धमकी नहीं समाधान पर हो ध्यान! Arvind Kejriwal, Bureaucrats and Narendra Modi, Hindi Article, Mithilesh

जाने कितनी फिल्मों में हमने देखा होगा कि एक पढ़े-लिखे आईएएस/पीसीएस अधिकारी को अनपढ़-गंवार नेता के हाथों का खिलौना बनना पड़ता है. चूंकि दिल्ली के मुख्य्मंत्री अरविन्द केजरीवाल को सोशल मीडिया यूजर्स 'फुल टाइम फिल्म समीक्षक और पार्ट टाइम मुख्यमंत्री' कहते हैं तो जाहिर है कि उन पर फिल्मों का प्रभाव तो पड़ना ही था. 80 - 90 दशक के नेताओं की तरह उन्होंने भी अधिकारियों को अपने अंदाज में खूब हड़काया और वह काफी चर्चित भी हुआ. मुश्किल यह हो गयी कि अपने इस दांव पर अरविन्द केजरीवाल अभी ठीक से इतरा भी नहीं सके होंगे कि उनके राजनीतिक विरोधी नरेंद्र मोदी ने इसी दांव को 'उल्टे ढंग' से चल दिया. जहाँ अरविन्द केजरीवाल ने अधिकारियों को डराने और धमकाने की नीति पर चलने की राह चुनी, वहीं नरेंद्र मोदी ने ब्यूरोक्रेट्स को सहलाने और तारीफ़ करने की राजनीति अपनाई. जाहिर है, इस मामले में नरेंद्र मोदी बीस साबित हुए. खुद एक आईआरएस अधिकारी रह चुके अरविन्द केजरीवाल की धमकी भरी भाषा पर कइयों को आश्चर्य भी हुआ. हम कुछ भी बर्दाश्त कर सकते हैं, लेकिन राजनीति नहीं! ऐसा कहना है आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का. पहली बात तो यह कि कभी खुद नौकरशाह रहे केजरीवाल अपनी खुद की एक राजनीतिक पार्टी द्वारा राजनीति के क्षेत्र में कदम रख चुके हैं, फिर भी वह अपनी बातों के द्वारा राजनीति को हमेशा घृणा का विषय ही जाहिर करते हैं. उनका अफसरों से यह कहना कि अगर आप राजनीति में रुचि रखते हैं तो इस्तीफा दें, चुनाव लड़ें और हमारा सामना करें, अपने आप में हास्यास्पद है. केजरीवाल की इस भाषा से साफ़ सन्देश जाता है कि अधिकारियों को 'अपनी बुद्धि' का प्रयोग नहीं करना चाहिए और किसी पार्टी कार्यकर्त्ता की तरह जो केजरीवाल और उनके समर्थक कहें, उसे यथावत मान लिया जाना चाहिए, बेशक वह राज्य और देश के खिलाफ ही क्यों न हो! फिल्म समीक्षक केजरीवाल जी पुराने बॉलीवुड के विलेन्स से काफी प्रभावित नज़र आते हैं, जो गैर कानूनी कार्यों को कराने के लिए तमाम अफसरों पर भारी दबाव तो बनाते ही थे, धमकी का भी खूब सहारा लेते थे. 

