चेन्नई का असहनीय दर्द, लेकिन... Chennai crisis and rescue operation, issues and solution beyond all

ज़रा गौर करें, जिस शहर में 40 फ़ीसदी मोबाइल फ़ोन और 20 फ़ीसदी लैंडलाइन फ़ोन काम नहीं कर रहे हों, वहां आज के युग में क्या हालात होंगे? जाहिर है, इसके पीछे कुछ दिनों से जारी भारी बारिश वजह बनी है, जिससे तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, क्योंकि शहर के 60-70 फ़ीसदी इलाके पानी में डूबे हुए हैं और लेख लिखे जाने तक खतरा कम होने का नाम नहीं ले रहा है, बल्कि बढ़ता ही जा रहा है. शहर के स्कूल कॉलेज पिछले 16 दिनों से बंद चल रहे हैं और उन्हें अगले दस दिनों तक के लिए बंद कर दिया गया है. इसके अलावा, रेल, सड़क और हवाई सेवा बुरी तरह प्रभावित हुई है. 22 रेलगाड़ियां रद्द कर दी गई हैं और 11 ट्रेनों को बदले हुए रूट से चलाया जा रहा है. भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने हालात को देखते हुए चेन्नई एयरपोर्ट को 6 दिसंबर तक बंद कर दिया है. अब इस पूरे घटनाक्रम से हम समझ सकते हैं कि चेन्नई जैसे बड़े महानगर की रफ़्तार लगभग रूक सी गयी है और वहां फंसे लोगों की धड़कनें असामान्य हो गयी हैं. ऐसा नहीं है कि चेन्नई जिन हालातों का सामना कर रहा है, वह सिर्फ वहीं के लोग महसूस कर रहे हैं, बल्कि इस तरह की समस्याएं हम भारतीयों के लिए इतनी कॉमन हो चुकी हैं कि हर किसी को लग रहा है कि वहां हालात किस स्तर पर गंभीर हैं! इस पूरी त्रासदी को क्रमवार समझने की कोशिश करते हैं, जिससे इसके कारण और निवारण पर कुछ रौशनी पड़ सकती है:

क्लाइमेट समस्या: यह भी आश्चर्य ही है कि इस त्रासदी के कुछ ही दिनों पहले भारतीय प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर पेरिस में हुए वैश्विक सम्मेलन में इस बाबत गंभीर चिंता प्रकट करते हुए केदारनाथ हादसा, सुनामी और मुंबई में भारी बरसात का ज़िक्र किया था तो तमाम विकसित देश भी दुनिया का तापमान बढ़ने से रोकने के लिए सैद्धांतिक रूप से सहमत दिखे. किन्तु यह एक बड़ी बिडम्बना है कि अंततः यह सम्मेलन भी अपने पिछले 21 सम्मेलनों की तरह तू-तू, मैं-मैं की तर्ज पर समाप्त हो गया और विकसित, विकासशील देश एक-दूसरे पर जिम्मेदारियां थोपते रह गए. भारतीय मौसम विभाग का कहना है कि मौसम के इस बदले मिजाज के पीछे अल नीनो एक कारण बड़ा कारण है. हालांकि अधि‍कारी यह भी मानते हैं कि जैसी बारिश हो रही है वह सामान्य नहीं है और इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि 2015-16 का अल नीनो सबसे ताकतवर होने वाला है. तमाम विशेषज्ञ वैश्विक तापमान में बृद्धि को भी इन समस्याओं के लिए दोषी ठहरा रहे हैं. 

