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'बाजार एकाधिकार' के दुरूपयोग में फंसा 'गूगल'! Questions on Google Policies, European Union, Hindi Article, Bad part of Google Inc.



गूगल, गूगल देवता, गूगल पर ढूंढ लो, गूगल कर लो जैसे शब्द ऐसे ही लोगों की ज़ुबान पर नहीं चढ़ गए हैं, बल्कि यह कंपनी अपने इन ऊपर बने इन शब्दों को सार्थक भी करती है. यूं तो 'गूगल' की तमाम इन्नोवेटिव आइडियाज ने तमाम लोगों की ज़िन्दगी में अकल्पनीय सुविधाएं और सहूलियतें बढ़ायी हैं, किन्तु कई बार ऐसी ख़बरें बेहद चिंतित करती हैं, जिसमें कहा जाता है कि गूगल ने अपने बाज़ार एकाधिकार का दुरूपयोग (Questions on Google Policies) करने की कोशिश की है. हालाँकि, दुनिया में किसी भी व्यवसाय के क्षेत्र का लीडर ही उस क्षेत्र के नियम-कानून बनाता है और गूगल भी इसका अपवाद नहीं है. आप किसी भी क्षेत्र में मार्किट-लीडर्स (Market leaders) की ओर नज़रें घुमा लें, उनकी स्ट्रेटेजी से काफी हद तक आप समझ जाएंगे कि अपना बिजनेस वो इस तरीके से आगे बढ़ाने की कोशिश में लगे रहते हैं, ताकि मार्किट में उनकी मोनोपॉली स्थापित हो जाए, बेशक इसके लिए कई बार 'हुक और क्रूक' का इस्तेमाल भी किया ही जाता है. विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम से माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft), सोशल मीडिया में फेसबुक (Facebook) और इंटरनेट-सर्च को लेकर गूगल के बारे में भी कमोबेश यही कहानी है. हालाँकि, अगर बिजनेस-एथिक्स की बात की जाए तो, नियम बनाने या उनका पालन करने में भेदभाव करना कानूनी रूप से गलत माना जाता है. इसमें कोई शक नहीं हैं कि इंटरनेट-सर्च पर गूगल की बादशाहत कायम है, तो दुनिया का तीसरा सबसे कीमती ब्रांड होने का तमगा भी गूगल ही के पास है! 

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हालाँकि कई सारी कंपनियों ने सर्च-इंजन बिजनेस में अपने हाथ आजमाए, लेकिन वह गूगल को चुनौती देना तो दूर की बात, अपना स्थान ही नहीं बना पाए. ऐसे में जब इंटरनेट ने अपने पाँव पूरी दुनिया में तेजी से फैलाए हैं तो गूगल-सर्च की कीमत भी बेहिसाब तेजी से बढ़ी है. उस पर गूगल की रिसर्च और सटीक शोध ने अन्य प्रतिद्वंदी कंपनियों का बोरिया-बिस्तर समेट रखा है. ऐसे में अपने एकाधिकार का फायदा उठाते हुए गूगल मनमानी भी करता है, जैसे आरोप थोड़े चौंकाते तो जरूर हैं, किन्तु 'यूरोपीय यूनियन' (European Union) जैसी बड़ी संस्था ने गूगल पर 'मनमानी और पक्षपात' का जो आरोप लगाया है, उसे अनदेखा करना बेहद मुश्किल है. इस संस्था का कहना है कि गूगल पक्षपात करते हुए विज्ञापन व्यवसाय में अपनी प्रतिस्पर्धा वाले विज्ञापन को अपनी वेबसाइट पर दिखने से रोक रहा है, जो गलत है. अगर ऐसा सच में है तो यह बेशक गलत है, क्योंकि किसी भी प्रतियोगी को रोकने का गूगल को कोई अधिकार नहीं (Questions on Google Policies) है और न ही होना चाहिए. इसके अतिरिक्त, गूगल पर जो और आरोप सामने आए हैं, उसके अनुसार गूगल 'ऑनलाइन शॉपिंग' में भी पक्षपात कर रहा है. इसके पीछे जो तर्क दिया जा रहा है, उसके अनुसार शॉपिंग-सर्च में गूगल अपनी शॉपिंग साइट को पहले और शेष साइट को बाद में दिखाता है, जिसके लिए 'ईयू' में गूगल पर मामले भी चल रहे हैं. 

