अभिव्यक्ति की आज़ादी माने देशद्रोह और देशभक्ति मतलब भीड़तंत्र! Freedom to speech and Patriotism, Incivism and mobocracy, hindi article, mithilesh ke lekh

जेएनयू का मुद्दा निश्चित रूप से बेहद गंभीर मुद्दा है, लेकिन क्या वाकई यह इतना महत्वपूर्ण मुद्दा था कि इसमें अमित शाह, नीतीश कुमार, अरविन्द केजरीवाल, टॉप कम्युनिस्ट लीडर्स के संग हाफीज़ सईद को भी शामिल कर लिया गया! यही हाल कुछ दिन पहले दादरी में एखलाक की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या के समय हुआ था, जिसमें संयुक्त राष्ट्र संघ के बान की मून के अतिरिक्त सबको ही शामिल करने की ज़ोरदार कोशिश हुई थी! कभी-कभी लगता है कि देश के पास विचारधारों के टकराव और उस पर देशव्यापी चर्चा के अतिरिक्त हमारी राजनीतिक जमात और बुद्धिजीवियों के पास कोई दूसरा कार्य नहीं है! कोई कानून नहीं, कोई कोर्ट नहीं, कोई समाज नहीं.... बल्कि हर एक समस्या का हल राजनीति से ही किया जाने लगा है. यही मामला इस बार भी हुआ है. निश्चित रूप से जेएनयू में देश विरोधी नारे लगना और आतंकवादियों को महिमामंडित करना उचित नहीं है और इसके लिए कानून को कड़ी से कड़ी और त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए. लेकिन, क्या आप इस आधार पर उन पत्रकारों पर भी हमला कर सकते हैं, जो मामले की सुनवाई करने आये हों? वह भी कोर्ट परिसर में? हमला जो हुआ सो हुआ, लेकिन क्या आप इसके बाद सत्तारूढ़ पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव द्वारा इस हमले को जायज़ ठहराने वाले बयान की अपेक्षा कर सकते हैं? यहाँ इस लेख में दो बातों की ओर गौर किया जाना चाहिए. पहला 'अभिव्यक्ति की आज़ादी' और देशद्रोह में फर्क करना सीखें हम और दूसरी बात 'देशभक्ति और भीड़तंत्र' में फर्क करना उससे भी ज्यादे आवश्यक है! जाहिर तौर पर यह दोनों भाव 21 वीं सदी में मिक्स कर दिए गए हैं, जो किंचित भी जायज़ नहीं हैं. मुश्किल यहीं तक हो तो कुछ गनीमत भी हो, किन्तु समस्या इससे आगे बढ़कर यह आती है कि करते तो इसे बेहद थोड़े लोग हैं, किन्तु जल्द ही देश भर में पक्ष-विपक्ष के वार में बदल जाती है और राजनीतिक, सामाजिक, मीडिया जैसे संस्थान कानफोड़ू बहस में लग जाते हैं. हमारी राजनीति इसमें नमक-मिर्च लगाती है और देश में विभाजन करके वोट-बटोरने की गणित को चरम तक पहुँचाया जाता है. 

सवाल दोनों तरफ का है! आखिर हम किसी मामले को साधारण रूप में क्यों नहीं ले सकते हैं? भाई, जेएनयू में राष्ट्रविरोधी कार्य हुआ, पुलिस के पास शिकायत गयी और पुलिस ने कार्यवाही की! मामला यहाँ ख़त्म होना चाहिए था और अगर वास्तव में कन्हैया और दुसरे स्टूडेंट्स के साथ किसी पक्ष को अन्याय लगा हो तो उनको मामले में इन्तेजार करना चाहिए था अथवा गैर-राजनीतिक रूप से लड़ना चाहिए था! सच पूछा जाय तो इन कानूनी मसलों में राजनेताओं को पड़ना ही नहीं चाहिए था और कन्हैया समेत दुसरे स्टूडेंट्स को खुद ही बचाव करने देना चाहिए था. आखिर, हमारे देश में कानून, न्यायपालिका जैसी संस्थाएं क्यों हैं? क्या सच में यह सब दिखावटी ही हैं और हर एक समस्या को राजनीतिक रूप से ही हैंडल किया जाना चाहिए? इसके बाद तो जो कुछ हुआ वह और भी दुखदायी था. दिल्ली की पटियाला हाऊस अदालत में जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की देशद्रोह मामले में पेशी के दौरान छात्रों और पत्रकारों से मारपीट की गई. कई पत्रकारों ने अपने अनुभव ट्विटर पर भी साझा किए हैं. एक तरफ जहां इस घटना की कड़ी आलोचना हो रही है, वहीं भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय ने इस घटना को सही ठहराया. भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने ट्वीट किया, "दिल्ली के वकीलों ने पटियाला हाउस कोर्ट में पाकिस्तान समर्थक छात्रों की धुलाई कर दी, देशभक्तों का आक्रोश स्वाभाविक है. जो हुआ वो एक झलक है. पाकिस्तान समर्थक देशद्रोहियों को हर गली मे जूते पड़ें तो भी आश्चर्य नही होना चाहिए." अब सवाल यह है कि इस पूरे के पूरे मामले में कानून की मर्यादा कहाँ है? कोर्ट की मर्यादा कहाँ है? फैसला करने और उसको जायज़ / नाज़ायज़ ठहराने के लिए जज की आवश्यकता भी क्योंकर है? अगर सच में हमें देश को आगे लेकर जाना है तो इस तरह की राजनीति त्यागने में ज़रा सी भी देर नहीं करनी चाहिए, अन्यथा देशद्रोह और भीड़तंत्र दोनों ही हमारे देश का चिथड़ा उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे और यह देश की जनता के लिए बेहद घातक संकेत है. 

इस पूरे मामले पर कुछ अतिवादी बयान आये हैं, जिनसे बचा जा सकता था, मगर जान बूझकर इसे तूल दिया गया. सबसे पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जेएनयू परिसर में गए और उन्होंने 'देशद्रोह के आरोपियों' की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर एक तरह से वकालत ही कर दी. उसका जवाब देने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह मैदान में उतरे और उन्होंने बाकायदा ब्लॉग लिखकर, राहुल गांधी को देश बंटवारे की याद दिला दी. अरविन्द केजरीवाल ने उन 'निर्दोष छात्रों' पर कार्रवाई को लेकर मोदी सरकार को महंगाई की याद दिलाई तो नीतीश कुमार ने प्रेस कांफ्रेंस कर के कहा कि ऐसा माहौल बनाया जा रहा कि जो भी संघ भाजपा की विचारधारा से जुड़ा है, वो देशभक्त है और बाकी देशद्रोही. यही नहीं, आप आश्चर्य करेंगे कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इस पूरे मामले में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी हाफ़िज सईद का हाथ बता डाला तो हाफ़िज सईद ने भी पाकिस्तान से बयान जारी करके राजनाथ सिंह को गुमराह करने वाला बता डाला! अब इस पूरे बहस के मामले में केवल अमेरिकन राष्ट्रपति की उम्मीदवारी की रेस में लगे डोनाल्ड ट्रम्प की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है और उसके बाद उत्तर कोरिया के किम उन जोंग की प्रतिक्रिया इस मामले में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है! 

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