नीतीश कुमार जी! 'नरभक्षी जानवरों' को खुला न छोड़िये... Shahabuddin, Criminal, Hindi Article, New, Bihar Politics, Nitish Kumar, Laloo Yadav, Public, Fear, Justice, Administration, Jail, Bail, cannibal



आधुनिक लोकतंत्र में 'तंत्र' की छवि का बेहद महत्त्व है, किन्तु दुर्भाग्य से हमारे देश के 'तंत्र' की छवि ही अक्सर धूमिल हो जाती है! कारण, कई होते हैं पर उसका जो परिणाम आता है वह शर्मसार करने के लिए पर्याप्त होता है. हालाँकि, न्यायिक-मामलों में कई बार मीडिया-ट्रायल की भी अति हो जाती है और दबाव में निर्दोषों को भी भुगतना पड़ता है, किन्तु बिहार के बाहुबली-सांसद 'शहाबुद्दीन' के मामले में मीडिया-ट्रायल के बावजूद नतीजा 'ढाक के तीन पात' ही रहा है. इसके साथ-साथ मुख्य मामला कानून का मजाक उड़ाने को लेकर भी है, जिसे आम-ओ-खास हर कोई महसूस कर रहा है, किन्तु बेबश होकर देखने के सिवा वह कर भी क्या सकता है? इस कुख्यात अपराधी-आरोपी और तथाकथित नेता 'शहाबुद्दीन' के आपराधिक कॉकटेल (Shahabuddin, Criminal, Hindi Article, New, Bihar Politics) की पुरानी 'गीत-कहानियों' को छोड़ भी दें तो जेल में इसकी ऐयाशी के तमाम सुबूत गाहे-बगाहे बाहर आते रहे हैं और जब जेल से इसकी रिहाई हुई, तब इसके भारी-भरकम जुलूस ने न केवल बिहार-प्रशासन को मुंह चिढ़ाया, बल्कि देश भर में कानून-व्यवस्था को आइना दिखाने का कार्य किया. 1300 गाड़ियों के लंबे जुलूस में दबंगई दिखलाता शहाबुद्दीन और उसके साथ दर्जनों विधायकों सहित सैकड़ों नेता मानो प्रशासन का मख़ौल उड़ाने में उसका साथ दे रहे थे. हालाँकि, नीतीश कुमार की सीधी आलोचना के कई राजनीतिक कारण हो सकते हैं किन्तु हकीकत तो यही है कि कई दशकों से आपराधिक रिकॉर्ड रखने वाला शहाबुद्दीन खुद को एक बड़े नेता के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है और मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां तमाशा देखने में लगी हुई हैं. न केवल नीतीश कुमार, बल्कि मुस्लिम-यादव समीकरण को साधने वाले लालू यादव को भी शहाबुद्दीन के जेल से छूटने से असहजता हुई होगी (क्योंकि अब वह अपने बच्चों की खातिर राजनीति करने में जुटे हुए हैं), बावजूद इसके कि शहाबुद्दीन ने लालू यादव को अपना नेता बताया है. 


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इस बात में दो राय नहीं है कि पिछले दिनों नीतीश-भाजपा गठबंधन सरकार में नीतीश ने बिहार में अपराध काबू करने हेतु दम-ख़म दिखलाया था, किन्तु लालू-नीतीश गठबंधन में यह पेंच अगर खुला नहीं है तो कहीं न कहीं ढ़ीला अवश्य ही पड़ गया है, वह भी शुरुआत से ही और अगर शहाबुद्दीन जैसों पर बिहार सरकार ने लगाम नहीं लगाई तो कानून-व्यवस्था का पेंच आने वाले दिनों में पूरी तरह खुल सकता है. इसका नमूना शहाबुद्दीन ने निकलते ही दे दिया, जब मुजफ्फरपुर में एनएच स्थित टोल टैक्स प्लाजा पर शहाबुद्दीन और उनके काफिले में शामिल गाड़ियां बगैर टैक्स दिये ही धड़ल्ले से निकलीं. समाचारों में आयी जानकारी के अनुसार, गाड़ियों की संख्या कितनी थी इसका अंदाजा टोल प्लाजा के कर्मचारी भी नहीं लगा सके और फिर शहाबुद्दीन जैसों से टैक्स वसूलने की टोल प्लाजा के कर्मियों और प्रबंधकों की हिम्मत (Shahabuddin, Criminal, Hindi Article, New, Bihar Politics, Public and Administration) पड़ती भी तो कैसे? न केवल सिवान में, बल्कि इसके आसपास के क्षेत्र के लोगों को भी (यूपी के पूर्वांचल तक) बखूबी पता है कि शहाबुद्दीन से विरोध करने का मतलब क्या होता है. वैसे भी, शहाबुद्दीन पर 39 हत्या और अपहरण केस थे, जिसमें से 38 में पहले ही उन्हें जमानत मिल चुकी है. 39वां केस राजीव रौशन का था जो अपने दो सगे भाईयों की हत्या का चश्मद्दीद गवाह था. अब ऐसे में कौन पंगा लेगा ऐसे 'शहाबुद्दीन' से? यूं भी आरजेडी ने उसे राष्ट्रीय कार्यकारणी का सदस्य बना रखा है और लालू यादव का उस पर शुरू से ही हाथ रहा है, तो असहज होने के बावजूद वह अपना हाथ शहाबुद्दीन से अचानक हटा लेंगे, यह मानना नादानी हो होगी. खैर, 'अपराध और डर' से थोड़ा आगे बढ़कर यदि हम शहाबुद्दीन के जेल से बाहर निकलने पर राजनीतिक दृष्टि डालते हैं तो नीतीश कुमार पर पहले से हमलावर विपक्ष को बड़ा मौका हाथ लगा है और वह इस अवसर को छोड़ने की ज़रा भी गलती नहीं करेगा. इसकी शुरुआत भी हो गयी, जब बिहार में विपक्षी दल भाजपा ने नीतीश सरकार की कड़ी आलोचना की और आरोप लगाया है कि यदि इस मामले में ट्रायल शुरू हो गया होता तो ज़मानत न मिलती. 