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गौरतलब है कि ईयू के इंटरनेट सर्च बाजार के 90 फीसदी और अमेरिका में 70 फीसदी हिस्से पर गूगल का एकछत्र साम्राज्य है और इसलिए इन आरोपों की गम्भीरता आप ही बढ़ जाती है. हालाँकि, गूगल ने इन आरोपों से इनकार किया है और उसका कहना है कि ग्राहकों और प्रतिद्वंदियों को नुकसान पहुंचाने के आरोप सरासर गलत हैं. देखना दिलचस्प होगा कि यह सारे आरोप कहाँ तक साबित होते हैं, क्योंकि कई बार यह भी देखा जाता है कि व्यवसायिक प्रतिद्वंदी आरोप-प्रत्यारोप के खेल में (Questions on Google Policies) एक-दूसरे को फंसाने के लिए तमाम चालें चलते ही हैं. इसी सन्दर्भ में, यूरोपीय संघ द्वारा गूगल पर विज्ञापन व्यवसाय के साथ-साथ मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम 'एंड्रायड' के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है. यूरोपीय संघ की प्रतिस्पर्धा आयुक्त मार्गरीटा वेस्टेयर के अनुसार कंपनी प्रतिद्वंदी ऑपरेटिंग सिस्टमों, ऐप्लीकेशनों और सेवाओं की राह में अड़ंगा लगा रही थी. प्राप्त जानकारी के अनुसार, मार्गरीटा को मोबाइल फोन और टैबलेट बनाने वाली कंपनियों ने शिकायत किया था कि गूगल द्वारा उन पर एंड्रायड इस्तेमाल करने का दबाव बनाया जा रहा है. गौरतलब है कि मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम  बाजार के सबसे बड़े हिस्से पर गूगल द्वारा डेवेलप एंड्रायड का ही कब्जा है. 

गूगल की 'एनुअल डेवलपर कॉन्फ्रेंस' एवं ऐडसेंस पर आतंकी सहयोग के आरोप! 

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अगर हम भारत के सन्दर्भ में इस कंपनी की नीतियों की बात करें तो, भारत में सबसे पहले भारत मैट्रीमोनी और जयपुर की एनजीओ कंज्‍यूमर यूनिटी एंड ट्रस्‍ट सोसाइटी ने गूगल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. इसके बाद माइक्रोसॉफ्ट ने गूगल पर अपनी ताकत का गलत उपयोग करने के संबंध में शिकायत किया. उसके बाद एक-एक करके फ्लिपकार्ट, फेसबुक, नोकिया की मैप डिविजन, मेकमाय-ट्रिप, मैप-माय इंडिया, हंगामा डिजिटल और ग्रुपएम सहित कई कंपनियों ने भी भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) से गूगल के खिलाफ शिकायत की थी. जिसके लिए सीसीआई ने अपनी जांच शाखा – डीजी (डाइरेक्टर जनरल) को 2012 में गूगल पर लगे इन आरोपों की जांच के आदेश दिए थे. हालाँकि, यह बेहद दुर्भाग्य की बात है कि गूगल ने इस जांच में सहयोग नहीं किया था, जिसके लिए पिछली साल सीसीआई ने गूगल पर एक करोड़ रू. का जुर्माना भी लगाया था. वैसे, गूगल जैसी इनोवेटिव कंपनी ऐसा करती है, तो यह बेहद नुकसानदायक स्थिति है, क्योंकि वैसे ही इंडिया में कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार काफी हद तक फैला हुआ है और अगर 'बेहतर साख' वाली कंपनियां भी यही करने लगीं तो फिर ग्राहकों और वेंडर्स का भरोसा उनके ऊपर से धीरे-धीरे उठेगा ही! अगर भारत में गूगल पर लगे आरोपों की बात करें तो यह 'ऑनलाइन सर्च' (Online Search) से संबंधित है, जिसके अनुसार गूगल सर्च पर कोई शब्द टाइप करने पर स्वाभाविक परिणाम यानी 'ऑर्गेनिक सर्च' का रिजल्ट्स देने की प्रक्रिया में गूगल अपनी दूसरी सेवाओं या अपने कारोबारी सहयोगियों को फायदा पहुंचाने का काम करता है. 

