... ताकि गाँधी की दोबारा हत्या' न हो! Mahatma Gandhi, death reason, Freedom Fighters, Great Leaders, RSS, Congress, Rahul Gandhi, Subramanian Swamy, Hindi Article, New



महात्मा गाँधी के रूप में हमारे पास एक ऐसी शख्सियत का प्रतिबिम्ब है, जिसकी प्रसांगिकता उसके मरने के 68 साल बाद तक बनी हुई है और उम्मीद है कि आगे भी बनी रहेगी. कहते हैं कि आलोचना से बचना तो स्वयं भगवान के लिए भी संभव नहीं रहा है, तो गांधी या किसी और की क्या बिसात है. निष्पक्षता से आंकलन करने पर महात्मा गाँधी के चरित्र में हमें बहुत विशालता दिखाई देती (Mahatma Gandhi Hindi Article New) है, इसलिए नहीं कि उन्होंने हमें अकेले 'आज़ादी' दिला दी, जैसा कि कई गीतों में 'दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल' वाला गीत (Free Fighters of India) गाया जाता है. यह एक मिथ्या धारणा ही है कि किसी एक के योगदान से हमें आज़ादी मिल गयी और आज जब 'गाँधी-हत्या' की बात राहुल गाँधी के बयान से होते हुए सुप्रीम कोर्ट और राज्यसभा पर चर्चा तक पहुँच चुकी है, तब इतिहास पर एक संक्षिप्त नज़र डाल लेना उचित ही रहेगा. 1857 की क्रांति से 1947 तक पहुँचते-पहुँचते भारत (तत्कालीन भारत और पाकिस्तान का संयुक्त रूप) का शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो आंदोलित न हो चुका हो और द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद बदली परिस्थितियों में ब्रिटेन के लिए लंबे समय तक भारत पर शासन कर पाना मुमकिन नहीं रह गया था. सशत्र क्रांतिकारियों के योगदान के प्रति आज भी भारतवासियों के मन में जितनी श्रद्धा है, उतनी शायद महात्मा गाँधी या दूसरे नेताओं के लिए कभी न हो सकेगी. 

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हालाँकि, महात्मा गाँधी ने भारत की छवि उस समय भी एक अहिंसावादी, शांतिप्रिय देश की प्रस्तुत जरूर की, जिसका लाभ हम आज तक उठा रहे हैं. आखिर वर्तमान पीएम नरेंद्र मोदी सहित हमारे किस नेता ने तमाम विश्व-मंचों पर यह नहीं कहा है कि 'हम गांधी के देश से हैं'. यह सिर्फ कहने भर का विषय ही नहीं है, बल्कि दुनिया भी गाँधी के नाम पर भारतवासियों की बात सुनती है. इसके साथ आज़ादी की लड़ाई को सिर्फ क्रांतिकारियों  तक सीमित न रखकर तमाम शांतिपूर्ण आन्दोलनों से इस असाधारण व्यक्ति ने उसमें जन-जन की सहभागिता के लिए अथक प्रयास भी किया. इसी कड़ी में हम देखते हैं तो पाते हैं कि कहीं न कहीं इस महान व्यक्ति पर मुस्लिम-तुष्टिकरण (Muslim Tushtikaran ka Aarop) का आरोप भी लगा और कई दक्षिणपंथी दबे स्वर में उसी का परिणाम 'देश-विभाजन' के रूप में भी देखते रहे हैं. इस बात में कोई संदेह नहीं है कि महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi Hindi Article New) ने अपने राजनीतिक विरोधियों की जबरदस्त अनदेखी की, जिसके पीछे उनके अपने कारण रहे होंगे. भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय ढीला-ढाला रवैया अपनाकर महात्मा गाँधी भी कहीं न कहीं लाखों मासूमों के जान जाने के दोषी भी रहे हैं. वह अंत तक कहते रहे कि 'बंटवारा उनकी लाश पर होगा', जिससे पाकिस्तानी क्षेत्र में रहने वाले लोग आखिर तक कंफ्यूजन में रहे और इसी के कारण लाखों लोग समय रहते प्लानिंग नहीं कर पाए और भड़के दंगों में उनकी जानें गयीं. 

