलते हैं. ऐसे में उनके परिजनों का भी कहना कैसे गलत है कि इस घटना की जिम्मेदार पुलिस ही है. वैसे भी, यह पहला  मामला नही हैं, जिसमें पुलिस प्रशासन की लापरवाही सामने आई हैं और पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया है. हाल ही में बुलंदशहर हाईवे पर हुए दुष्कर्म में भी पुलिस महकमे में कइयों को उनकी अनदेखी के कारण निलंबित किया गया हैं. हालाँकि, सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही दलितों पर अत्याचार नही हो रहा है, बल्कि इसके लिए दूसरी जगहों पर भी कुछ ख़ास बदलाव नहीं नज़र आता है. 2010 में नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन ने दलित पर हो रहे जुर्म की एक रिपोर्ट तैयार किया था, जिसके अनुसार हर तीन घंटे में 10 दलितों के साथ अन्याय (Crime Against Oppressed, Women, Hindi Article) होता है. ऐसे ही यदि महिलाओं की बात करें तो एक दिन में 3 दलित महिलाएं दुष्कर्म का शिकार होती हैं. उसी रिपोर्ट में ही यह भी कहा गया था कि प्रत्येक दिन दो दलितों का घर जलाने के साथ साथ दो को मार भी दिया जाता है. ऐसे ही, 28 फीसदी मामलों में तो पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट लिखना तो दूर, दलितों को अंदर जाने पर भी रोक है. हमें यह मानने में संकोच नहीं होना चाहिए कि सिर्फ यही नहीं, बल्कि मंदिर हो, स्कूल हो या दूसरी सार्वजनिक जगहें हों, कई जगह दलितों को भेदभाव का शिकार होना पड़ता है. ऐसा नही है कि इनके प्रति किसी को सहानुभूति नही है या इनकी आवाज को उठाने वाला कोई नही है. बल्कि, राजनीति में एक से बढ़कर एक दलित नेता हैं, लेकिन इनको अपने स्वार्थ सिद्ध करने के बाद समय मिले तब तो किसी पर ध्यान दें. 




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हालाँकि, संसद में गुजरात की घटना पर आवाज उठी थी और कहा जा रहा है कि इसी गुजरात दलित आंदोलन के कारण वहां की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल को इस्तीफा देना पड़ा. ऐसे तमाम मामलों पर हमारे समाज को संतुलित रूख अपनाना चाहिए और जिस जातिवादी दंश ने हमारे देश को आज तक गरीब बना रखा है, भेदभाव में बाँट रखा है, उससे मुक्त होने की जरूरत है. बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर दलितों को समानता दिलाना चाहते थे, जिसकी वजह से आरक्षण को लागू किया गया. हालाँकि, इससे थोड़ा बहुत ही फर्क पड़ा और इससे बड़ी बात यह है कि अगर हम सच में दलितों या महिलाओं (Crime Against Oppressed, Women, Hindi Article) के प्रति कुछ करना चाहते हैं तो पहले हमें अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है. क्योंकि जब तक उनके प्रति हमारी मानसिकता नही बदलेगी, चाहे जितना भी कानून बन जाय उसका कोई फायदा नही है. सवा अरब आबादी वाले इस देश में करीब-करीब 17 करोड़ दलित हैं और इतनी बड़ी आबादी के साथ अगर आज भी हमारा समाज भेदभाव की मानसिकता से ग्रसित है, तो इसकी जितनी भी आलोचना की जाए कम ही है. आलोचना प्रशासन की भी होनी चाहिए, जो दलितों, महिलाओं के प्रति अपराध पर रोक लगाने की मानसिकता से दूर हैं तो वोट बैंक की खातिर दलितों को अपने हित के लिए इस्तेमाल करने वालों और भड़काने वालों की भी उतनी ही लानत-मलानत की जानी चाहिए.

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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