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जाहिर है, यह व्यवसायिक नियमों का खुला उल्लंघन है तो कहीं न कहीं गूगल की पॉलिसी पर भी सवाल खड़ा करता ही है. ऐसे ही गूगल पर एडवर्ड्स-बिडिंग को लेकर भी आरोप लगे हैं, जिसके बारे में सीसीआई (भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग) का कहना है कि यह प्रक्रिया इतनी अस्पष्ट है, जिससे विज्ञापनदाता को कभी पता नहीं चल पाता कि यह काम कैसे करती है, तो एडवर्ड्स द्वारा 'गूगल सर्च' को प्रभावित करने की बात भी कही गयी है. देखा जाए तो गूगल की मुख्य कमाई का श्रोत भी 'एडवर्ड्स' ही है, जिसे लेकर विज्ञापनदाताओं की एक शिकायत यह भी है कि विज्ञापनों पर गूगल की एकतरफा और अस्पष्ट शर्तें होती हैं, जबकि कंपनी किसी भी कैंपेन को अपनी मर्जी से कभी-भी खत्म कर देती है और इसकी वजह भी साफ नहीं होती. हालाँकि, इस मामले में गूगल पर आरोप साबित नहीं हो पाए हैं और वह अपनी तरफ से 'एडवर्ड्स' (Google Adwords) को लेकर काफी कुछ साफ़ करने की कोशिश में लगा ही रहता है. पर कई टेक-एक्सपर्ट भी इस बात पर सहमत हैं कि गूगल को 'सर्च' और 'एडवर्ड' मामले में और साफ़ होने की आवश्यकता है, क्योंकि वह मार्किट-लीडर है और अगर लीडर ही अन-एथिकल रास्ता अपनाने लगेगा तो फिर बाकियों का क्या होगा? अगर हम गूगल के कुछ और नकारात्मक पहलुओं की बात करते हैं तो भारत के मानचित्र के साथ भी गूगल में छेड़छाड़ हुई है और भारत का मानचित्र हर देश के हिसाब से अलग-अलग दिखलाता है 'गूगल'! 

ब्राउजर्स के बादशाह गूगल 'क्रोम' को जानिए और नजदीक से!

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भारत के सम्बन्ध में गूगल के व्यवसाय पर इसके सीईओ सुन्दर पिचाई के भारत दौरे पर कभी भाजपा के थिंक टैंक रहे के.एन.गोविंदाचार्य ने भी सवाल उठाये थे. तब राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संरक्षक गोविंदाचार्य ने पिचाई से विवादित गूगल अर्थ मैपिंग प्रोजेक्ट के बारे में सवाल उठाते हुए लिखा था कि 'गूगल अर्थ मैपिंग प्रोजेक्ट के विरूद्ध दो वर्ष पूर्व सर्वेयर जनरल ऑफ इंडिया ने सीबीआई में शिकायत दर्ज कराई थी जिसमे गूगल इंक के अधिकारियों द्वारा कोई सहयोग नहीं किया गया, ऐसा क्यों?' यह एक गम्भीर विषय था, जिसमें पूर्व भाजपा सदस्य ने पिचाई से पूछा था कि आखिर क्यों 'बगैर केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों की मंजूरी के इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया जा रहा है, जिससे भारत के विरुद्ध आतंकवादियों को लाभ (Terrorism in India) हो सकता है और जिससे मुंबई जैसे हमलों को दुहराया भी जा सकता है. तब के समय खासे चर्चित रहे इन सवालातों में भारतीय मूल के सीईओ सुन्दर पिचाई से यह भी पूछा गया कि गूगल इंक के पैन नंबर और रजिस्ट्रेशन नंबर की भारत में गैर उपलब्धता क्यों है? बताते चलें कि 'भारत में गूगल इंक और गूगल आयरलैंड कंपनी के पास न तो पैन नंबर और न ही सर्विस टैक्स रजिस्ट्रेशन नंबर है. एक और मुद्दा जो गोविंदाचार्य ने अपने पोस्ट के ज़रिए उठाया था, उसके मुताबिक 'भारत में गूगल वेबसाइट द्वारा दी गई सुविधाओं का स्वामित्व आपकी कंपनी गूगल इंक के पास है, जिसकी शिकायत के लिए आईटी एक्ट के अनुसार गूगल ने शिकायत अधिकारी की नियुक्ति भारत की बजाय अमेरिका में कर रखी है. इस कारण से आम भारतवासियों की शिकायतों का निराकरण नहीं हो पा रहा है और वह भारतीय कानूनों के दायरे में भी नहीं आ पा रहे हैं. 

