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मशीनी बुद्धिमता (AI) और इंसानी दिमाग : उपयोगिता का 'विरोधाभास'

Artificial Intelligence Risk Analysis in Hindi Article
  • इंसानी मस्तिष्क पर मशीनों का हावी होना सिर्फ एक कल्पना है, या यह वास्तविकता की ओर बढ़ चला है?
  • हमें ध्यान रखना होगा कि परमाणु बम से लेकर डायनामाइट और दूसरे खतरनाक हथियारों के आविष्कारों ने मानवता का बहुत ही अहित किया है! पढ़ें पूरा...

लेखकमिथिलेश कुमार सिंहनई दिल्ली 
Published on 2 April 2023 (Update: 2 April 2023, 14:18 IST)


कई लोग इसे विज्ञान की फंतासी मानकर अनदेखा करेंगे, किन्तु सभी नहीं!
कई दिग्गज अब मशीनी दिमाग और इंसानों के दिमाग के बीच टकराव को भांप रहे हैं, और उसके खिलाफ खुलकर आगे भी आ रहे हैं. 

फिल्मों की बात अब छोड़ दीजिये!
वह चाहे हॉलीवुड की टर्मिनेटर समेत दूसरी फिल्में हों या फिर बॉलीवुड की रोबोट जैसी फिल्म हो, जिसमें मशीनी दिमाग द्वारा इंसानी दिमाग को न केवल चुनौती देते दिखाया गया है, बल्कि उसे हराते हुए भी दिखाया गया है.

फ़िल्म का लेखक तो फिर भी अपनी पटकथा (Script) के आखिर में सब कुछ अच्छा दिखा देता है, किन्तु अगर वास्तव में मशीन और इंसानों के बीच जंग होती है, तो क्या वाकई सब कुछ अच्छा ही होगा?

टेस्‍ला एवं ट्विटर के चीफ एलन मस्‍क, ऐपल के को-फाउंडर स्‍टीव वोज्नियाक, स्‍काइप के सह-संस्‍थापक जॉन टेलिन, पिनट्रस्‍ट के इवान शार्प, रिपल के क्रिस लार्सन जैसे कई शोधकर्ताओं (Researchers), वैज्ञानिकों (Scientists) एवं उद्योगपतियों (Industrialists) द्वारा लिखा गया खुला पत्र वास्तव में आँखें खोलने वाला है.

इस खुले पत्र में  1000 से अधिक जाने माने लोगों ने चैट जीपीटी-4 (Open Ai Project) और ऐसे ही शक्तिशाली एआई सिस्टम पर कम से कम 6 महीने के लिए रोक लगाने तक की अपील कर डाली है. आगे इन तमाम लोगों ने यह भी जोड़ा है कि इस पर 6 महीने की रोक सार्वजनिक तौर पर नजर भी आनी चाहिए, न कि एआई प्रयोगों (Artificial Intelligence Experiments) पर रोक सिर्फ दिखावटी हो और चुपचाप ये जारी रहें.

ज़रा सोचिये, ये हजारों लोग रिसर्च से ही तो आगे बढे हैं, इनोवेशन से ही तो इन्होंने अपनी कम्पनियाँ खड़ी की हैं, तमाम अविष्कार किये हैं, फिर ये 'मशीनी दिमाग' डेवलप करने पर 'प्रभावी रोक' लगाने तक की बात क्यों कर रहे हैं भला?

इसके पीछे इनका सीधा तर्क यही है कि इंसानी दिमाग के साथ प्रतिस्‍पर्धा करने वाला एआई सिस्‍टम समाज और मानवता के लिए बड़े जोखिम पैदा कर सकता है.

ओपन लेटर में साफ़ कहा गया है कि असिलोमर एआई सिद्धांतों (Asilomar AI Principles) के मुताबिक, एडवांस एआई धरती पर जीवन के इतिहास में एक बड़े बदलाव का प्रतिनिधित्‍व कर सकता है. इसलिए, 6 महीने की तुरंत रोक लगाकर इस दौरान बड़े एक्‍सपेरिमेंट्स (Advance AI Experiments) के लिए योजना बनाई जानी चाहिए, ताकि इसे मैनेज किया जा सके!