मानवीय प्रवृत्ति का कहर: लगातार बारिश के कारण झीलों का जलस्तर बढ़ने लगा तो दबाव बढ़ने के कारण चेम्बराम्बकम झील में 30000 क्यूसेक पानी छोड़ा जाना मुश्किल हालात पैदा कर गया तो यह समझना भी प्रशासन और पब्लिक की समझ पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है कि बीते दो दशकों में चेन्नई में विकास की खातिर, जमीन का घेराव हुआ, नालियों-तालाबों का पानी रोका गया. एक आंकड़े के मुताबिक, विकास की इस दौड़ में 300 से अधिक जलाशय गायब हो गए हैं तो गूगल-अर्थ ने अपनी तस्वीरों में इसकी पुष्टि 15 साल पहले और आज की तस्वीरें दिखाकर कर दी है. जाहिर है, चेन्नई में जमकर अवैध निर्माण हुआ है, जिसने टैंक, झील, तालाब और नदियों को मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में बदल दिया है. एक आंकड़े के अनुसार शहर में 1.5 लाख से ज्यादा अवैध निर्माण हुए हैं, जिसने प्रशासन के साथ-साथ, अंधाधुंध बढ़ते शहरीकरण पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है. साल 2011 में आई राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक, चेन्नई में 2847 किलोमीटर सड़कें हैं, लेकिन पानी की निकासी के लिए बनी नालियों की लंबाई सिर्फ 855 किलोमीटर है, जिनकी चौड़ाई भी बहुत अधि‍क नहीं है. ऐसे में लगातार बारिश के कारण पानी निकलने की बजाय जमा होना स्वाभाविक ही था और साथ ही स्वाभाविक थी भारी तबाही.

आर्थिक नुक्सान: चेन्नई में जो भयंकर बरसात हो रही है, उसमें ज्ञात तौर पर अब तक 300 के आस पास लोग मारे जा चुके हैं तो 50 हजार करोड़ से ज्यादे का नुक्सान शुरूआती दिनों में ही हो चूका है, जिसके बढ़ते जाने की सम्भावना है. चूँकि, चेन्नई भारत के चार बड़े महानगरों में शामिल है, जहाँ दुनिया भर की टेक कंपनियों के दफ्तर हैं और यह शहर तमाम अंतर्राष्ट्रीय शहरों से सीधा जुड़ा हुआ भी है, जिसकी कनेक्टिविटी हवाई अड्डे की डिस्टर्बेंस से बुरी तरह प्रभावित हुई है. 

प्रशासनिक चुस्ती: चेन्नई के हालत की बात करें तो गृहमंत्री मिनिस्टर राजनाथ सिंह ने सदन को बताया की NDRF की 30 टीमें बाढ़ में फंसे लोगों को बचाने में लगी हैं तो नेवी के जहाज आईएनएस एरावत को राहत सामग्री के साथ चेन्नई भेजा जा चुका है. तमिलनाडु की मुख्यमंत्री और भारतीय प्रधानमंत्री बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का हवाई दौरा करके प्रशासनिक अमले को चुस्त-दुरुस्त करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं, किन्तु लाखों लोग अभी बाढ़ में फंसे हैं और खाने के हेलिकॉप्टरों से खाने के पैकेट गिराए जाने के बावजूद अफरातफरी मची हुई है. 


सकारात्मक कॉर्पोरेट: सकारात्मक बात यह नज़र आ रही है कि सरकारी मदद के साथ-साथ तमाम प्राइवेट कंपनियां पीड़ितों की मदद के लिए खुलकर सामने आ रही हैं. दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग कंपनी फेसबुक पिछले दिनों में कई आपदाओं में सकारात्मक रूप में सामने आयी है. इस बार भी फेसबुक ने चेन्नई के बाढ़ पीड़ि‍ताें की सुरक्षा के लिए सेफ्टी चेक फीचर एक्टिवेट कर दिया है, जिसके तहत लोग फेसबुक पर अपने परिवारों और दोस्तों को अपने सुरक्षित होने की जानकारी दे सकते हैं तो इस फीचर के जरिए बाढ़ पीड़ित फेसबुक पर लोगों से मदद की अपील भी कर सकते हैं. फेसबुक के साथ दुनिया का सबसे बड़ा सर्च-इंजिन गूगल भी इस बाढ़ के बाद चेन्नई के लोगों के लिए क्राइसिस रिस्पॉन्स सर्विस के तहत एक खास रेस्क्यू पेज बनाया है जिसमें बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों की जानकारी समेत कई हेल्पलाइन नंबर दिए गए हैं जहां से बाढ़ पीड़ित मदद की अपील कर सकते हैं. इसके अलावा यहां मैप के जरिए बाढ़ से डूबे हुए इलाके भी दिखाए जा रहे हैं ताकि रेस्क्यू ऑपरेशन की टीम या पीड़ित के परिजन उनकी मदद कर सकें. न केवल गूगल या फेसबुक बल्कि भारतीय कंपनियां भी इस आपदा के समय बेहद सकारात्मक रूख अख्तियार किये हुए हैं. इनमें ओला कंपनी ने पानी में फंसे लोगों के लिए बोट भेजी है तो  ज़ोमैटो ने 'मील फॉर फ्लड रिलीफ' नाम की सर्विस शुरू की है, जिसके जरिये शहर और शहर से बाहर के लोग किसी भी जरूरतमंद के लिए खाना खरीदकर उस तक पहुंचा सकते हैं. अर्बनक्लैप सर्विसेज ने चेन्नै के 3 बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों में पेस्ट कंट्रोल कैम्प का आयोजन किया है तो हेल्थकेयर ऐप प्रैक्टो ऐसे वेरिफाइड डॉक्टरों और अस्पतालों की लिस्ट उपलब्ध करवा रही है जिन्हें लोग कॉल कर सकते हैं. पेटीएम, वोडाफोन, बीएसएनएल और एयरटेल जैसी कंपनियों ने मोबाइल पर बात करने की मुफ्त सुविधाओं में अपना योगदान दिया है. इतने के बावजूद चेन्नई बाढ़-पीड़ितों की समस्या की विकरालता को देखते हुए और कॉर्पोरेट घरानों को आगे आने की आवश्यकता है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हालत को बदलने में सहायक हो सकते हैं. 

