'कावेरी जल': पेट्रोल की तरह 'हाइली इन्फ्लेमेबल' - Kaveri River issue, Karnataka, Tamilnadu, Hindi Article, New, Indian Constitution, Supreme Court Decision



जल का स्वभाव सामान्य रूप से 'शीतल' होता है, किन्तु दुर्भाग्य से 'कावेरी का जल' आग की तरह जला रहा है. न केवल आज से, बल्कि दशकों से! इस जल-विवाद को देखते हुए वह भविष्यवाणी निश्चित रूप से सही लगती है, जिसमें किसी विद्वान ने कहा है कि तीसरा "विश्व-युद्ध" पानी के लिए ही होगा. इस विवाद से इतर अगर सोचें तो पानी की समस्या से समूचा विश्व ही परेशान है. कहीं बाढ़, कहीं सूखा जैसी समस्याओं से इंसान परेशान है, किन्तु हालात के अनुसार इन समस्याओं को हल करने की बजाय आपस में झगड़ना और सरकारी संपत्ति को नुक्सान पहुंचाना ही हमारा शगल बन गया है. पिछले दिनों जो बड़ी खबरें (Kaveri River issue, Karnataka, Tamilnadu, Hindi Article, National Issues) राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहीं, उनमें कावेरी-जल विवाद के अतिरिक्त यूपी का अखिलेश-शिवपाल विवाद रहा. इनकी चर्चा हो ही रही थी कि दुर्भाग्य से कश्मीर के उरी सेक्टर में आतंकवादियों ने भारतीय सेना के जवानों पर हमला कर दिया. इन तमाम मुद्दों पर देश उलझा हुआ है और अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर गंभीर चर्चाएं भी हो रही हैं. बात जहाँ तक कावेरी जल विवाद की है तो अब यह 'नासूर' बन चुका है. मामले की गंभीरता हम इसी बात से समझ सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट तक ने तमिलनाडु और कर्नाटक सरकार को इस विवादित मामले के लिए फटकार लगाई है, किन्तु उसका असर शून्य ही है. इसे लेकर जो हिंसा हो रही है और उस हिंसा से न केवल सरकारी संपत्ति को नुक्सान पहुँच रहा है, बल्कि उसने देश को इस मायने में भी झकझोर कर रख दिया है कि 'दो भाषा वाले प्रदेशों' के बीच खाई और भी चौड़ी होती जा रही है. 

