राजनीतिक दलों पर भी लगे लगाम, करते हैं 'काले काम'! Black Money and Political Parties, Hindi Article, New, Root of Corruption, Currency Ban Analysis


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भारत मे नोट बंदी का फैसला पूरे विश्व में सर्वाधिक चर्चित होने वाले मुद्दों में से एक बना हुआ है कई लोगों ने इसकी तारीफ की है तो कइयों ने इसकी जबरदस्त आलोचना भी की है. दिसंबर के आखिरी सप्ताह में भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने नरेंद्र मोदी की आर्थिक नीतियों को बेहतर बताते हुए कहा है कि हम ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था से भी आगे निकल चुके हैं और इसके लिए पीएम को सराहना मिलनी चाहिए, तो इन ही दिनों फोर्ब्स पत्रिका की वेबसाइट पर स्टीफन का लेख भी आया है जिसमें मोदी के नोट बंदी के फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए लेखक ने लिखा है कि नोट बंदी गरीब आदमियों की जेब पर डाका की तरह है  और भारत जैसा देश जहां काफी संख्या में लोग गरीब हैं, वहां इस तरह का फैसला नहीं लिया जाना चाहिए था. फोर्ब्स के इस लेख पर लालू यादव ने चुटकी लेते हुए पीएम से पूछा है कि 'फोर्ब्स के लेख पर पीएम का ध्यान गया है कि नहीं'? खैर, यह बातें, समर्थन और विरोध अपनी जगह है, किंतु इस से बढ़कर जो बात लोगों के जेहन में स्ट्राइक कर रही है, वह यह है कि राजनीतिक दलों पर आखिर कब शिकंजा कसा जाएगा? चूंकि, लोकतंत्र एक ऐसी ताकत है जो हमें तमाम तरह के अधिकार देती है, तो नेताओं के हाथ में असीमित ताकत आ जाने से लूट तंत्र का रास्ता भी खुला है. क्रिसमस के तुरंत बाद मीडिया में यह खबर ज़ोरों से फैली कि बहुजन समाज पार्टी के अकाउंट में 100 करोड़ से ज्यादा पुराने नोट जमा हुए हैं तो मायावती के भाई के अकाउंट में भी कई करोड़ के पुराने नोट जमा करने की बात छपी! अब कहाँ तक इस बात पर मायावती जवाब देतीं, वह काउंटर अटैक में लग गयीं कि 'भाजपा बताये कि उसके अकाउंट में कितने पैसे जमा हुए हैं'? मायावती का यह तंज कोई गलत भी नहीं है और हर एक राजनीतिक पार्टी कमोबेश इस कीचड़ में लिथड़ी हुई है, किन्तु अगर मायावती खुद को दलित की बेटी कहकर आर्थिक अनियमितता के आरोप से बचना चाहती हैं तो यह बेहद अजीब है. वस्तुतः ऐसे प्रकरण अनगिनत हैं और लोग इसीलिए राजनीतिक तंत्र पर भरोसा खोते जा रहे हैं. अगर आप भारत के आर्थिक विकास की तुलना चीन से करने को कहें और उसके पिछड़ेपन को 1 वाक्य में या एक कारण के रूप में अभिव्यक्त करना चाहें, तो भारत में "नेताओं की लूट" को इसका सबसे बड़ा कारण बेहिचक बताया जा सकता है. Black Money and Political Parties, Hindi Article, New, Root of Corruption, Currency Ban Analysis

यह "नेताओं की लूट" चीन जैसे देश में नहीं के बराबर रहा है. हालाँकि, भारत के आर्थिक पिछड़ेपन के और भी तमाम कारण रहे हैं किंतु जिस तरीके से एक पैदल चलता हुआ नेता किसी चुनाव में जीत जाता है और मात्र दो-चार साल के भीतर वह किसी महँगी गाड़ी में घूमने लगता है, वह हमारे देश के नेताओं की कहानी बताने के लिए स्वयं में ही पर्याप्त है. हमारे यहाँ काले धन को लेकर खूब हो-हल्ला होता रहा है और नोट बंद करने के फैसले को भी इसी काले धन के साए में जायज /नाजायज ठहराया जाता रहा है, पर यह बात हमें मान लेनी चाहिए कि देश के नेताओं के पास सर्वाधिक काला धन और काल मन भी है, जिनका प्रयोग महंगे चुनाव में जमकर किया जाता रहा है. क्या इस बात की हम कल्पना कर सकते हैं कि चुनाव में शराब और कैश को नियंत्रण किए वगैर एक बेहतरीन लोकतंत्र का रास्ता मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है? शायद या बिलकुल भी नहीं! नोटबंदी के बाद बीच में यह भी खबर आई कि राजनीतिक दलों को पुराने नोट जमा करने पर छूट मिल गई है. हालांकि वित्त मंत्रालय ने इस बारे में वेरिफिकेशन दे दिया, पर जैसा कि चुनाव आयोग ने सरकार से दरख्वास्त की थी कि 20,000 की अनामी चंदे की राशि को 2000 तक सीमित कर दिया जाए, वह हुआ नहीं! यानि 2000 से अधिक किसी राजनीतिक पार्टी को चंदा देना हो तो वह अपना पैन कार्ड और अपनी डिटेल देने के लिए बाध्य हो, किन्तु नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर सहमति तो जरूर जताई है, किंतु मामला एक तरह से ठंडे बस्ते में ही चला गया और राजनीतिक दलों पर कुछ खास कार्रवाई नहीं हुई. पहले से ही राजनीतिक पार्टियों को आरटीआई के दायरे में लाने की बात कही जाती रही है, किंतु कोई ना कोई कारण बताकर राजनीतिक दल इससे इनकार करते रहे हैं. अगर देखा जाए तो 'भ्रष्टाचार' एक बहुत बड़ा बरगद का वृक्ष बन चुका है, जिस से निपटने की इच्छा शक्ति अभी तक तो किसी राजनीतिक दल ने नहीं दिखाई है. हालांकि उम्मीद की जा रही है कि एक-एक करके अपना कदम बढ़ा रहे नरेंद्र मोदी राजनीतिक दलों के भ्रष्टाचार पर भी कुछ न कुछ ठोस करने का प्रयत्न करेंगे. अगर ऐसा वह नहीं कर पाते हैं तो यह मान लिया जाना चाहिए कि विकसित और भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने की उनकी मंशा आधी-अधूरी ही है, जो पूर्ण रुप में फलीभूत नहीं हो सकती है. Black Money and Political Parties, Hindi Article, New, Root of Corruption, Currency Ban Analysis

