वृद्धआश्रम नहीं है हमारी संस्कृति का हिस्सा, किन्तु... Old age home culture in India, Social issue, Hindi Article, Mithilesh

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महात्मा गांधी हमारे देश ही नहीं विश्व के इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो चुके हैं. हालाँकि उनके नाम के टाइटल के सहारे नेहरू परिवार अभी तक देश पर शासन कर रहा है, वहीं देशवासी और सरकारें लगभग भूल चुकी हैं या फिर जानने की जरुरत नहीं समझते कि महात्मा गांधी के भरे- पूरे परिवार का क्या हुआ? वो लोग अब कहाँ हैं? हालाँकि, मामला चर्चित होने पर भारत लौटे महात्मा गांधी के पोते कनुभाई रामदास गांधी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोन पर बातचीत की है. जी हाँ, दक्षिणी दिल्ली के जेजे कॉलोनी में एक ओल्ड एज होम में रह रहे कनुभाई की पीएम मोदी से यह बातचीत केंद्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा ने करवाई. महात्मा गांधी के इस वंशज से मुलाकात के बाद महेश शर्मा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें कनुभाई से मिलने का निर्देश दिया था, तो उन्होंने फोन पर कहा कि कनुभाई से मिलकर उनकी जरूरतों और अपेक्षाओं के बारे में एक रिपोर्ट दी जाए. जानकारी के अनुसार, पीएम मोदी ने यह भी कहा है कि कनुभाई के लिए जरूरी सुविधाओं के लिए सरकार इंतजाम करेगी, तो उन्होंने खुद फोन पर कनुभाई से गुजराती में बातचीत की. हालाँकि, जिस महात्मा गांधी ने देश को आज़ादी दिलाई आज उन्हीं राष्ट्रपिता के अपने परिवार की चर्चा उनके वर्तमान हालात को लेकर है. देश की आजादी के लिए अपना घर- बार, सुख-शांति सब कुछ न्योछावर करने वाले महात्मा गांधी के अपने ही पौत्र आज वृद्धआश्रम में रहने को मजबूर हैं. वैसे तो  बहुत सारी पार्टिया गांधी के नाम के सहारे अपना भविष्य संवार रही हैं, लेकिन यह विडंबना ही तो है कि आज उनके खुद के पौत्र कनु रामदास गांधी अपनी पत्नी सहित  दिल्ली के एक वृद्धाश्रम में रहते हुए पाए गए हैं. गौरतलब है कि कनु गांधी एमआईटी से शिक्षा प्राप्त हैं और नासा में  भी काम कर चुके हैं. अपनी इस हालत के लिए  सरल स्वभाव के वयोवृद्ध कनु गांधी किसी को दोषी नहीं ठहराते, लेकिन स्वाभिमान के साथ यह जरूर कहते हैं कि वह किसी के आगे मदद के लिए हाथ नहीं फैला सकते. अभी तक जो जानकारियां मिली हैं, उसके अंसुार महात्मा गांधी के बेटे रामदास और उनके बेटे कनु अमेरिका में अपने अकेलेपन की वजह से भारत आ गये.