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आखिर यह कल्पना करना ही अपने आप में कठिन है कि भारत जैसे राष्ट्र के दो राज्यों के बीच इस तरह लड़ाई हो, जैसे वे दो अलग देश हैं. राजनीतिक नेतृत्व इस पूरे मामले पर मूक दर्शक सा बना हुआ है. पीएम ने इस सम्बन्ध में गहरी पीड़ा जरूर जताई, किन्तु इसका असर सम्बंधित नागरिकों पर शायद ही पड़ा हो. इस विवाद से आईटी शहर बेंगलुरू समेत मांड्या, मैसूर, चित्रदुर्गा और धारवाड़ जिलों में सैकड़ों वाहन क्षतिग्रस्त हो गए, तो हेगानहल्ली इलाके में पुलिस फायरिंग से एक नागरिक की मौत हो गई. दूसरा राज्य तमिलनाडु भी क्यों कम रहता भला और वहां भी इस आगे में 30 बसों और ट्रकों को स्वाहा (Kaveri River issue, Karnataka, Tamilnadu, Hindi Article, New, Indian Constitution, Supreme Court Decision, Government Properties) होना पड़ा. इतना ही नहीं, तमिलनाडु में कन्नड़ों पर हमले भी किए गए. हालाँकि, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता के अपने राज्य में ऐसी वारदातें नहीं होने देने के संकल्प ने राज्य में बदले की कोई कारवाई पर कुछ हद तक ही सही, लगाम जरूर लगाई. वह इसके लिए सही मायने में प्रशंसा की हकदार हैं कि उन्होंने समस्या को उस हद तक जाने के पहले ही संभाल लिया कि यह अंधाधुंध हिंसा तक पंहुच जाए. कर्णाटक के राजनेताओं को भी इस मामले में संयम बरतने की ट्रेनिंग अवश्य ही लेनी चाहिए. वैसे भी, नदी जल संबंधी सभी अंतराज्जीय समझौते को रद्द करने के कर्नाटक के एक तरफा फैसले ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जिसका अनुभव हमारे देश ने पहले कभी नहीं किया था. 
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ऐसी स्थिति में, भारतीय संविधान और संघीय ढांचे जैसे शब्दों की गरिमा भला किस प्रकार बचेगी? जो कुछ हुआ, ऐसे दृश्य भगवान किसी भी शांतिप्रिय देश को न दिखाएं, क्योंकि इस तरह के वाकयों से कभी न भर सकने वाली चौड़ी दरारें पड़ जाती हैं और कालांतर में वही दरारें सैकड़ों की बलि भी ले लेती हैं. अगर तथ्यों पर गौर करें तो, माननीय उच्चतम न्यायलय ने 20 सितंबर तक कर्नाटक से तमिलनाडु के लिए 15,000 क्यूसेक पानी छोड़ने का आदेश दिया था, और इसके बाद से ही कर्नाटक में हिंसक घटनाओं की शुरुआत हो गयी. बाद में 12 हज़ार क्यूसेक पानी छोड़ने की बात भी कही गयी, किन्तु हिंसक स्थितियों (Kaveri River issue, Karnataka, Tamilnadu, Hindi Article, Violent Situation) पर कुछ खास फर्क नहीं पड़ा. अगर इस कावेरी नदी की भौगोलिक स्थितियों की बात करें तो पश्चिमी घाट के ब्रह्मगिरी पर्वत से निकलकर कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल व पुडुचेरी में कोई आठ सौ किलोमीटर की यात्रा करके बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर अंग्रेजों के जमाने से ही विवाद मौजूद है. ऐतिहासिक दस्तावेजों पर दृष्टि डालने से ज्ञात होता है कि वर्ष 1924 में उस समय के मैसूर और मद्रास राज्य के रजवाड़े तक आमने सामने आ गए थे, तो अंग्रेजी हुक्मरानों ने दोनों के बीच एक समझौता करा दिया था, जिसमें मैसूर को कावेरी जल का प्रथम, जबकि मद्रास को दूसरा लाभार्थी माना गया था. कालांतर में इस विवाद ने और भी उग्र रूप में तब आकर लिया जब आजाद भारत में 1972 में कांग्रेस की आयरन-लेडी इंदिरा गांधी की सरकार थी. बड़ी मशक्कत के बाद उन्होंने इससे जुड़े चारों राज्यों-कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के बीच एक समझौता कराया था. 