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इनकम टैक्स डिपार्टमेंट तमाम जगह कालेधन के सिलसिले में छापेमारी कर रहा है और इससे नेताओं को भी काफी परेशानी हुई है. अगर बात करें तो पुलिस ने पूर्व टीएमसी नेता मनीष शर्मा को 35 लाख के नए नोटों के साथ पिछले दिनों गिरफ्तार किया, तो माइनिंग किंग और पूर्व मंत्री जनार्दन सिंह की बेटी की हाल ही में हुई शादी बड़ी सुर्खी बनी थी. इसके बाद ही उन पर 100 करोड़ का काला धन सफेद करने का आरोप भी लगा! जाहिर सी बात है, नेताओं को इतनी आसानी से क्लीन चिट नहीं दी जा सकती, क्योंकि देश में अगर एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे आज भी जीवनयापन करने को विवश है तो इसके सबसे बड़े कारण हमारे बड़े लोकतंत्र के 'नेता' ही हैं. लूट की इसी कड़ी में तमिलनाडु के भाजपा यूथ विंग लीडर के पास नए और पुराने दोनों तरह के नोटों का जखीरा मिला है. हालांकि बाद में गिरफ्तारी के बाद पार्टी ने उसे तत्काल प्रभाव से पद से हटा दिया है, किन्तु बात तो वही है कि नेताओं पर लगाम की इच्छाशक्ति नहीं दिखलाई जा रही है. देश भर से और भी कई नेताओं की गिरफ्तारियां हुई हैं, किंतु लोगों में राजनीतिक पार्टियों को दी जा रही नरमी को लेकर भारी गुस्सा भी है. इस सन्दर्भ में थोड़ा आंकड़ों की ओर देखें तो, सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की एक स्टडी के मुताबिक 2014 की तमाम चुनावी प्रक्रियाओं में 30000 करोड़ रुपए खर्च किए गए जिसे देश के इतिहास का सबसे महंगा चुनाव माना गया. उसमें केंद्र सरकार और इलेक्शन कमीशन ने 7000 करोड़ रुपए लगभग खर्च किए थे, किंतु बाकी का 75 फीसदी खर्च काले धन से ही पूरा किया गया था. चुनाव आयोग की ही रिपोर्ट के मुताबिक 2014 के आम चुनाव के दौरान लगभग 300 करोड़ रुपए की अवैध राशि जब्त की गई थी, जबकि 17000 किलोग्राम नशीले पदार्थ पकड़े गए थे. जाहिर तौर पर भ्रष्टाचार और काले धन के मामले में राजनीतिक पार्टियां सर्वाधिक काला रिकॉर्ड भी रखती हैं. नोट बंदी के बाद निर्वाचन आयोग में इस तरफ भी इशारा किया है कि कई राजनीतिक पार्टियां सिर्फ काले धन को सफेद धन बनाने के लिए ही पंजीकृत कराई जाती हैं. Black Money and Political Parties, Hindi Article, New, Root of Corruption, Currency Ban Analysis

दिलचस्प बात यह भी है कि लगभग 2000 राजनीतिक दलों में से सिर्फ 400 राजनीतिक दल ही 2005 से 2015 तक चुनाव में सम्मिलित हुए हैं. बाकी सभी दल चुनाव ही नहीं लड़े हैं. जाहिर तौर पर मामला जितना ऊपर से दिख रहा है उससे कहीं ज्यादा गंभीर है और अगर इन तथ्यों पर ध्यान नहीं दिया गया तो हमारे लोकतंत्र को भारी नुक्सान उठाना पड़ सकता है. अगर चुनाव सुधार के साथ तमाम राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र लाने की गुंजाइश ढूंढी जाती है तो एक आशाजनक तस्वीर अवश्य ही उभर सकती है. चुनावों में काले धन पर रोक के लिए 'पब्लिक फंड' की भी बात कही जा रही है, किन्तु यह पूरा मामला इतना उलझा हुआ है कि इसे इतनी जल्दी हल करने की बात सोचना बेमानी है है, किन्तु दुःख की बात तो यह है कि थोड़ा बहुत कोशिश भी चुनाव सुधार की दिशा में नहीं की जा रही है अन्यथा राजनीतिक दलों में 'आरटीआई' लागू हो चुकी होती. अगर वाकई हम अमेरिका या कम से कम चीन की तरह अपनी विकास की रफ्तार को तेज करना चाहते हैं तो निश्चित रुप से हमें कई मामलों में नेताओं के 'काले मन और काले धन' दोनों पर लगाम कसने की जरूरत है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देहरादून की हालिया रैली में यही कहा है, किन्तु देखना दिलचस्प होगा कि इस बाबत कदम कब उठाये जाते हैं या फिर 'जुमलेबाजी' से ही काम चलाया जाएगा!

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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