'सिविल सर्विस डे' पर ब्यूरोक्रेट्स को संबोधित करते हुए केजरीवाल ने यह भी कहा कि अधिकारियों को ईमानदार और पारदर्शी व्यवस्था के लिए काम करना चाहिए, किन्तु उनकी भाषा तो यही कह रही थी कि आम आदमी पार्टी की बातें अफसरों को बिना किन्तु-परन्तु के सुननी ही होगी. हालाँकि, उनकी यह बात कुछ अर्थों में सही है, क्योंकि कार्यपालिका का तो काम ही यही है व्यवस्थापिका के द्वारा बनाए नियमों का पालन करना और कराना. अगर अफसर साथ नहीं देते हैं तो किसी भी मंत्री या मुख्यमंत्री के लिए सरकार चलाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा. सरकार में अफसर अभिन्न अंग होते है कार्यप्रणाली का, और अगर अफसर या नौकरशाह किसी कार्य को टालें या आनाकानी करें तो ये क़ानूनी रूप से भी गलत है और उस पर कार्यवाही करने का अधिकार भी व्यवस्थापिका का ही है. ब्यूरोक्रेसी से सरकार का यह उम्मीद रखना जायज़ ही है कि वे सरकार का साथ दें और नीतियों और कार्यक्रमों के क्रियान्यवयन के लिए मिलकर काम करें, किन्तु कई मामलों में खुद दिल्ली के मुख्यमंत्री अपनी सीमाओं से पार चले जाते हैं. आखिर, दिल्ली एक केंद्रशासित प्रदेश है और उसके मुख्यमंत्री बिना उप राज्यपाल और केंद्रीय गृहमंत्री के 'कुछ ख़ास अहमियत' नहीं रखते हैं. यह 'संवैधानिक संरचना' ही है, जिसके तमाम कारण है. ऐसे में कभी सीएम प्रधानमंत्री को 'कायर और मनोरोगी' कहेंगे तो कभी उप राज्यपाल (एलजी) को 'टुकड़े पर पलने वाला कुत्ता' कहेंगे! ऐसे में उन्हें 'नौकरशाही' को सलाह देने का नैतिक हक़ भी है क्या, यह बात उन्हें स्वयं ही विचार करनी चाहिए. यह ठीक बात है कि दिल्ली के लोगों ने उनकी पार्टी को चुनाव में भारी बहुमत दिया है, किन्तु यह बहुमत 'संविधान विरोधी' अराजक कार्य करने के लिए मिला है क्या? ऐसे में अपने कई 'उल्टे-पुलटे' कार्यों के लिए अधिकारियों की सीधी सहमति की चाह लिए केजरीवाल महोदय को अपने राजनीतिक व्यवहार पर मंथन करना चाहिए. जनता भी 'नौटंकी' को ज्यादा दिनों तक बर्दाश्त नहीं करती है. हालाँकि, इस बात में भी शक नहीं है कि अभी तक अरविन्द केजरीवाल की सरकार में 'कम भ्रष्टाचारी' हैं, किन्तु जैसे-जैसे समय गुजरता जायेगा, तब यह परीक्षा और भी कठिन होगी और असल परीक्षा किसी राजनेता की समय गुजरने के साथ ही होती है. जिस प्रकार बात-बेबात पर विज्ञापनों से अरविन्द केजरीवाल दिल्ली को पाट देते हैं, ऐसे में वह अधिकारियों से क्या सहयोग चाहते हैं भला! थोड़ा सावधानी से देखा जाय तो, पिछले साल फरवरी में सत्ता में आने के बाद कई मौकों पर केजरीवाल सरकार और ब्यूरोक्रेसी के बीच मतभेद सामने आए हैं. 

दिसंबर में दानिक्स कैडर के दो अधिकारियों के निलंबन के विरोध में सभी नौकरशाह एक दिन के मास-लीव पर चले गए थे, तो वहीं केजरीवाल ने 39 आईएएस  अफसरों कि लिस्ट बना डाली जो दिल्ली  में काम करने के अनुकूल नहीं थे. इसके अलावा उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के बीच अधिकारों को लेकर टकराव का मामला अक्सर सामने आता ही रहता है. खुद मुख्यमंत्री को भी सोचना चाहिए कि उनके मात्र डेढ़ साल के कार्यकाल में अधिकारियों के साथ इतने विवाद किस हद तक ठीक हैं और अगर यह अनवरत जारी रहे तो फिर किस प्रकार से प्रशासनिक व्यवस्था दुरुस्त होगी? तब क्या वह 'अरविन्द केजरीवाल' ज़िंदाबाद बोलने वालों को 'आईएएस और दुसरे अधिकारी' बनने का नियुक्ति-पत्र देंगे? केजरीवाल को समझना ही होगा कि ये अफसर कोई राजनेता नहीं है, जो पांच साल बाद नहीं दिखेंगे! अगर 'आप' दिल्ली में 15 साल टिकने का सपना देख रहे हैं, तो इन अधिकारियों का कार्यकाल भी 60  साल का होता है, फिर मुलाकातें तो होती रहेंगी. इसलिए ये बहुत ही आवश्यक है कि तालमेल बना कर चला जाये. जैसाकि उपरोक्त कहा है कार्यपालिका, व्यवस्थापिका का अभिन्न अंग है और ये अंग अगर सही ढंग से काम न करे तो सरकार और सरकारी काम सब अस्त-व्यस्त हो जायेंगे. अगर दोनों के बीच कोई मतभेद है तो आपसी  बातचीत से उसे सुलझाया जाये, न कि धमकी दी जाये. धमकी देना कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता. अगर अरविन्द केजरीवाल को यह मामले न समझ आएं तो उन्हें प्रधानमंत्री का इसी सन्दर्भ में दिया गया सम्बोधन भी सुनना और समझना चाहिए. आखिर, सीनियर से सीखने में कोई बुराई तो हैं नहीं, अगर उसके भीतर कोई अच्छी क्वालिटी हैं तो? सिविल सर्विस डे के कार्यक्रम में पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि 'मैं कभी किसी अफसर से निराश नहीं हुआ, यह सोचकर काम किया कि परमात्मा ने हर व्यक्ति में अच्छाई दी है और राजनेताओं का काम उस अच्छाई को पकड़ना है. बेशक पीएम मोदी के इस बयान को नौकरशाहों को लुभाने के तौर पर देखा जाए, किन्तु उनकी बात में काफी हद तक 'सच्चाई' भी है और इस बात से दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल भी शायद ही इंकार करें!

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