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पाकिस्तानी क्षेत्र से आये हुए हिन्दू या किसी सिक्ख समुदाय के बुजुर्ग से आप बातें कर लें, तो वह महात्मा गांधी की महानता को 'दो कौड़ी' का साबित कर के रख देगा. कहीं न कहीं राजनीतिक अव्यवहारिकता ने जान-माल का भारी नुकसान कराया, जिसे समय रहते निर्णय लेकर कम किया जा सकता था. मगर निश्ठुर आंकलन करते समय हमें इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए कि हर नेता की, उस युग में अपनी सीमाएं होती हैं और कहीं न कहीं अंग्रेज़ हिन्दू-मुसलमान के बीच नफरत की बड़ी रेखाएं खींच चुके थे, जिसकी धुंधली दरारें पहले से ही हमारे समाज में मौजूद थीं. हाँ, महात्मा गाँधी सहित दूसरे कांग्रेसी नेताओं ने भी इस हालात की कुछ हद तक अनदेखी (Mistakes at the time of Freedom) जरूर की और उसी का परिणाम है कि लगभग उनकी विरोधी विचारधारा का नेतृत्व करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आनुषांगिक संगठन 'भाजपा' आज सत्ता में है. इसी सन्दर्भ में, राहुल गाँधी ने बेहद बचकाने ढंग से आरएसएस को महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi Hindi Article New) का हत्यारा बता दिया, जिसके लिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट माफ़ी मांगने को भी कह चुका है, किन्तु काश उन्हें यह बात समझ आ जाती कि तब तो नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी को बेशक मारा हो, किन्तु आज़ाद भारत में अगर महात्मा गाँधी के विचारों की लगातार हत्या हुई है तो उसके लिए 'कांग्रेस पार्टी' ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार रही है. जहाँ तक बात वर्तमान की है तो भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने संसद में महात्मा गांधी की हत्या से जुड़े कुछ सवाल दागे हैं, किन्तु कब किसको कितनी गोली लगी, लाश का पोस्टमार्टम क्यों नहीं हुआ इत्यादि 'वकीली सवालों' का कुछ खास मतलब नहीं है, क्योंकि गाँधी का शरीर बेशक मर गया हो पर उनके विचार आज भी विभिन्न रूपों में जीवित हैं. 

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संघ पर बेशक कोई आरोप लगाए, इतिहास के दस्तावेज दिखाए जाएँ, किन्तु गाँधी के राजनीतिक विचारधारा का विरोधी होने के बावजूद आरएसएस ने उनके कई सिद्धांतों जैसे छूआछूत से मुक्ति, सहभोज, स्वयं अपने कार्य करने जैसी संस्कृति विकसित की है और लगातार उसका पालन सुनिश्चित भी किया है. तब के गांधी के साबरमती आश्रम के वासियों की तरह ही कई स्वयंसेवक आज अपना जीवन गुजार देते हैं. हालाँकि, समय के साथ बदलाव और व्यक्तियों में अपवाद हर जगह होते ही हैं. आज बिडम्बना यही है कि जिस परिवार ने गांधी के नाम का इस्तेमाल करके अब तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता भोगी है, उसी ने गाँधी के विचार को पूरी तरह छोड़ दिया है, तो गाँधी को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कोसने वाला संघ कहीं न कहीं, थोड़ा बहुत ही सही, उनके विचार और दर्शन से प्रभावित दिखा है. आज तो गाँधी (Mahatma Gandhi Hindi Article New) का जीवन-दर्शन और भी प्रासंगिक है और जो भी सत्ता में इसलिए उन्हें इस बात के प्रति खुद को और समर्थकों को सुनिश्चित करना चाहिए कि 'गाँधी की दोबारा हत्या' न हो! आने वाले कई दशकों तक महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के ब्रांड-अम्बैसडर बने रहेंगे, इसलिए कोई उनकी हत्या का शोक न मनाये, हाँ, अगर उनके सार्थक विचार (Good Ideas) गर्त में जाते हैं तो अवश्य ही यह शोक का विषय है. और इसके लिए राजनीतिक पार्टियों को खास तौर पर विचार करना होगा, तो सामाजिक क्षेत्र और व्यक्ति-मात्र के लिए भी महात्मा गाँधी के दर्शन और जीवन में काफी कुछ सीखने योग्य है, जिसे सिर्फ जानना और समझना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे स्व-चरित्र में ढालना ही उपयुक्त है. इसीलिए राहुल गाँधी हों या सुब्रमण्यम स्वामी, उन्हें गाँधी-हत्या पर सर खपाने की ज्यादा आवश्यकता नहीं है, हाँ उनके विचारों पर जरूर वह तर्क-वितर्क करें, फिर उन्हें अवश्य अंदाज हो जाएगा कि गांधी-हत्या का 'असल मतलब' है क्या??

- मिथिलेश कुमार सिंहनई दिल्ली.



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