अर्थात अगर बिना योजना के ऐसे ही बड़े एआई प्रयोग होते रहे, तो समग्र मानव जाति के लिए भारी जोखिम हो सकता है. 

ऐसा नहीं है कि यह बात यही कुछ चुनिंदा लोग कह रहे हैं, बल्कि इस बात को दुनिया की टॉप एआई प्रयोगशालाएं एवं रिसर्च भी मानते हैं.

इस ओपन लेटर में कई फैक्ट्स दिए गए हैं, जैसे वर्तमान एआई सिस्टम अब सामान्य कामों में मानव-प्रतिस्पर्धी होते जा रहे हैं, यहाँ तक कि लोगों को मशीनें रिप्लेस करती जा रही हैं. 
इनवेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक एआई से दुनियाभर में 30 करोड़ नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है. इस रिपोर्ट के और कई पहलु हैं, किन्तु आपको अगर यह आंकड़ा सामान्य लग रहा है, तब आप भारी गलती कर रहे हैं. 
अभी हाल ही में भारत के बड़े चैनल आज तक ने अपना एक एआई एंकर प्रस्तुत किया, जो नेशनल चैनल पर रोज ख़बरें भी पढ़ रही हैं.

बेरोजगारी का आलम क्या हो सकता है आने वाले दिनों में, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है. 

न केवल बेरोजगारी, बल्कि असल समस्या तो यह है कि इन मशीनों को लोग अपनी सूचना, प्रचार और कई बार झूठ से भरने की ओर अग्रसर हो रहे हैं. यह बेहद खतरनाक स्थिति हो सकती है.

अपने ओपन लेटर में न केवल सभी एआई लैब्‍स बल्कि सरकारों तक को कदम उठाने का आह्वान किया गया है, जिसमें तात्कालिक मोरेटोरियम (Moratorium) स्थापित करते हुए एआई लैब्स एवं स्वतंत्र विशेषज्ञों को मिलाकर एडवांस एआई डिजाइन - डेवलपमेंट के लिए साझा सेफ्टी प्रोटोकॉल (Common Safety Protocol) के एक सेट को संयुक्त रूप से विकसित व कार्यान्वित करने का सुझाव दिया गया है. साथ ही समय-समय पर इसका स्वतंत्र एवं बाहरी विशेषज्ञों से ऑडिट और निरीक्षण कराते रहने की बात भी कही गयी है. 

यह कुछ-कुछ  ‘अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी’ (International Atomic Energy Agency – IAEA) की तरह हो सकती है. 

देखा जाए तो इस खुली चिट्ठी में दी गयी सलाह कोई ग़लत नहीं है, बल्कि तेजी से बदलती दुनिया में तमाम एआई डेवलपर्स को एआई गवर्नेंस सिस्‍टम (Strong AI Governance System) तैयार करने के लिए नीति-निर्माताओं (Policy Makers) के साथ काम करनाही चाहिए. जाहिर तौर पर एआई सेफ्टी रिसर्च (AI Safety Research) के लिए भारी भरकम फंड की जरूरत होगी, तो इसमें समय भी लगेगा. कई लोगों को यह नागवार लग सकता है, किन्तु कीमत जब मानवता की लगी हो, तो उसके आगे सभी कीमत छोटी ही हैं.

हालाँकि, एक तथ्य यह भी है कि बेहतरीन टेक्नोलॉजी पर एकाधिकार के लिए कुछ विकसित देश इस तरह के प्रोपोगैंडा करते हैं, ताकि विकासशील और पिछड़े देशों पर उनका वर्चस्व बना रहे! यह थोड़ा दूर की कौड़ी है, किन्तु किसी भी हाल में ऐसा नहीं होना चाहिए, और विश्व-व्यवस्था, भेद भाव पर आधारित नहीं होनी चाहिए!

