हाईवे रेप-मामले में अखिलेश-प्रशासन का नाकारापन एवं समाज की चुप्पी! Crime in Uttar Pradesh, Rape case on national highway 91, Hindi Article, New, Akhilesh Government



कई बार एक सीधा प्रश्न मन में उठता है कि अपराध की रोकथाम के लिए गंभीरता से प्रयास हमारे भारत भर में आखिर कौन करता है? आपको इसका जवाब सौ फीसदी नकारात्मक ही मिलेगा. 16 दिसंबर 2012 को पूरे देश को हिला देने वाला 'निर्भया रेप-काण्ड' घटित हुआ और इसके लिए सड़क से संसद तक खूब हो-हल्ला मचा, कानून भी बना, महिलाओं के खिलाफ अपराध की रोकथाम के लिए 'निर्भया-फण्ड' भी बना! पर यह बात शर्मनाक है कि आज चार साल बाद भी इस फण्ड का एकाध फीसदी हिस्सा ही खर्च हो पाया है. आप समझ सकते हैं कि हमारे देश में अपराधों और खासकर महिला-अपराधों पर रोकथाम के लिए हम कितने गंभीर हैं (Read Prime Minister Speech on this topic..). अगरबत्ती और मोमबत्ती जलाने वाली तमाम संस्थाएं कानों में रूई डाले बैठी हैं, तो राष्ट्रीय महिला आयोग जैसे संस्थान समग्र सॉल्यूशन की बजाय घटनाओं पर औपचारिकता निभा कर चुप्पी मार जाते हैं. उत्तर प्रदेश में नेशनल हाईवे पर बेहद शर्मनाक और जघन्य रेप-काण्ड हुआ (Crime in Uttar Pradesh, Rape case, Hindi News, Articles), जिसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है. होना तो यह चाहिए था कि इस समस्या का हल ढूंढने की कोशिश होती, विपक्षी पार्टियां प्रदेश सरकार पर जांच का दबाव बनातीं, सीबीआई जांच की मांग करती, किन्तु यहाँ तो बिल्कुल उल्टी गंगा ही बह रही है. विपक्ष के तमाम लोग पीड़ित परिवार से मिलने का दिखावा तो कर रहे हैं, किन्तु उन्हें न्याय कैसे मिले, इस बाबत किसी को फ़िक्र नहीं है और न ही फ़िक्र है कि आगे से ऐसे अपराधों पर रोकथाम किस प्रकार लगे. 

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बिचारे मुख्यमंत्री की पहचान बना चुके अखिलेश यादव सीबीआई जांच कराने के लिए तैयार होकर अपनी जिम्मेदारियों की इतिश्री कर चुके हैं, तो कुछ पुलिसकर्मियों को सस्पेंड करने से ज्यादा भला उनके बस में और है भी क्या? रही सही कसर समाजवादी पार्टी के आज़म खान जैसे नेताओं की घटिया बयानबाजी पूरी कर दे रही है. ऐसे में अखिलेश यादव लाख कह लें कि विपक्षी इस घटना पर राजनीति कर रहे हैं, उचित जान नहीं पड़ता है.  सपा सरकार तो 'कानून और व्यवस्था' के नाम पर पहले से ही 'माशा अल्लाह' (National Highway 91, Hindi Article, New, Akhilesh Government) है, किन्तु बाकी पार्टियों के मुंह से अभी आप सिर्फ एक ही बात सुनेंगे कि 'यूपी में अपराध बढ़ रहा है, यूपी में क्राइम बढ़ रहा है, यूपी में ये हो रहा है, वो हो रहा है...'  अरे भाई, सब जानते हैं कि 2017 में यूपी में चुनाव होने हैं, किन्तु कम से कम ऐसी घटनाओं पर तो पक्ष-विपक्ष को 'न्याय' के बारे में सोचना चाहिए, बजाय कि राजनीति करने के! जहाँ तक अपराध होने की बात है तो इसमें सिर्फ यूपी ही क्यों, उससे आगे और भी कई प्रदेश खड़े हैं. नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला दें, तो रेप के मामलों में देश का सबसे बदनाम राज्य मध्य प्रदेश है और यह राज्य पिछले पांच वर्षों से इस बदनाम आंकड़े के साथ पूरे देश में सबसे आगे है. इसके बाद राजस्थान का नंबर रहा तो, रेप को लेकर क्राइम रेट सबसे ज्यादा दिल्ली में रहा. 


