'बाढ़ और सूखे' से कब तक जूझेगा भारत !! Drought and Flood in India, Hindi Article, New Mithilesh, Political Policies



हालांकि, प्राकृतिक आपदाओं पर किसी का नियंत्रण नहीं होता है पर कम से कम दो प्राकृतिक आपदाएं ऐसी जरूर हैं जो एक-दूसरे के विपरीत प्रवृत्ति की होने के साथ-साथ निश्चित समय पर ही आती हैं. जी हाँ, बाढ़ और सूखे का समय लगभग निश्चित ही होता है और बेहद अजीब स्थिति है कि कहीं पानी की अधिकता तो कहीं पानी की कमी से हमारा देश बेजार रहता है. वैसे तो यह आदर्शवादी बात कही जा सकती है, किन्तु इनसे निपटने का सर्वश्रेष्ठ तरीका 'नदियों को जोड़ना' ही है, जिस पर अटल बिहारी बाजपेयी (Drought and Flood in India, Hindi Article) ने ज़ोर दिया था, पर बाद में वह कांसेप्ट ही ठन्डे बस्ते में चला गया. ज़रा कल्पना कीजिये, आज बिहार के कई हिस्से बाढ़ की चपेट में हैं और अगर वही पानी बुंदेलखंड या महाराष्ट्र के विदर्भ इलाकों में नेचुरल तरीके से पहुंचे तो समस्या क्यों हल नहीं हो सकती? हालाँकि, इसमें सालों लग सकते हैं तो खर्च भी असीमित हो सकता है, पर क्या वह खर्च हर साल होने वाली उस बर्बादी से भी ज्यादा होगा जो 'सूखे और बाढ़' के कारण देशवासी झेलते रहे हैं. और क्षेत्रों की बात अभी छोड़कर अगर हम बिहार की ही बात करें तो जुलाई बीतते-बीतते वहां बाढ़ की स्थिति भयानक हो गयी है. 

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गोपालगंज में गंडक के मुख्य तटबंध में एक किलोमीटर तक दरार पड़ जाने से जिले में बाढ़ की विभीषिका गहरा गयी है, जिससे 18 लाख आबादी प्रभावित हो चुकी है, तो गंभीर रूप से बाढ़ प्रभावित जिलों की संख्या 10 हो गई है और लेख लिखे जाने की डेट, यानी 29 जुलाई की सुबह तक बाढ़ के कारण 22 लोगों की मौत की सूचना है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हवाई सर्वेक्षण कर रहे हैं, अधिकारियों को राहत व बचाव का निर्देश भी दे रहे हैं, किन्तु मामला कंट्रोल से बाहर हो गया है हर साल की तरह. पूर्णिया, किशनगंज, अररिया, दरभंगा, मधेपुरा, भागलपुर, कटिहार और सुपौल के साथ सहरसा और गोपालगंज भी बाढ़ प्रभावित जिलों (Drought and Flood in India, Hindi Article) में शामिल हो गए हैं. जाहिर है, बिहार जैसा एक गरीब राज्य हर साल बाढ़ की विभीषिका झेलता है और उसका कोई स्थाई समाधान निकाला नहीं जा सका है, ऐसे में वह राज्य कैसे प्रगति करेगा? जलस्तर में उतार-चढ़ाव जारी रहता है और इसी क्रम में सीमांचल में कोसी के जलस्तर में कमी के संकेत हैं जबकि खगडिय़ा के बलतारा में कोसी में उफान है. नदी का जलस्तर कई क्षेत्रों में प्रति घंटा आधा सेमी की रफ्तार से बढ़ रहा है. सहरसा में अब तक 200 घर कोसी के कटाव की भेंट चढ़ चुके हैं. मधेपुरा के आलमनगर में बाढ़ आश्रय स्थल में भी पानी घुस गया जिससे लोगों को नए जगह पर जाना पड़ा है. 