बावजूद इन आशंकाओं के हमें ध्यान रखना होगा कि परमाणु बम से लेकर डायनामाइट और दूसरे खतरनाक हथियारों के आविष्कारों ने मानवता का बहुत ही अहित किया है, किन्तु फिर भी यह सब मनुष्यों के हाथ ही रहे हैं. किंतु एआई के मामले में बात सिर्फ इतनी भर ही नहीं रहने वाली है, बल्कि बात अब दिमाग से खेलने की है.

बेहद आसान लॉजिक है कि एक चीज को आधार बनाकर अगर कंप्यूटर दूसरा निष्कर्ष निकाल सकता है, तो कई चीजों को आधार बनाकर वह कई ऐसे निष्कर्ष निकाल सकता है, जो संभवतः इंसान की सोच से आगे की चीज हो! 
चूंकि चैट जीपीटी के समय में इन बातों की चर्चा इसलिए हो रही है, क्योंकि अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आम लोगों तक सीधा ही पहुंचने लगा है.

चैट जीपीटी या इस तरह के तमाम आने वाले कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले आविष्कारों में एक बात बेहद महत्वपूर्ण है, और वह यह है कि यह तमाम अविष्कार मनुष्य के दिमाग को सुस्त बना सकते हैं. 
यह खुद तो मशीन है, और मशीन भला क्यों सुस्त होगी, क्यों थकेगी? 

जरा सोचिए! मनुष्य के काम करने की कितनी क्षमता है भला!
अपने दिन के 24 घंटे में से सामान्य रूप से एक मनुष्य 8 से 10 घंटे तक काम कर सकता है, वहीं अत्यधिक स्ट्रेच करके मनुष्य 16 से 18 घंटे काम कर सकता है, वह भी निरंतर नहीं कर सकता, किंतु एक मशीन तो 24 घंटे काम कर सकती है. अब तो वह 24 घंटे सोच भी सकती है, और चैट जीपीटी ने दिखा दिया है कि वह इमोशन के साथ सोच सकती है!

एक तथ्य यह भी है कि टेक्नोलॉजी के चाहे जितने दिग्गज किसी भी प्रयोग के खिलाफ कुछ भी सहमति बनाने की कोशिश क्यों ना कर लें, प्रयोग नहीं रुकेंगे, क्योंकि यह विज्ञान की मूल प्रवृत्ति के ही खिलाफ है. ऐसी अवस्था में हमें सधे हुए ढंग से आगे बढ़ने की तैयारी शुरू करनी चाहिए. 

कृत्रिम बुद्धिमता के विकास से बनी मशीनों के इन प्रयोगों को रोकने की बजाय इसका काउंटर क्या हो सकता है, और वास्तव में किसी विरोधाभास की स्थिति में, ऐसी सिचुएशन आने पर हम मनुष्यों की क्या प्रतिक्रिया हो सकती है, इस पर भी गौर करने की आवश्यकता है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से मुकाबले के लिए मानव मस्तिष्क नई जनरेशन को बच्चों को गणित, विज्ञान और शोध के दूसरे मूलभूत सिद्धांतों को मजबूत करने पर कार्य करे, न कि वह अपने मस्तिष्क को इन एआई प्रोडक्ट्स के हवाले करके बैठ जाए!

आखिर भविष्य किसने देखा है?

अगर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से कुछ मशीनें वास्तव में हमारे लिए खतरनाक हो भी गयीं, तो हमारा मस्तिष्क उन समस्याओं का हल ढूंढ सके, इस हेतु उसे तैयार करते रहना होगा!

तो आप क्या सोचते हैं, आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस से इंसानी मस्तिष्क को आगे रखना है, या फिर उनका उपभोक्ता भर बन कर रह जाना है?
उन्हें प्रोटोकॉल के तहत रेगुलेट करना है, या फिर समस्त मानवता को किसी अँधेरी सुरंग में जाने देना है?

फ़िलहाल कमेन्ट कीजिये, और अपने मस्तिष्क को इस हालात में सोने न दीजिये, क्योंकि ... !!

लेखकमिथिलेश कुमार सिंहनई दिल्ली 
Published on 2 April 2023 (Update: 2 April 2023, 14:18 IST)



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