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निज कवित्त केहि लाग न नीका ... (तीसरा पाठ) - Poem, Poet, Writers and Shri Ramcharit Manas, Analysis of Good Literature, Hindi Article



लेखनी हमेशा से समाज को मार्ग दिखलाने का कार्य करती रही है। आज भी उसका यही कार्य है, किन्तु इसका रूप ज़रा व्यापक हो गया है क्योंकि  तकनीक ने हर एक को मंच उपलब्ध करा दिया है। मात्र कुछ ही दशक पहले तक लेखक, कवि अपनी रचनाओं को यहाँ-वहाँ, अख़बारों में, संपादकों के पास भटकते रहते थे। तब के समय इस प्रकार की परिस्थिति में दो कार्य होते थे कि यदि रचना 'स्तरीय' न हो तो लेखक को उसका भान कराया जाता था। हालाँकि, तब भी कई चापलूस और पिछलग्गुओं की रचनायें छपती ही थीं, तो कई प्रतिभाशाली और स्वाभिमानी लोग दबे-कुचलों की श्रेणी में आ ही जाते थे। ऐसे में असल प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों का संघर्ष काल लंबा हो जाता था, जो कई बार उन्हें गुमनामी में धकेल देता था, तो कई धारा के विपरीत जाने का साहस करके अंततः पाठकों का स्नेह पा ही लेते थे। सच कहा जाए तो 'पाठकों' का रोल (Poem, Poet, Writers and Shri Ramcharit Manas, Readers Reaction) सर्वदा से ही महत्वपूर्ण रहा है और यह एक बड़ी कसौटी रही है 'लेखनी' के प्रभाव को बताने के लिए। हालाँकि, यह कसौटी सिर्फ 'आधी' ही है। जी हाँ, सिर्फ पाठकों का प्यार और लोकप्रियता ही किसी रचनाकार को श्रेष्ठ और अमर नहीं बना सकती है, वरना आज कई 'बाज़ारू' लेखक भी हैं जो तिकड़म लगा कर, पानी की तरह पैसे बहाकर वाहवाही लूट लेते हैं। परंपरागत लेखनी के अतिरिक्त, आज सिनेमा, टीवी इत्यादि भी एक तरह से साहित्य का रूप ही है, और कई फिल्में, सीरियल जो बेसिरपैर के होते हैं, वह भी सफल घोषित कर दिए जाते हैं। हालाँकि, पाठक या दर्शक की समझ पर यहाँ प्रश्नचिन्ह नहीं है और आज भी तमाम तिकड़मों के बावजूद, खूब प्रचार-प्रसार के बावजूद भी बकवास फिल्मों, सीरियल्स या किताबों को मुंह के बल गिरना ही पड़ता है। रचना की दूसरी कसौटी निश्चित रूप से समाज का 'हित' ही है, जो उसे कालजयी बनाता है। हालाँकि, हर एक की रचना उसके लिए प्रिय होती है तो दुसरे की रचना को व्यक्ति कम अहमियत देता है। इसे तुलसीदास जी श्रीरामचरितमानस में कुछ यूं कहते हैं-

निज कवित्त केहि लाग न नीका, सरस होइ अथवा अति फीका।। 
जे पर भनिति सुनत हरसाहीं, ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं।। 
(अपनी रचना सभी को अच्छी लगती है चाहे वो सरस हो अथवा फीकी हो , किन्तु जो दूसरे की रचना को सुनकर हर्षित होते हैं ऐसे उत्तम लोग संसार में बहुत नहीं हैं। )