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साफ़ जाहिर है कि निर्भया रेप कांड के बाद भी दिल्ली पुलिस, जिसे सर्वाधिक सुविधाएं पाने वाले बल और आधुनिक संशाधनों के लिए जाना जाता है, उसने कोई सीख नहीं ली. जहाँ तक बात उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासन की है, तो उसका व्यवहार कानून-व्यवस्था के मामलों में 'कोढ़ में खाज़' की तरह जरूर है और इसके लिए सबको ज़ोर देना होगा कि यूपी,दिल्ली सहित पूरे देश में अपराधों और गंभीर अपराधों पर रोक के लिए एक 'राष्ट्रीय नीति' बने! हमें समझना होगा कि अपराध और कानून-व्यवस्था बेशक एक राज्य का विषय है, किन्तु आज एक अपराधी अपराध करके दूसरे राज्यों में भागकर (Crime in Uttar Pradesh, Rape case, Hindi News, Articles) छिप जाता है. अपराध किसी राज्य में होता है, उसका सरगना किसी और राज्य में होता है. पुलिस की ट्रेनिंग से लेकर आधुनिक संशाधनों और सुरक्षा मानकों में कई बदलाव किये जाने की साफ़ जरूरत है. इससे भी बड़ी बात है कि जब तक पुलिस पर राजनीतिक दबाव डाला जाता रहेगा, तब तक कानून-व्यवस्था की स्थिति लचर बनी ही रहेगी. इसके लिए जरूरी है कि कानून-व्यवस्था में छोटे-बड़े नेता हस्तक्षेप न कर सकें, अन्यथा अपराधियों के हौंसले बुलंद होना स्वाभाविक सी बात है. अभी हाल ही में केंद्र सरकार की पहल से अंतरराज्यीय परिषद् की बैठक हुई थी. ऐसी बैठकों में अपराधों पर रोकथाम की लिए राज्यों की राय अपराध रोकथाम हेतु 'राष्ट्रीय नीति' बनाने की पहल होनी चाहिए थी. 

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इन सबसे इतर यह बात हमें मान लेनी चाहिए कि यूपी सहित, हर जगह की पुलिस को 'सोते रहने' की आदत पड़ चुकी है और वह बजाय कि 21वीं सदी के पुलिस की तरह खुद को ढालती, वह आज भी 80 और 90 के दशक की तरह ही कार्य करती है. ऐसे में, हमारे यहाँ पुलिस को लेकर जो एक कहावत बहुत प्रचलित है कि 'जब कोई घटना घट जाये तब वहां पुलिस पहुँचती है', उसे बदलना ही होगा. अपने ढीले रवैये और लेटलतीफी के लिए पूरे देश का पुलिस विभाग बहुत बदनाम है और बुलंदशहर की घटना में यह एक बार फिर साबित हुआ है. उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर हाइवे पर ((National Highway 91, Hindi Article, New, Samajwadi Party Government)) नोएडा की एक महिला और उसकी 14 साल की बेटी को कार से जबरदस्ती खींचकर उसके परिवार के सामने 3 घंटे तक गैंगरेप किया गया, जिसने सुनने वालों की रूह कंपा दी. यह जगह दिल्ली से सिर्फ 65 किलोमीटर दूर है तो घटना-स्थल से पुलिस पोस्ट भी महज 100 मीटर की दूरी पर ही था. जानकारी के अनुसार, एक परिवार शाहजहांपुर से आ रहा था और बुलंदशहर में एंट्री करते ही अपराधियों ने उनकी कार को लोहे की रॉड से पीटना शुरू कर दिया. जाहिर है, यूपी में अपराधियों के हौंसले बुलंद हैं और इसके लिए यूपी पुलिस और समाजवादी पार्टी सरकार की जितनी भी लानत-मलानत की जाय, कम ही है. अखिलेश यादव ने पुलिस विभाग को टाइट करने के नाम पर दो-चार निलंबन आदेश जारी कर दिए, किन्तु इससे क्या वाकई स्थिति बदल जाने वाली है या फिर इससे लोगों को न्याय मिल जायेगा? 


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शायद अखिलेश को भी अपनी पुलिस के रवैये का अंदाज होगा, तभी तो अपनी पुलिस पर भरोसा करने की बजाय सीबीआई जांच की बात खुद से कही. इस मामले में पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की बजाय अखिलेश सरकार 'फ़्लैट-फ़्लैट' खेल रही है. सच कहा जाए तो ऐसी बड़ी घटना, जिसने समूचे राष्ट्र को एक बार झकझोर दिया है, उसके लिए तो यूपी सीएम को कम से कम डीजीपी जावीद अहमद को तो बर्खास्त करना ही चाहिए था, किन्तु दो-चार छोटे पुलिसकर्मियों का निलंबन करके मुक्ति पा ली गई है. यह बात भी सच है कि विपक्षी इस घटना का राजनीतिकरण कर रहे हैं, किन्तु यूपी सरकार और पुलिस अधिकारियों की नाकामी (Crime in Uttar Pradesh, Rape case, Hindi News, Articles) ने ही तो उन्हें यह मौका उपलब्ध कराया है. सवाल ये भी उठता है कि इतने पास यानि महज 100 मीटर की दूरी पर पुलिस पोस्ट होने के वावजूद बदमाशों के हौसले कितने बुलंद थे कि उन्होंने इतनी घिनौनी घटना को अंजाम दे दिया और पुलिस को भनक तक नहीं लग सकी. यह वाकया सिर्फ इस बार का ही नहीं है, बल्कि इससे लगभग 2 महीने पहले ही ऐसे ही इसी हाइवे (91) पर दो डकैती की बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं, जिसका मामला पुलिस में दर्ज है. ये सभी वाकये कहीं न कहीं पुलिस की भूमिका को भी संदिग्ध बना रहे हैं और जो शुरूआती संकेत मिले हैं, उसके अनुसार यही प्रतीत होता है कि अपराधियों को कहीं न कहीं नेताओं का संरक्षण भी हासिल था. क्योंकि, कुछ अपराधियों की गिरफ़्तारी और आनन-फानन में उनका नाम बदलने की जो कोशिश हुई, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है. 