पब्लिक सपोर्ट: प्रशासन और सेना के साथ सोशल मीडिया पर लोग जोरशोर से 'राहत अभियान' चला रहे हैं, जिसमें एक तरफ #ChennaiRainsHelp के साथ फंसे हुए लोग मदद मांग रहे हैं तो कुछ लोगों ने मदद के लिए अपने घरों के दरवाजे खोल दिए हैं. सोशल मीडिया पर जो भी मदद मांग रहा है वहां 'रिप्लाई' कर मददगार घरों का पता दे रहे हैं और आने का रास्ता तक बता रहे हैं. जाहिर है, पहले चेन्नई के दर्द को राहत पहुंचाने की आवश्यकता है तो उसके बाद इस बाबत भी विचार करना ही होगा कि ऐसे हालत न आएं, उसके लिए हमें किन मुद्दों पर ध्यान देना होगा तो और एफिशिएंट तरीके से हालत को संभालने के लिए प्रशासन, कॉर्पोरेट और पब्लिक में बेहतर तालमेल की गुंजाइश किस प्रकार खोजी जा सकती है.

इन क्रमवार बिन्दुओं पर गौर करने से जाहिर है कि इनका हल भी इन्हीं में छुपा हुआ है. सबसे मुश्किल बात यह है कि बरसात, बाढ़, भूकम्प, महामारी जैसी किसी भी बड़ी आपदा से निपटने में हमारे प्रशासन को अभी काफी लम्बा सफर तय करना है तो बढ़ती आबादी और भ्रष्टाचार ने इन समस्याओं को और विकराल बना दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने भी दिल्ली में भूकम्प की बाबत सरकार को चेताया है, किन्तु इन्हें सुनता कौन है, जब तक समस्या सर पर नहीं आ जाती. ऊपर से, भ्रष्टाचार से पनपी अवैध निर्माण जैसी समस्याएं शहरों की समस्याएं बढ़ाती ही हैं. समझना मुश्किल नहीं होगा कि वर्तमान सरकार भी शहरीकरण नीतियों पर ही चल रही है और स्मार्ट-सिटीज जैसे प्रावधानों के सहारे शहरों पर भार बढ़ाने की कवायद ही हो रही है. बदलते समय में हमें स्मार्ट-विलेज की आवश्यकता ज्यादे थी, जहाँ रोजगार और आबादी के तालमेल के साथ-साथ अपेक्षाकृत अधिक ज़मीनें हैं. केंद्र और तमाम राज्य-सरकारों को सोचना होगा कि गाँवों के लोगों को हम शहर बुलाते जा रहे हैं, और ऐसे किसी हालात में यह नीतियां हमारी मुसीबतें और बढ़ाएंगी ही. हालाँकि, इस हर समस्या के बाद आँखें बंद कर लेते हैं और चेन्नई की समस्या को भी कुछ दिनों बाद भूल ही जायेंगे. शायद किसी नयी समस्या के इन्तजार में... !!

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