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सोशल मीडिया, ब्लॉग, वेबसाइट (Social Media, Blog, Website and Literature, Hindi Article for Writers, Poet) इत्यादि ने लेखों, कविताओं और दूसरी तरह की रचनाओं की बाढ़ ला दी है। हर व्यक्ति अपनी फीलिंग एक्सप्रेस कर रहा है, जो एक बढ़िया बात है। कइयों की रचना 'श्रेष्ठ' होती है, तो उसे पाठकों का अपेक्षित प्यार नहीं मिल पाता है तो कई ऐसे लोगों की रचनाओं पर ढेरों लाइक कमेंट्स आते हैं, जिसका कोई स्तर नहीं होता है। हालाँकि, सही गलत का कोई ख़ास मानक भी नहीं है, किन्तु जब गोस्वामी तुलसीदास विरचित 'श्रीरामचरितमानस' का प्रसंग उद्धृत किया जाता है तो यह दोनों मानकों पर सदियों से खरा उतरा है और इसकी व्यवहार्यता, सरसता संभवतः इसे भविष्य में भी प्रासंगिक (Poem, Poet, Writers and Shri Ramcharit Manas, The Epic) बनाये रखेगी। न केवल इसकी किताब, बल्कि इस पर ठीक ढंग से कोई फिल्म बनी हो, सीरियल बना हो और दूसरी टीकाएं की गयी हों, वह सभी निर्विवाद रूप से वर्तमान में 'हिट' साबित होती हैं, तो सामाजिक 'हित' का सन्देश देने में उसका कोई मुकाबला नहीं होता। श्रीरामचरितमानस का पाठ करते समय शुरू में तुलसीदास जी बेहद सटीकता से कविताओं, रचनाओं और रचनाकारों के लक्षणों और गुण-दोषों का वर्णन करते हैं। इसे निश्चित रूप से सोशल मीडिया पर सक्रिय नव-रचनाकारों से लेकर, टेलीविजन के धुरंधर पत्रकारों और अवार्ड-वापसी करने वाले तथाकथित साहित्यकारों को समझना चाहिए, जिनकी लेखनी / टिपण्णी देशद्रोह और देशप्रेम के बीच विवादों में उलझ जाती है। निर्विवाद, महानतम, पढ़ने-सुनने वालों की अंतरात्मा को स्पर्श करने वाला, सर्वकालीन श्रेष्ठ रचनाओं में से एक 'श्रीरामचरितमानस' के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी रचनाओं के बारे में कहते हैं-

भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोउ॥ 
बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोह न बसन बिना बर नारी॥

(जो अच्छे कवि के द्वारा रची हुई बड़ी अनूठी कविता है, वह भी राम नाम के बिना शोभा नहीं पाती। जैसे चन्द्रमा के समान मुख वाली सुंदर स्त्री सब प्रकार से सुसज्जित होने पर भी वस्त्र के बिना शोभा नहीं देती॥)


उपरोक्त चौपाई में अगर हम 'राम' को जन-कल्याणकारी के रूप में लें, जैसाकि उनका जीवन-चरित्र रहा है तो निश्चित रूप से उसी रचना को तुलसीदास जी श्रेष्ठ कहते हैं, जिसमें 'समाज-कल्याण' (In the favor of Society, Hindi Article) का हित निहित हो। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का एक और प्रसंग है कि-

"अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते। 
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥"
("लंका पर विजय हासिल करने के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कहते हैं कि 'हे लक्ष्मण! यह सोने की लंका मुझे किसी तरह से प्रभावित नहीं कर रही है। माँ और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़ कर हैं। (अयोध्या जल्द लौटने के सन्दर्भ में)"

ऐसे में कई बुद्धिजीवी रचनाकार, जो कई बार झूठी वाहवाही लूटने के चक्कर में 'राष्ट्रविरोधी रचना' कर बैठते हैं, उन्हें गोस्वामीजी के इस कथन से प्रेरणा क्यों नहीं लेनी चाहिए। बेशक, कई रचनकारों की भाषा खूब लच्छेदार हो, उसमें पद-छंद और दुसरे महान साहित्य के गुण (Poem, Poet, Writers and Shri Ramcharit Manas, Analysis of Good Literature, Hindi Article) हों, किन्तु यदि वह समाज के हित में नहीं है, राष्ट्र के हित में नहीं है तो उसे बेकार ही समझा जाना चाहिए। और अगर कोई ऐसा रचनाकार है, जिसकी रचना में तमाम दोष हों, किन्तु उसमें समाजहित, राष्ट्रहित छुपा है तो तुलसीदास की दृष्टि में निश्चित रूप से वह श्रेष्ठ है। गोस्वामीजी कहते भी हैं-