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इस समझौते का आधार यह था कि नदी जिस राज्य के भू-भाग से जितनी ज्यादा गुजरती है, पानी में भी उसका उतना ही हिस्सा होगा. देखा जाए तो यह एक संतुलित संधि थी, किन्तु कर्नाटक ने इस संधि की अवहेलना करनी शुरू कर दी थी और फिर इन विवादों के सन्दर्भ में, 1986 में तमिलनाडु ने तत्कालीन केंद्र सरकार से विवाद के निपटारे के लिए एक अलग से न्यायाधिकरण बनाने की मांग की, जो चार वर्ष बाद 1990 में पूरी हुई. न्याय करने की कोशिश फिर हुई, जब स्थापित न्यायाधिकरण ने तय कर दिया कि कर्नाटक तमिलनाडु को कितना पानी हर साल देगा और पानी कब-कब छोड़ा जाएगा. दुर्भाग्य से इस पर न तो कर्नाटक ने ठीक से अमल किया और ना ही तमिलनाडु ने और फिर यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा. सवाल वही है कि अगर भारतीय राज्य और उसके नागरिक ही शीर्ष अदालती आदेश का सम्मान (Kaveri River issue, Karnataka, Tamilnadu, Hindi Article, New, Indian Constitution, Supreme Court Decision) नहीं करेंगे तो करेगा कौन? वह भी तब जब कोर्ट का निर्णय बेहद व्यवहारिक प्रतीत होता है. विवाद होने पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में संशोधन भी किया, किन्तु नतीजा वही ढाक के तीन पात ही रहा. आखिर वह आंदोलनकारी आसमान से आकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना तो कर नहीं रहे हैं, बल्कि इसके पीछे साफ़ तौर पर राजनीतिक पार्टियां लाभ-हानि की दृष्टि से राजनीति करती प्रतीत हो रही हैं. बेहद शर्मनाक है कि भारत में सबसे सम्मानित और विकसित शहर के तौर पर मशहूर, भारत के आईटी हब बेंगलुरू की प्रतिष्ठा का भी ध्यान नहीं किया गया. साफ़ है कि वहां पर जो हिंसा हुई है, उसके कारण वहां काम कर रही देशी-विदेशी कंपनियों को दुबारा सोचने पर मजबूर होना पड़ा होगा. सहज ही कल्पना की जा सकती है कि अगर किसी कंपनी का वहां एक्सपेंशन का प्लान होगा तो वह उसे टाल भी सकती है. पॉपुलर सोशल मीडिया कंपनी ट्विटर ने अपने 'बेंगलुरु ऑफिस' से कामकाज समेटने की बात भी कही है. हालाँकि, सीधे तौर पर ट्विटर और कावेरी जल-विवाद  का कोई अन्तर्सम्बन्ध नहीं है किन्तु आने वाले दिनों में वहां के नागरिकों को इस बाबत सोचने को तैयार रहना ही होगा. 

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यह ठीक बात है कि सिंचाई के लिए कावेरी के जल का काफी महत्त्व है, किन्तु एक दुसरे की जान लेने से क्या यह समस्या सुलझ जाएगी? लोगों और उनसे ज्यादा राजनैतिक पार्टियों को न्यायिक दृष्टि रखते हुए दुसरे पक्षों के हित को भी ध्यान रखना होगा तो राज्य सरकारों को कानून-व्यवस्था कायम रखने के लिए सख्ती से पेश होना ही पड़ेगा. जो भी समूह भारतीय न्याय-प्रणाली के खिलाफ लोगों को बरगला कर हिंसा करने को उकसा रहे हैं, उनके खिलाफ सख्ती से कार्रवाई करनी होगी, अन्यथा मामला और भी बिगड़ेगा ही. देखा जाए तो यह मामला केवल कावेरी से जुड़ा हुआ ही नहीं है, बल्कि देश में 'नदी जोड़ो परियोजना' की शुरुआत ही जल-संकट से समाधान हेतु की गयी. अटल बिहारी बाजपेयी के काल के बाद मनमोहन सरकार और फिर अब मोदी सरकार (Kaveri River issue, Karnataka, Tamilnadu, Hindi Article, Modi Government) इस मामले में कुछ ख़ास आगे नहीं बढ़ सकी है. हालाँकि, इस परियोजना पर भारी खर्च एवं जल-संशाधन पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कब्ज़े को लेकर जल पुरुष राजेंद्र सिंह जैसे लोग 'नदी जोड़ो परियोजना' का विरोध कर रहे हैं, जिनसे वर्तमान सरकार को सामंजस्य बिठाने की आवश्यकता है. स्टाकहोम प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह एवं दूसरे कई विशेषज्ञ इसके बजाय समाज से नदियों को जोड़ने एवं तालाब इत्यादि विकल्पों को सुझा रहे हैं. वर्तमान सरकार को निश्चित रूप से इन स्थितियों को ध्यान में रखते हुए ठोस नीतियां अपनाने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में फिर 'कावेरी नदी' जैसी समस्याएं उत्पन्न न हों. जाहिर है, जब जल ही अपना प्रकृति गुण 'शीतलता' खो देगा और आग का गुण 'जलनशीलता' अपना लेगा तो फिर दुनिया को कोई नहीं बचा सकता, कोई नहीं बचा सकता!

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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