समझौते के लायक नहीं पाकिस्तान - Mithilesh best hindi article on India Pakistan relations, must read, foregin policy

इस लेख का टाइटल मैंने किसी भावुकता में नहीं दिया है, जैसा कि कुछ अतिवादी किया करते हैं, बल्कि कई पक्षों को सामने रखने के बाद यह तथ्य आप ही सामने आ जाता है कि पाकिस्तान किसी भी समझौते को लागू करने की स्थिति में या उसका पालन करने की स्थिति में है ही नहीं! विशेषकर भारत के सन्दर्भ में जब बात की जाती है, तब यह तथ्य और भी पुख्ता हो जाता है. आगे की पंक्तियों में जाने से पहले हमें यह समझ लेना चाहिए कि किसी विवाद पर जब भी वार्ता होती है तो उसमें जो भी समझौता किया जाता है, उसमें कुछ लेन-देन, विश्वास की वापसी, अपने पक्षों को दबाना और अंततः यह उद्देश्य शामिल होता है कि भविष्य में पुनः वह विवाद न हो. सच तो यह है कि पाकिस्तान इनमें से कुछ भी कर सकने की हालत में नहीं है. अगर रत्ती भर मान भी लें, जैसा कि बीबीसी की एक रिपोर्ट में दक्षिण एशिया मामलों के जानकार बताकर सुशांत सरीन का रिफरेन्स देकर कहा गया है कि भारत-पाक में हालिया ‘मीटिंग की बात समझ में नहीं’ आ रही है. उनके अनुसार मोदी सरकार जिस तरह यूटर्न ले रही है, उससे यही लगता है कि वह सियाचिन समेत अन्य मुद्दों पर और पीछे हटकर समझौता कर सकती है. इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ''बातचीत में कुछ सहमतियां लिखित होती हैं और कुछ ज़बानी, लेकिन पाकिस्तान जो लिखित में देता है उसका भी उल्लंघन होता रहा है. साफ़ है कि ''पाकिस्तान की किसी भी मांग को मानने का मतलब है कि एक ऐसे चेक पर हस्ताक्षर जिसकी तारीख बहुत बाद की हो. अब अगर हम भारत के पक्ष से इस बात की ही कल्पना कर लें कि वह क्षेत्रीय शांति के लिए पाकिस्तान की शर्तों पर कुछ जगह लचीला रूख अपना ले तो सवाल उठता है कि बदले में पाकिस्तान क्या दे सकने की स्थिति में है? क्या वह आतंकवाद को ज़रा भी नियंत्रित कर सकता है? क्या वह इस्लामिक चरमपंथ, जिसको लेकर अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया समेत पूरे विश्व में हंगामा मचा हुआ है, उसे नियंत्रित करने की सोच और सामर्थ्य रखता है? क्या समझौते करने वाली लोकतान्त्रिक सरकार का तख्तापलट फिर नहीं होगा और उन सभी समझौते पर पानी नहीं फिर जायेगा, जो दोनों देश की सरकारें करेंगी? ठीक, वैसा ही जैसा अटल बिहारी बस लेकर पाकिस्तान गए थे और वहां से कारगिल मिल गया! इन सबके बावजूद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न कि अगर किसी कंडीशन में पाकिस्तान की सेना, सरकार, आतंकवादी, आईएसआई और अंत में वहां की जनता भारत के साथ समझौते को मान भी लेती है तो क्या चीन का उपनिवेश बनता जा रहा पाकिस्तान 'चीन को नाराज करने का जोखिम ले सकता है?'  आखिर, आशावादिता की कोई तो सीमा होगी, और उस सीमा को पाकिस्तान बार-बार कुचल चुका है. 

