क्या वास्तव में 'ऐसे' ही 'आत्मनिर्भर' बनेगा भारत?

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केंद्र सरकार ने अपने आत्मनिर्भर अभियान से कोविड-19 से निराश भारतीयों को आशा की एक किरण जरूर दिखलाई है.
20 लाख करोड़ का पैकेज अपने आप में बेहद कैची पैकेज है और इस स्लोगन के सहारे भारतीय वित्त मंत्री प्रत्येक दिन अलग-अलग क्षेत्रों के लिए घोषणाएं कर रही हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों के लिए थोड़ी कम, थोड़ी ज्यादा राहत प्रदान करने की बात कर रहा है.

परंतु बिना किसी लाग लपेट के पूछने वाले यह भी पूछ रहे हैं कि पहले की तमाम योजनाओं जिनमें मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, नीति आयोग, स्मार्ट सिटीज, स्मार्ट विलेज इंडिया, सांसद आदर्श ग्राम योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, अटल भूजल योजना, दीन दयाल उपाध्याय अंत्योदय एवं ग्राम ज्योति योजना, फिट इंडिया मूवमेंट, हर घर जल, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, महात्मा गाँधी प्रवासी सुरक्षा योजना, विद्यांजली, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना और भी ऐसी दर्जनों योजनाएं शामिल हैं, उनमें और "आत्मनिर्भर भारत" में मूल अंतर क्या है?

यह सिर्फ आलोचनात्मक नजरिए से नहीं पूछा जाएगा, बल्कि भविष्य के आने वाले परिणाम भी इस प्रश्न के उत्तर में छिपे हो सकते हैं. 

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आखिर जब तक हम यह विचार नहीं करेंगे कि मेक इन इंडिया असफल क्यों हुआ, तब तक हम "वोकल फॉर लोकल" का नारा देकर क्या हासिल कर लेंगे? स्वदेशी पर भारत में आंदोलन कोई नया नहीं है, बल्कि महात्मा गांधी के समय से ही विदेशी वस्त्रों की होली जलाने की परंपरा रही है. तब हमारा देश गुलाम था. उसके बाद से कई स्वदेशी आंदोलन हुए, लेकिन भारत में स्वदेशी अभियान पूरी तरह फलीभूत क्यों नहीं हो पाया, यह विचार एवं व्यवहार का बड़ा मुद्दा होना चाहिए.

इसके पीछे कुछ तो कारण अवश्य ही होंगे और जब तक उन कारणों को विचार नहीं किया जाएगा तब तक उसका समाधान भला किस प्रकार निकल सकता है?


सभी सरकारों को योजनाएं जारी करने और उसका क्रियान्वयन करने का हक अवश्य है, किंतु ऐसा नियम क्यों नहीं है कि उन तमाम योजनाओं पर मासिक, क्वार्टरली, सालाना या ऐसी ही कोई अवधि निश्चित करके उन पर वाइट पेपर जारी किया जाए. वह वाइट पेपर खुद पीएम इसी जोर शोर से जारी करें और किन उद्देश्यों को लेकर वह योजना शुरू हुई थी और किन उद्देश्यों को उस योजना ने प्राप्त किया और कहा असफल रही इस बात की विवेचना उन्हें खुद करनी चाहिए.

हकीकत तो यह है कि हमारे देश में योजनाओं के साथ-साथ कानून भी बहुत बनते हैं और इस बात को खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वीकार किया है कि जब वह सत्ता में आएंगे तब तमाम कानूनों को खत्म करेंगे तो फिर ऐसा क्यों हो गया कि कानूनों को खत्म करते रहने की जगह, वह खुद ही अनंत योजनाएं बनाने लगे और उन योजनाओं का फल क्या निकला और फल क्या निकलेगा, इस बात की विवेचना करना भूल गए!

इसके अतिरिक्त एक और बात हमें बड़े ही ध्यान से समझनी होगी कि किसी भी योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए किसी न किसी को जिम्मेदारी दी जानी आवश्यक है, खासकर तब जब वह योजना अपने शुरुआती चरण में हो!

क्या आपको याद नहीं है कि दिल्ली मेट्रो का निर्माण जब शुरू हुआ तब उसकी जिम्मेदारी प्रख्यात अभियंता ई श्रीधरण को दी गई और उन्होंने तत्कालीन समय के इस बेहद दुष्कर कार्य को इस कुशलता के साथ करके दिखलाया कि उसका लोहा हर किसी ने माना. इसी प्रकार जब यूपीए सरकार ने आधार योजना लाने की शुरुआत की तो उसका प्रमुख इंडस्ट्री के विशेषज्ञ नंदन नीलेकणी को बनाया, क्योंकि इसमें तकनीकी दक्षता और क्रियान्वयन के विभिन्न स्तरों का समायोजन करना था. यह निर्णय सफल रहा और आधार योजना बड़े स्तर पर सरकारी सफलता बनी.

Metro Man E Sridharan (Pic: manorma..)

हमारे प्रधानमंत्री के बारे में यह प्रचलित है कि उन्हें सिर्फ नौकरशाहों पर ही ज्यादा भरोसा आता है.
जरा सोचिए, अगर 'आधार-योजना' का प्रमुख किसी नौकरशाह को बना दिया जाता, तो क्या वास्तव में यह योजना उतनी ही सफल रहती?
क्या वास्तव में मेट्रो जैसे प्रोजेक्ट इस स्तर पर सफल रहते?