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हम सभी जानते हैं कि अगर पुलिस डिपार्टमेंट चाह दे तो आधा अपराध अपने आप बंद हो जायेगा, क्योंकि पुलिस के पास  हर अपराधी का कच्चा-चिट्ठा रहता है. फिर कौन सी ऐसी मज़बूरी है कि पुलिस हाथ पर हाथ धरे अपराध होने का इंतजार करती है और अत्यधिक दबाव न हो तो केस को इधर-उधर करके चलता करती है. पीड़ित परिवार ने 3 महीने का समय देते हुए न्याय न मिलने पर अपनी आत्महत्या की धमकी दी है, और अखिलेश यादव को चाहिए कि इस मामले में चाहे फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाना पड़े अथवा पूरे पुलिस विभाग में उथल-पुथल करनी पड़े, पीड़ितों को न्याय हर हाल में और निश्चित अवधि में मिले! इस घटना के इतर हम देखते हैं तो निश्चित तौर पर पूरे भारत में औरतों के प्रति आपराधिक घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है और ऊपर दिए गए नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़े स्वतः इस बात की गवाही देते हैं. यूपी के इस बहुचर्चित घटना से (Crime in Uttar Pradesh, Rape case, Hindi News, Articles) कुछ ही दिन पहले दिल्ली में एक बच्ची के बलात्कार का मामला राज्यसभा में उठा था, पर नतीजा वही रहा 'ढाक के तीन पात'! इस बात में कोई शक नहीं है कि अब से भी अगर पुलिस प्रशासन को टाइट किया जाये तो स्थिति में काफी सुधार हो सकता है. इस मामले में पुलिस को 100 नंबर पर की गयी कॉल से सम्बंधित जो समस्याएं सामने आयी हैं, मसलन लाइन बीजी जाना, फोन नहीं उठना, इत्यादि पर गंभीरता से कार्य करने की भी जरूरत है, जिससे जवाबदेही तय की जा सके! 

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जिस परिवार ने यह वारदात झेली है, उसके दुःख की भरपाई तो नहीं हो सकती है परंतु अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा देकर इस मामले में मिसाल तो कायम किया ही जा सकता है. इस क्रम में, एक और अहम बात है कि जनता को भी अपनी सुरक्षा के प्रति जागरूक रहना होगा, सिर्फ पुलिस के भरोसे बैठने से नुकसान हमारा ही है. हमें कोशिश करनी चाहिए कि रात में लंबे सफर से बचा जाए और जरूरी होने पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल किया जाये. जनता की जागरूकता अपनी जगह है, किन्तु सच तो यही है कि अपराधियों के उदय और संरक्षण के लिए राजनीतिक व्यवस्था (National Highway 91, Hindi Article, New, Akhilesh Government, Azam Khan, Minister Statement) काफी हद तक जिम्मेदार है. राजनेता बकायदे पुलिस पर अपराधियों के साथ समयानुसार नरमी और सख्ती बरतने के लिए तैयार करते हैं तो 'भ्रष्ट' पुलिस अधिकारी और पुलिसकर्मी अपने निहित स्वार्थ के लिए उनका साथ देते हैं. जाहिर है, ऐसे में जनता तो बेबश ही नज़र आएगी और तब तक उसकी बेबशी बनी रहेगी जब तक किसी एक के दुःख में समूची जनता सडकों पर न उतर जाए. एनएच 91 की घटना की चर्चा तो खूब हुई, किन्तु पीड़ितों को न्याय दिलाने के नाम पर समाज किस प्रकार चुप्पी साध गया, यह भी एक बड़ा प्रश्न हमारे सामने छूट गया है और अगर समाज को हमें अपराधमुक्त करना है तो इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना ही होगा, ढूंढना ही होगा!

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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