फेसबुक पर किन्हीं महानुभाव ने कुछ दिन पहले पोस्ट किया कि भारत पाकिस्तान इस सम्बन्ध में वार्ता करने को राजी हो गए हैं कि उन्हें अब वार्ता करनी चाहिए. संयोगवश सुषमा स्वराज पाकिस्तान गयीं और उनका भी बयान शब्दशः ऐसा ही था कि भारत और पाकिस्तान समग्र वार्ता शुरू करने के लिए राजी हो गए हैं और जल्द ही दोनों देशों के विदेश सचिवों के बीच मुलाकात होगी. थोड़ा और दिलचस्प बात देखिये, संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने भी भारत और पाकिस्तान की ओर से समग्र वार्ता बहाल करने के फैसले का स्वागत कर दिया. मतलब, कुछ दिनों पहले दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बैंकाक में मिले, दोनों देशों के प्रधानमंत्री पेरिस भी मिले, सुषमा स्वराज दो दिनों तक 'हर्ट ऑफ़ एशिया' में रहीं और नवाज शरीफ से मिलीं, सरताज अजीज से मिलीं और अंततः इस बात पर फैसला हो गया कि अब हमें बातचीत कर लेनी चाहिए. दिलचस्पी देखिये, सुषमा की यात्रा के तत्काल बाद पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष शहरयार खान ने कहा कि पीसीबी एक दो दिन इंतजार करेगी जिसके बाद श्रृंखला रद्द कर दी जायेगी. गौरतलब है कि दोनों टीमों के बीच सीमित ओवरों की छोटी श्रृंखला इस महीने श्रीलंका में प्रस्तावित है. बिचारे शहरयार खान थोड़े सीधे हैं और इसलिए उन्होंने यह भी 'ईमानदारी' से कह डाला कि  'इस श्रृंखला की संभावना बहुत कम है क्योंकि भारतीय विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच मुलाकात में इस पर बात नहीं की गई.’ मतलब, पिछले दो महीनों से दोनों देशों के क्रिकेट-संबंधों के बारे में चिल्ल-पों मची हुई है, और आज यह फैसला तक नहीं हो पा रहा है कि करना क्या है? कमबख्त, इतने होहल्ले के बाद बात हुई क्या? और अब यह कहना कि 'यह वार्ता किस तरह आगे बढ़ेगी, इसके समय और तौर-तरीकों पर आगे निर्णय लिया जाएगा', यह साफ़ साबित करता है कि दोनों देश एक दुसरे के प्रति हद से ज्यादा उदासीन हैं! क्या दो महत्वपूर्ण देश एक-दुसरे के प्रति यही नीतियां रखते हैं? क्या उनकी नौकरशाही यही एजेंडा रखती है? क्या पिछले 65 सालों में भारत-पाकिस्तान ने इतना ही सीखा है कि हमें वार्ता शुरू करना चाहिए और वार्ता बंद कर देना चाहिए? फिर वार्ता शुरू करना चाहिए और फिर बंद कर देना चाहिए... और फिर ... और फिर .. यही कवायद... हर बार, बार-बार... लगातार !! क्या इससे यह साबित नहीं होता है कि इस पूरी वार्ता और प्रक्रिया का सिर्फ इतना ही मतलब है कि यह 'औपचारिकता' भर है, या फिर औपचारिकता जितनी तैयारी भी नहीं है दोनों की! 