और भी ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जिन्हें सक्षम नेतृत्व में सफलता मिली तो अक्षम और टालमटोल करने वाली नौकरशाही ने अच्छी-भली योजनाओं का कबाड़ा कर दिया...


जाहिर तौर पर प्रतिभाओं को खुद से जोड़ना और उनकी बातों पर विचार करना सफलता की कुंजी होती है, संभवतः इसीलिए अधिक से अधिक लोगों को तमाम कारपोरेट कंपनियां अलग-अलग और बेस्ट कॉलेज कैंपस से हायर करते हैं और उनके इस निर्णय का परिणाम भी नजर आता है.

अच्छी मानसिकता से कार्य करने वाली सरकारों को याद रखना होगा कि जब तक किसी योजना की जिम्मेदारी - जवाबदेही सक्षम और विशेषज्ञ लोगों को नहीं दी जाएगी, तब तक सिर्फ, कोई एक नौकरशाह उसको अमली जामा नहीं पहना सकता है.

ऐसा नहीं है कि किसी नौकरशाह की कोई उपयोगिता ही नहीं है, बल्कि मॉनिटरिंग से लेकर क्रियान्वयन और सरकार से संवाद बनाए रखने में उसकी बड़ी भूमिका है, लेकिन सिर्फ एक नौकरशाह किसी योजना को वह दृष्टि नहीं दे सकता. वैसे भी उसे अपनी नौकरी - प्रमोशन की चिंता कहीं ज्यादा होती है और उसकी तुलना में जवाबदेही उतनी ही कम.
किसी भी योजना की सफलता के बारे में उसे कोई दर्द भी नहीं होता, इसलिए वह 'औसत' रूप से ही चलता है.

वहीं एक योजना के बारे में उच्च स्तर पर सोचने-समझने और क्रियान्वयन की क्षमता रखने वाला कोई विशेषज्ञ इसके बारे में अनुभव रखता है और उसे चिंता होती है परिणाम की भी...

क्या बेहतर नहीं होता कि उद्योग धंधों के विकास के लिए नरेंद्र मोदी सरकार रतन टाटा या नारायणमूर्ति जैसे किसी प्रतिष्ठित इंडस्ट्रियलिस्ट की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन करते, जो भारत को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने से संबंधित एक रिपोर्ट देती और उस पर सरकार द्वारा क्रियान्वयन किया जाता?

खैर, ज्यादा विवेचना करने से क्या लाभ, क्योंकि यहाँ तो रिजर्व बैंक का गवर्नर भी किसी आईएएस को बनाकर खुशफहमी पाल ली जाती है और कह दिया जाता है कि उसका काम सिर्फ कई सुझावों में से किसी एक पर निर्णय भर लेना होता है. आखिर रिज़र्व बैंक जैसी संस्था का प्रमुख कोई अर्थशास्त्री ही हो, यह निर्णय माना ही जाए, ऐसा ज़रूरी तो नहीं?

नुकसान यह भी है कि किसी क्षेत्र का विशेषज्ञ अव्यवहारिक रूप से सरकार की हाँ में हाँ नहीं मिलाएगा और इस सरकार को हाँ में हाँ सुनने की आदत जो है!


महाभारत का प्रसारण भिन्न चैनल्स पर चल रहा है. एक प्रसंग याद आ गया, जिसमें महागुरु द्रोणाचार्य कुरु राजकुमारों को शिक्षा देने के लिए महाराज धृतराष्ट्र की सभा में एक शर्त रखते हैं कि राजकुमारों की शिक्षा राजधानी से दूर उनके आश्रम में होगी. पुत्र-प्रेम में फँसे धृतराष्ट्र कहते हैं कि द्रोणाचार्य राजभवन के पास ही किसी प्रांगण में राजकुमारों को शिक्षा क्यों नहीं देते?

Mahaguru Dronacharya (Pic Courtesy: StarPlus)


द्रोणाचार्य इस बात पर मजबूती से अड़े रहते हैं और अंततः उनकी बात राजा को माननी पड़ती है और तभी राजकुमारों को उत्तम शिक्षा भी मिल पाती है.

ज़रा सोचिये, अगर धृतराष्ट्र का कोई नौकरशाह, मतलब राजदरबारी द्रोणाचार्य की जगह होता तो... ?

वह महाराज का निर्णय और उनकी इच्छा टाल सकता था क्या?
परिणाम क्या होता, हम सब स्वतः ही आंकलन कर सकते हैं...

उम्मीद पर दुनिया कायम है, इसलिए हमें आपको उम्मीद अवश्य रखनी चाहिए, लेकिन आंकड़े तो इसी तरफ इशारा करते हैं कि आत्मनिर्भर भारत का स्लोगन, मेक इन इंडिया और दूसरे स्लोगनों की तरह ही अपने हश्र को प्राप्त न कर ले.
हालाँकि, सच यह भी है कि नौकरशाहों ने भी कुछ योजनाओं को सफल किया है, बेशक उसका अनुपात एक परसेंट से कम ही क्यों ना रहा हो.
इसलिए उम्मीद रखना स्वाभाविक है, आखिर एक परसेंट की उम्मीद कम होती है क्या?

नहीं भी सफल हुआ तो अगली योजना लाने के सरकारी अधिकार में कटौती भला कौन कर पाने की हिम्मत करेगा?

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.

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