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यह सिर्फ बिहार की ही स्थिति नहीं है, बल्कि असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और कई तटवर्ती क्षेत्रों की भी कमोबेश यही स्थिति है. ऐसा प्रतीत होता है कि हर साल, वही हाल, जन-जीवन बेहाल होने से हम कोई सीख लेना ही नहीं चाहते हैं. पिछले दिनों नदीजोड़ के मुद्दे पर बिहार के तत्कालीन मुख्यमन्त्री जीतनराम मांझी ने प्रधानमंत्री (Jeetanram Manjhi letter to PM about flood in Bihar) को विस्तार से पत्र लिखा था, जिसमें कई महत्वपूर्ण बातों का ज़िक्र भी किया गया था. इस पत्र में मांझी ने बाँध-निर्माण, केन्द्रीय योजनाओं के कार्यान्वयन को सरलीकृत किया जाना, राष्ट्रीय गाद प्रबन्धन नीति, बाढ़ पूर्वानुमान हेतु आवश्यक संरचना का अधिष्ठापन, सिंचाई योजनाओं (Drought and Flood in India, Hindi Article) के अन्तरराज्यीय पहलू का समाधान, गंगा नदी में नौ-परिवहन की योजना एवं उसका अविरल प्रवाह सुनिश्चित किया जाना जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल किये गए थे. इस सम्बन्ध में 'राष्ट्रीय जल ग्रिड' की बात भी कई बार उछली, किन्तु नतीजा 'ढाक के तीन पात' ही रहा. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की महत्वाकांक्षी ‘नदी जोड़ो योजना’ को पूरा करने के लिए मोदी सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली अपने पहले बजट में 100 करोड़ रुपए आवंटित जरूर किया, पर ऊंट के मुंह में ज़ीरे वाली बात से ज्यादा इस पर आगे ठोस रणनीति का न होना चिन्ता पैदा करता है. गौरतलब है कि 2002 में राजग सरकार के समय अटल बिहारी वाजपेयी ने इस परियोजना के जरिए जल संसाधन और प्रबंधन के असंतुलन को दूर करने का दावा किया था लेकिन कानूनी पचड़े में फंसने के बाद यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई थी. 

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2004 में कांग्रेसनीत सरकार ने तो इस योजना के भारी-भरकम खर्च को देखते हुए इससे मुंह ही मोड़ लिया था. हालाँकि, तमाम पर्यावरणविद् नदियों को आपस में जोड़ने या उसके प्राकृतिक बहाव में किसी तरह के कृत्रिम व्यवधान को भविष्य के लिहाज से खतरनाक मानते रहे हैं पर इस बीच समाधान तो निकालना ही होगा. ऐसे में कई व्यक्तित्व 'नदियों' को जोड़ने को एक व्यवहारिक विकल्प मानते हैं, जिनमें आंध्र के सीएम भी शामिल हैं. आंध्र के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने देश में कृषि क्षेत्र में उन्नति और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं (Drought and Flood in India, Hindi Article) से बचने के लिए नदियों को आपस में जोड़े जाने की वकालत की है. और भी कई हस्तियों ने इसे बेहतर विकल्प बताया है, जिससे बाढ़ और सूखे से तो राहत मिलेगी ही, साथ ही साथ विद्युत्-उत्पादन, जल-यातायात (जिस पर सम्बंधित मंत्री नितिन गडकरी खूब जोर देते रहे हैं) और कृषि पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. जाहिर है, इस कदम से इकॉनमी भी बेहतर होगी तो लोगों के जीवन में खुशहाली होगी और तमाम लोग बंजारों की ज़िन्दगी जीने से मुक्ति पाकर अपने विकास की राह पर अग्रसर होंगे. उम्मीद की जानी चाहिए कि नरेंद्र मोदी की सरकार अपने पूर्ववर्ती अटल बिहारी बाजपेयी के सपने को हकीकत में बदलने का ठोस प्रयास करेंगे और हर साल हो रही असीमिति बर्बादी पर रोक लगाने में सक्षम होकर 'इतिहास-पुरुष' का दर्जा भी हासिल करेंगे!

- मिथिलेश कुमार सिंहनई दिल्ली.



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