इस सम्बन्ध में पाकिस्तान के पूर्व सैन्य शासक और ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग के अध्यक्ष जनरल (सेवानिवृत्त) परवेज़ मुशर्रफ़ के बयान पर गौर किया जाना चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा है कि भारत प्रशासित कश्मीर में लड़ने वाले दहशतगर्द नहीं बल्कि मुजाहिदीन हैं. एक इंटरव्यू में उनका कहना था कि ''हम पाकिस्तानी उन्हें मुजाहिदीन कहते हैं, उन्हें कश्मीर और पाकिस्तान में बड़ी मदद हासिल है. कश्मीर में जो ज़ुल्म हो रहा है, लश्कर-ए-तैय्यबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसी मज़हबी तंज़ीमें निकलीं जो कश्मीरी भाईयों और बहनों के लिए वहां लड़ने और अपनी जान क़ुर्बान करने को तैयार थे. उन्हें तालिबान या दहशतगर्द नहीं कहते हैं, वे तो हमारे मुजाहिदीन हैं, हमारे फ़्रीडम फ़ाइटर हैं.'' गौर करने वाली बात यह भी है कि मात्र कुछ ही समय पहले परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तानियों के आदर्श के रूप में ओसामा और मुल्ला उमर जैसे लोगों की शान में कसीदे पढ़े थे. सवाल यह है कि एक दबंग सैन्य शासक, जिसने तख्तापलट किया, राष्ट्रपति के पद पर रहा, कारगिल युद्ध करने का पाकिस्तान की ओर से बड़ा निर्णय लिया, उस व्यक्ति के रूख को पूरे पाकिस्तान का न सही, मगर पाकिस्तान के एक बड़े हिस्से की मानसिकता क्यों न माना जाय? ऐसे में साफ़ है कि वार्ता किस दिशा में जा रही है, और किस दिशा में जाएगी! कोढ़ में खाज़ यह कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी होने वाले सार्क सम्मेलन में भाग लेने पाकिस्तान जायेंगे. किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की 12 सालों में पहली पाकिस्तान यात्रा, सार्क सम्मेलन के आयोजन के ही बहाने, जो सितंबर, 2016 में पाकिस्तान में होनी है, उससे क्या हासिल हो जायेगा? क्या नजदीकी बढाकर, फिर एक कारगिल की पृष्ठभूमि तैयार की जायेगी? कहते हैं अगर किसी किस्से को अंजाम तक ले जाना मुमकिन न हो, तो उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ देना चाहिए. पाकिस्तान एक असफल राष्ट्र है जो अमेरिकी और अब चाइनीज अनुदानों पर चल रहा है, किन्तु सवाल भारत से है कि क्या वह 'गंभीरता और प्रोफेशनलिज्म' से पाकिस्तान से पेश नहीं आ सकता है! पाकिस्तानी आतंकी और सैन्य शासक यह बात बखूबी समझत हैं कि भारत युद्ध से डरता है, इसलिए कमजोर होने के बावजूद वह बार-बार आसमान की ओर थूकने का दुस्साहस करता है. 

ऐसे में, भारत अपनी सीमाओं को मजबूत रखे, आधुनिक तकनीक विकसित करता रहा, अपनी सेनाओं को 1 गोली के बजाय 10 चलाने का आर्डर देता रहे और पहले युद्ध न करने की अपनी शपथ पर कायम रहे. अगर उधर से शुरुआत होती है तो बखूबी इसे अंजाम तक पहुंचा दे. यकीन मानिये, अगर पाकिस्तान के साथ हुए तमाम युद्धों में से किसी युद्ध के लिए भी भारत पहले से तैयार रहता तो पाकिस्तान कब का सुधर चुका होता या मिट चुका होता! इसका अपवाद सिर्फ बांग्लादेश की स्वतंत्र-संग्राम ही रहा है, जिसका नेतृत्व लौह-महिला इंदिरा गांधी ने बखूबी किया था. पाकिस्तान उसके बाद दबा भी रहा काफी दिनों तक! किसी विचारक ने भी कहा है कि 'युद्ध की तैयारी शांति का द्वार है'. ऐसे में हम पाकिस्तान से तमाम संबंधों को 'होल्ड पर रखें'. दुनिया को दिखाने के लिए, बातचीत का ड्रामा भी जरूरी है, तो उसे छोटे-मझले स्तर पर करते रहें, तोड़ते रहें... मगर अपना प्रोफेशनल रवैया कतई न छोड़ें! कम से कम तब तक, जब तक पाकिस्तान 'वार्ता और समझौता' करने लायक न हो जाए, जिसकी सम्भावना न्यून ही है, या फिर जब तक पाकिस्तान बिखर न जाए, जिसकी सम्भावना कहीं ज्यादा है! बस अपना आर्थिक विकास, लोकतंत्र और सैन्यबल लगातार मजबूत करें... और हाँ! युद्ध के लिए तैयार रहें... !!


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