उन्होंने कुछ दिन अपने गृहनगर गुजरात के आश्रमों में बिताया और उसके बाद दिल्ली-फरीदाबाद बार्डर पर स्थित वृद्धाश्रम में रह रहे हैं. जैसाकि हमने विदेशों में माहौल के बारे में सुना है कि वहां किसी के लिए किसी के पास समय नहीं है शायद इसी लिए अपनी सारी जवानी अमेरिका में बिताने के बावजूद कनु गांधी को अकेलेपन ने ऐसा घेरा कि उन्हें अपने देश कि याद आ गयी लेकिन अफ़सोस कि यहाँ भी उन्हें परिवार के नाम पर वृद्धाश्रम का ही सहारा मिला. हाँ, इतना जरूर है कि उन्हें अपने देश में रहने का सुकून होगा. वैसे, यह मामला अकेले कनु भाई का ही नहीं, बल्कि बदलते समय में भारत के अधिकांश वृद्धजन अपने जीवन के अंतिम पड़ाव यानी कि बुढ़ापे को लेकर चिंतित हैं. वहीं दूसरी ओर भारत में बढ़ते ओल्ड ऐज होम (वृद्धाश्रम) के चलन ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है. भारत जैसे देश में जहाँ माता-पिता को देवता सामान समझा जाता था, आज वहां बढ़ते वृद्धआश्रम हकीकत बयां करने के लिए काफी हैं कि हमारे समाज में किस नकारात्मक तरीके से बदलाव आ रहा है. महानगरों और नगरों में आधुनिकता से जीने की ललक में हम साल भर में एक बार कोई न कोई दिवस हम जरूर मनाते हैं, जैसे मदर्स डे, फादर्स डे और अपने कर्तब्य की इतिश्री कर लेते हैं. लेकिन इन दिवसों का उन बुजुर्गों के लिए क्या मायने हैं जिनके बच्चे ठीक से बात भी नहीं करते. यह कहना गलत न होगा कि ओल्ड एज होम होना हमारे समाज के लिए कलंक हैं, किन्तु धीरे-धीरे यह समाज की सच्चाई बनता जा रहा हैं. जिन बच्चों को पालने के लिए माँ-बाप अपनी ज़िन्दगी लगा देते हैं, उनकी शिक्षा और सुविधा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं, उनको जीवन के अंतिम क्षण में अकेला छोड़ देना कितना बड़ा अपराध है, इस बात की कल्पना भी मुश्किल है. खासकर भारत जैसा देश, जहाँ लोग नाती-पोतों से ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं और ऐसे में संपन्न लोगों को अपने अभिभावकों के बारे में सोचना चाहिए, उन्हें छोड़ नहीं देना चाहिए जब उन्हें अपने बच्चों की सबसे ज्यादा जरुरत होती है.

आज समय बदल रहा है, तो नई पीढ़ी की सोच तथा जीवन जीने की शैली में भी परिवर्तन हो रहा है. इसका सीधा प्रभाव परिवारों पर पड़ रहा है. आज के युवा जीवन में किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं करते हैं, फिर चाहे वे अपने माता-पिता ही क्यों न हो! आज के युवा को अपने करियर को लेकर बहुत ज्यादा असुरक्षा का सामना करना पड़ता है, तो बदलती परिस्थितियों में कोई विदेशों में बसना चाहता है तो कोई अपने ही देश में, महानगरों में भविष्य तलाशता है. इस चक्कर में वो एक जगह टिक नहीं पाते हैं और ऐसे में माता-पिता की जिम्मेदारी उन्हें बोझ लगने लगती है. शहरों में आबादी का केंद्रीकरण और गलाकाट प्रतियोगिता भी अपने बुजुर्गों से दुराव का एक बड़ा कारण है. ऐसे में, वे इस बोझ से छुटकारा पाना चाहते हैं और वृद्धाश्रम के रूप में उन्हें समस्या का 'विकलांग समाधान' मिल जाता है. बिचारे बुजुर्ग अपना सारा जीवन और जीवन की सारी कमाई अपने बच्चों पर लुटाने के बाद खाली हाथ और बेबस हो कर आश्रम जाने को मजबूर हो जाते हैं और फिर जीवन के बाकी दिन अपने परिवार से दूर रह कर तड़पते रहते हैं, सिसकते रहते हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसे कृत्य समाज के संपन्न-वर्ग द्वारा ज्यादा देखने को मिल रहे हैं, तथाकथित आधुनिकता और बड़ी सोसायटी के नाम पर! इन्हीं लोगों द्वारा आजकल ये बात आम तौर पर सुनने को मिल जाती है कि हमारे समाज में पश्चिमी सभ्यता का असर हो गया है और वृद्धाश्रम भी उसी विकृति का एक हिस्सा है. लेकिन ऐसे लोग एक बात भूल जाते हैं कि पश्चिमी देशों की तुलना में हमारी संस्कृति और सभ्यता बिलकुल अलग है. पश्चिम में बच्चे बालिग होने के साथ ही स्वतंत्र हो जाते हैं और अपनी जिम्मेदारी खुद उठाते हैं. वो माँ बाप को घर से नहीं निकालते, बल्कि माँ-बाप का घर खुद ही छोड़ देते हैं. इसके उलट हमारे यहाँ हमारी सभी जरूरतों को चाहे वो  अपनी पढ़ाई को पूरी करने तथा कमाई शुरू करने  और उसके बाद तक का ध्यान अभिभावकों द्वारा रखा जाता है. यहाँ बच्चों को पालने - पोसने की एक परंपरा और संस्कृति है! इसके लिए माता-पिता अपने जीवन में कोई कसर नहीं छोड़ते और अपने भविष्य की चिंता किये बिना अपनी सारी कमाई अपने बच्चों पर खर्च कर देते हैं. और तो और उनकी अचल सम्पति पर भी बच्चे स्वतः ही अपना अधिकार समझने लगते हैं.