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जाहिर है, यह काफी गम्भीर किस्म के प्रश्न हैं जिनका जवाब दिया जाना चाहिए था, पर गूगल इस पर चुप्पी साध गया. हालाँकि, बाद के दिनों में मोदी सरकार द्वारा 'इक्विलाइजेशन लेवी' लागू किया गया है, जिसका सीधा सम्बन्ध गूगल-एडवर्ड्स और दूसरी विदेशी कंपनियों से है जो विदेश में रहकर भारत में व्यापार करती हैं, मगर टैक्स यहाँ नहीं देती हैं. जाहिर है, अपने व्यवसाय के लिए गूगल तथ्यों के साथ छेड़छाड़ और भारतीय कानूनों के साथ आँख-मिचौली का दोषी भी दिख जाता है. गूगल की इसी मनमानी की वजह से चीन ने गूगल नकार दिया था. हालाँकि जर्मनी, ताइवान, मिस्र, और ब्राजील सहित दुनियाभर के नियामकों और अदालतों में 'गूगल' पर सवाल खड़े किए जा चुके हैं, लेकिन उन्हें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला, जो बेहद अजीब स्थिति उत्पन्न करने वाला है. वहीं अमेरिका (United States of America) में 2011 के दौरान भी ये आरोप लगे थे, लेकिन दो साल की जांच के बाद 2013 में गूगल को आरोपों से बरी कर दिया गया. ऐसे में यूरोपियन युनियन द्वारा लगाए तमाम आरोपों के जवाब में गूगल (Questions on Google Policies) कहता है कि "हमें यकीन है कि हमारी नई खोज और बेहतर प्रोडक्ट्स ने यूरोपीय ग्राहकों की पसंद का दायरा बढ़ाया है और इससे कंपटीशन भी बढ़ा है. हम यूरोपीय कमीशन के नए केस की जाँच करेंगे और आगे इस पर विस्तार से अपनी बात रखेंगे." जाहिर है, गूगल इन मामलों और आरोपों से विचलित होता नहीं दिख रहा है और अपने बिजनेस-मॉडल के पक्ष में मजबूती से खड़ा है. 

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इन आरोप-प्रत्यारोपों से इतर देखें तो, एक यूजर के नजरिए से गूगल के तमाम-प्रोडक्ट्स बेहद मजबूत हैं और गूगल-प्रदत्त तमाम सुविधाओं में उसके प्रतिद्वंदी दूर-दूर तक नज़र नहीं आते हैं. अगर प्रतिद्वंदी कंपनियां बेहतर प्रोडक्ट पेश करती हैं तो कोई कारण नहीं है कि 'फेसबुक' जैसी कोई नयी कंपनी न उभरे या फिर कोई न्यूबी एप्पल जैसे क्वालिटी न दे सके. इस बात में दो राय नहीं है कि ग्लोबल-मार्किट में आपको बेहद सक्षम प्रोडक्ट्स बनाना होगा, अन्यथा आप टिक न सकेंगे. ऐसा नहीं है कि गूगल के सभी प्रोडक्ट सफल ही हुए हैं, बल्कि सोशल मीडिया में फेसबुक का मुकाबला करने के लिए गूगल ने जी-जान लगा दिया, और जाने क्या-क्या लाया, किन्तु वह कुछ ख़ास सफल न हो सका तो अमेज़न, फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियों ने उसे ई-कॉमर्स (E-commerce business) में पाँव न जमाने दिया. हाँ, उसका सर्च-इंजिन या एंड्राइड अगर मार्किट में चल रहा है तो निश्चित रूप से उसमें बेहद दम और समयानुकूल इनोवेशन है. हालाँकि, इस बात में भी दो राय नहीं है कि गूगल को अपनी पॉलिसीज को काफी ट्रांसपेरेंट बनाने की जरूरत है, खासकर सर्च और एडवर्ड्स के मामले में तो भारत जैसे देशों की तमाम चिंताओं की ओर भी अगर यह बड़ी कंपनी ध्यान दे तो आने वाले दिनों में यह और मजबूत होकर उभर सकती है, इस बात में शक-सुबहा नहीं!

- मिथिलेश कुमार सिंहनई दिल्ली.



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