धूमउ तजइ सहज करुआई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई॥ 
भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी॥
(धुआँ भी अगर के संग से सुगंधित होकर अपने स्वाभाविक कड़ुवेपन को छोड़ देता है। मेरी कविता अवश्य भद्दी है, परन्तु इसमें जगत का कल्याण करने वाली रामकथा रूपी उत्तम वस्तु का वर्णन किया गया है। (इससे यह भी अच्छी ही समझी जाएगी।)


साफ़ तौर पर सर्वकालीन महान रचनाकार तुलसीदास जी रचनाओं में "राम कथा जग मंगल करनी (जगत का, राष्ट्र का कल्याण करने वाली रामकथा रूपी उत्तम वस्तु का वर्णन) को सर्वोपरि मानते हैं।  हालाँकि, तुलसीदास जी आगे 'ढोंगियों' से सावधान (Don't be blind follower of anyone, be wise, Hindi Article) रहने को भी कहते हैं और उससे खुद को भी नहीं बख्शते। देखिये इस चौपाई को-

बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के॥ 
तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरम ध्वज धंधक धोरी॥
(जो श्री रामजी के भक्त कहलाकर लोगों को ठगते हैं, जो धन (लोभ), क्रोध और काम के गुलाम हैं और जो धींगाधींगी करने वाले, धर्मध्वजी (धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले दम्भी) और कपट के धन्धों का बोझ ढोने वाले हैं, संसार के ऐसे लोगों में सबसे पहले मेरी गिनती है॥)

अभिप्राय स्पष्ट है कि समाज का 'हित' करने वाली रचना और 'हित' का दिखावा करने वाली रचना में स्वविवेक से निर्णय लिया जाना चाहिए। ठीक वैसे ही जैसे आज भगवान के नाम पर अल्लाह के नाम पर (Don't be cheated in the name of religion, Hindi Article) कई लोग अपनी दुकानें चला रहे हैं। भगवान के नाम पर उन्हें शुरूआती लोकप्रियता भी मिल जाती है, किन्तु तुलसीदास जी ने 'बालकांड' की शुरुआत में ऐसे लोगों का वर्णन एक और चौपाई में किया है कि- 

लखि सुबेष जग बंचक जेऊ । बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥ 
उघरहिं अंत न होइ निबाहू । कालनेमि जिमि रावण राहू ॥
(जो [वेषधारी] ठग हैं, उन्हें भी अच्छा (साधुका-सा) वेश बनाये देखकर वेश के प्रताप से जगत पूजता है; परंतु एक-न-एक दिन वे चौड़े आ ही जाते हैं, अंत तक उनका कपट नहीं निभता, जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हाल हुआ ॥)


रचनाओं, रचनाकारों के लिए गोस्वामीजी की एक और सुन्दर चौपाई (Tips for New Author, Writer, Poet, Hindi Article) देखिये-

कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥ 
राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा॥
(कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है, जो गंगाजी की तरह सबका हित करने वाली हो। श्री रामचन्द्रजी की कीर्ति तो बड़ी सुंदर (सबका अनन्त कल्याण करने वाली ही) है, परन्तु मेरी कविता भद्दी है। यह असामंजस्य है (अर्थात इन दोनों का मेल नहीं मिलता), इसी की मुझे चिन्ता है॥)

श्रीरामचरितमानस जीवन के हर क्षेत्र की परत-दर-परत व्याख्या करती है और उसकी हर एक पंक्ति अपने आप में एक ग्रन्थ है, जिसका उदाहरण आपको आस-पास दिख ही जायेगा। बहुत कम ऐसे पुराने (सीनियर) रचनाकार हैं, जो सीखने का प्रयत्न करते हों, किन्तु नव-रचनाकारों (Every New Learner should follow the Ram Charit Manas) को अपनी रचनाओं को श्रीरामचरितमानस सा जीवंत और अभिप्राय-निहित बनाने के लिए अवश्य ही गोस्वामी तुलसीदास जी का अनुशरण करना चाहिए।

जय राम जी की

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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