जाहिर है, बुजुर्गों की संपत्ति तो हम लेना चाहते हैं, लेकिन उनके जीवन के बचे चंद लम्हों में उन्हें भावनात्मक सहारा नहीं देना चाहते हैं! आखिर यह कैसा चारित्रिक दोहरापन है, जो हमारे ही बुजुर्गों को पीड़ा पहुंचाने को उद्यत रहता है? आज हम एकल परिवार को ज्यादा महत्व दे रहे हैं और एकल परिवार का मतलब पति-पत्नी और बच्चे हैं. ऐसे में, बच्चों के बड़े होने पर उनके रोजगार की तलाश में बाहर जाने पर जाहिर सी बात है माता-पिता अकेले रह ही जायेंगे. और विवाह के बाद तो बच्चों और रोजगार के चलते माँ बाप से मिलना भी दूभर हो जाता है. ऐसे में माँ-बाप बोझ  लगने लगते हैं और यहीं से शुरू होता है उनसे पीछा छुड़ाने का सिलसिला! पहले के समय में संयुक्त परिवार में सब साथ रहते थे इस लिए एक दूसरे की मदद और सेवा की चिंता नहीं होती थी. पहले लोगों का खेती और पारम्परिक व्यवसाय होता था जिससे युवाओं को कहीं बाहर जाने की जरुरत भी नहीं होती थी. अब वो समय नहीं रहा, क्योंकि खेती से रोजमर्रा की जरूरतें पूरी नहीं हो सकती हैं, तो स्थानीय तौर पर सरकार की गलत नीतियों के कारण रोजगार का भारी संकट खड़ा हो गया है और फिर महानगरों की ओर पलायन इस विकराल होती समस्या का बड़ा कारण बन गया है. हालाँकि, कुछेक मामले ऐसे भी सामने आते हैं, जब बुजुर्ग की ज़िद्द और तानाशाही व्यवहार के चलते बच्चे उनसे तालमेल नहीं बिठा पाते हैं. हालाँकि, ऐसे मामले बेहद कम हैं और किसी 60 साल से ज्यादा के व्यक्ति की आदतों को बदलने की बजाय बच्चों को बर्दाश्त करना और तालमेल बिठाना सीखना चाहिए, क्योंकि कल वह खुद भी बुजुर्ग होंगे और फिर कैसा लगेगा, अगर उनका अपना ही बच्चा उन्हें घसीटकर, बेरहमी से वृद्धाश्रम की ओर छोड़ आएगा! ऐसे में, क्यों न हम महात्मा गांधी के पोते के मामले को ही आधार मानकर इस सामाजिक संरचना में बेहतर मार्ग ढूँढ़ने का प्रयत्न करें तो तमाम सरकारें बजाय कि व्यक्तिगत रूप से वृद्धों की समस्याएं हल करने के, इस पर एक व्यापक नीति का निर्माण करें, जिससे हमारा समाज वृद्धों पर अत्याचार करने का दोषी न बने!
- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली. 

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