14 सितंबर को भाजपा ने राज्यव्यापी हड़ताल का आह्वान भी इसी मामले में किया है. इसी के साथ पीड़ित परिवार के सदस्य भी गहरे तक सहमे हुए हैं और उन्होंने मीडिया से कहा है कि "इनकी सरकार है, जीवित रहने देंगे तो रहेंगे, नहीं तो क्या कर सकते हैं...?" साफ़ जाहिर है कि अगर इस मामले में अपराध का क्रम जारी रहा तो राष्ट्रीय नेता बनने के लिए ज़ोर लगा रहे नीतीश कुमार का जनाधार बिहार में और भी ख़िसक जायेगा. वैसे भी लालू के साथ सरकार बनाने के बाद नीतीश की 'सुशासन बाबू' वाली छवि ने पहले ही साथ छोड़ दिया है. हालाँकि, लालू यादव अब खुद के लिए राजनीति न करके अपने बेटों के लिए गोटी (Shahabuddin, Criminal, Hindi Article, New, Bihar Politics, Laloo Yadav) ज़माने में लगे हुए हैं और ऐसे में खुलकर शहाबुद्दीन का साथ देना उनके लिए नामुमकिन सा ही होगा, क्योंकि यह उनके बेटों के राजनीतिक कैरियर के लिए ग्रहण भी साबित हो सकता है. पर यह राजनीति है और कहते हैं इसमें सब जायज़ है. वैसे भी शहाबुद्दीन जैसों का असल कारोबार दबंगई और अपहरण का ही है और सौ टके का सवाल वही है कि वह जेल से बाहर निकलकर 'अपराध' नहीं करेगा तो और क्या करेगा? यह कहावत सौ फीसदी सत्य है कि 'नरभक्षी जानवर के मुंह जिस तरह खून लग जाता है, ठीक वैसे ही अपराध की दुनिया के लोग हैं'. ऐसे में नरभक्षी जानवरों को या तो गोली मार दी जानी चाहिए, या फिर मजबूत पिंजड़े में बंद किया जाना चाहिए, क्योंकि बाहर निकलते ही वह जानलेवा झपट्टा मारेगा ही मारेगा. 


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शहाबुद्दीन जैसों का मामला इसलिए भी खतरनाक हो जाता है, क्योंकि अन्य 'डानों' या 'दबंगों' के विपरीत इस हिस्ट्रीशीटर का कहर 'आम लोगों' पर ही ज्यादा टूटता रहा है. हालाँकि, 2004 के बाद स्थितियां काफी बदल चुकी हैं और नीतीश भी इस बात को बखूबी जानते हैं कि कब कौन सा आपराधिक केस जनांदोलन बन जाए और सीबीआई को हस्तक्षेप करना पड़ जाए. ऐसी स्थिति से वह बचना चाहेंगे. कानूनी दृष्टि से अगर केस को देखें तो मशहूर वकील प्रशांत भूषण ने कहा है कि वो पूर्व सांसद शहाबुद्दीन को मिली जमानत (Shahabuddin, Criminal, Hindi Article, New, Bihar Politics, Bail, Jail) के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करेंगे. इसके साथ साथ प्रशांत भूषण ने इस मामले में बिहार सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इस दिशा में खुद राज्य सरकार को पहल करनी चाहिए थी. उम्मीद की जानी चाहिए कि जन-दबाव में, राजनीतिक एंगल के दबाव में और कानून-व्यवस्था बनाये रखने के लिहाज से 'खतरनाक जानवरों' को जल्द से जल्द पिंजड़े में बंद किया जायेगा, इससे पहले की वह फिर किसी का 'भक्षण' करे! इस मामले में 21वीं सदी की राजनीति और जनता की आकांक्षाओं को समझते हुए तमाम राजनीतिक दलों को भी अपराधियों पर सख्त रवैया अपनाना चाहिए, अन्यथा लोकतंत्र अपनी अहमियत ही खो सकता है!

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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