नज़मा हेपतुल्ला एवं जगदीश मुखी को मिला 'वफादारी' का इनाम, पर... Najma Heptulla, Jagdish Mukhi, V P Singh Badnore, Banwarilal Purohit, Senior BJP Leaders, Governor of Manipur, Andman Nikobar, Punjab, Assam



यूं तो राजनीतिक लोगों को राज्यपाल बनाकर उपकृत करने की परंपरा कांग्रेसी शासनकाल से ही रही है, किन्तु भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इस परंपरा को दो कदम आगे ही बढ़ाया है. देखा जाए तो इसमें कोई खास बुराई तो नहीं है, किन्तु यह जरूर सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि राज्यपाल बनने के पहले जो कोई भी राजनीतिक व्यक्ति हो, उसे राजनीति से अपना मन हटाकर सिर्फ 'संवैधानिक दायित्वों' के प्रति ही सजगता दर्शानी चाहिए. केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार को तो इस मामले में ख़ास सावधानी (Senior BJP Leaders, Governor of Manipur, Andman Nikobar, Punjab, Assam, New Appointment) बरतने की आवश्यकता है, क्योंकि जिस प्रकार अरुणाचल, उत्तराखंड जैसे राज्यों में पिछले दिनों संवैधानिक संकट उत्पन्न हुए, उसे कोई अच्छा लक्षण नहीं माना जा सकता है. उत्तर प्रदेश के राज्यपाल महोदय भी जब तब सरकार और मंत्रियों की आलोचना करते रहते हैं, जिनसे बचा जा सकता है. दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर नज़ीब जंग और दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल की जंग कोई छुपी कहानी नहीं है, बल्कि इसने पिछले दो सालों में सर्वाधिक सुर्खियां बटोरने वाली अहमियत हासिल की है. हालाँकि, केंद्र शासित प्रदेशों में राज्यपाल की भूमिका काफी बढ़ जाती है और इसे संघ शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अनिवार्य रूप से याद रखना चाहिए. पर इस बात में किसी भी प्रकार का संदेह नहीं किया जाना चाहिए कि राज्यपाल की भूमिका गैर राजनीतिक होनी चाहिए. 

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पिछले दिनों अंतरराज्यीय परिषद् की बैठक में इस मुद्दे पर काफी चर्चा हुई थी तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक नया राग ही छेड़ दिया था कि लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में राज्यपाल पद की जरूरत ही नहीं है! खैर, यह चर्चा आगे नहीं चली किन्तु राज्यपाल पद की गरिमा बनाये रखने की आवश्यकता पर किसी को रत्ती भर भी संदेह नहीं होना चाहिए तो राजनीति से परे हटकर संवैधानिक मूल्यों की जानकारी उनके लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण होना चाहिए. उम्मीद की जानी चाहिए कि 15 अगस्त के तुरंत बाद नवनियुक्त राज्यपाल इस सम्बन्ध में अनभिज्ञ नहीं रहेंगे. ख़बरों के अनुसार, पूर्व केंद्रीय मंत्री नजमा हेपतुल्ला को मणि‍पुर का राज्यपाल बनाया गया है, तो राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी विज्ञप्ति के मुताबिक, बीजेपी नेता जगदीश मुखी को अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह का लेफ्टिनेंट गवर्नर बनाया गया है. इनके (Najma Heptulla, Jagdish Mukhi, V P Singh Badnore, Banwarilal Purohit) अलावा बनवारी लाल पुरोहित असम के गवर्नर बनाए गए हैं, जबकि वीपी सिंह बदनोर पंजाब के राज्यपाल  नियुक्त किए गए हैं. साफ़ जाहिर है कि भाजपा ने अपने पुराने चेहरों को इनाम दिया है. नजपा हेपतुल्ला इससे पहले केंद्र सरकार में अल्पसंख्यक मंत्री थीं और वह अब मणिपुर की 18वीं राज्यपाल होंगी. जाहिर है कि मुस्लिम चेहरे के रूप में नज़मा हेपतुल्ला को अपने साथ जोड़े रखना भाजपा के लिए आगे भी फायदेमंद रहेगा. 

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बताते चलें कि 75 से ज्यादा उम्र होने के कारण मणिपुर की नई गवर्नर नजमा हेपतुल्ला को 12 जुलाई 2016 को मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था, जबकि उनकी जगह मुख्तार अब्बास नकवी को प्रमोट कर अल्पसंख्यक मंत्री बनाया गया, इससे पहले वह इसी विभाग में राज्यमंत्री थे. जहाँ तक जगदीश मुखी की बात है तो वह दिल्ली भाजपा के एक प्रमुख चेहरे रहे हैं और पिछले लोकसभा चुनाव में पश्चिमी दिल्ली से उनका लोकसभा टिकट काटकर प्रवेश वर्मा को टिकट दिया गया था. तब से ही जगदीश मुखी को महामहिम बनाने की कुछ हलकों में चर्चा थी, किन्तु इसमें काफी समय लग गया. वीपी सिंह बदनोर (Senior BJP Leaders, Governor of Manipur, Andman Nikobar, Punjab, Assam, Indian Constitution) भी भीलवाड़ा से भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे हैं, जिनका राज्यसभा कार्यकाल हाल ही में पूरा हुआ है. वीपी सिंह बडनोर को एक किसान और पर्यावरणविद के रूप में भी मान्यता प्राप्त है. बनवारी लाल पुरोहित यूं तो पहले कांग्रेस में रहे हैं किन्तु संघ मुख्यालय नागपुर से भाजपा को वह जीत दिला चुके हैं. राम मंदिर आंदोलन के समय उन्होंने भाजपा ज्वाइन किया था. जाहिर है, सभी नवनियुक्त राज्यपाल राजनीतिक दुनिया के पक्के खिलाड़ी रहे हैं और देखने वाली बात यह होगी कि वह अपनी राजनीतिक सूझ बूझ से संवैधानिक मूल्यों की रक्षा किस प्रकार करते हैं. हालाँकि, आने वाले दिनों में जिन राज्यों में चुनाव होने हैं उसमें पंजाब और मणिपुर भी शामिल हैं और कहीं न कहीं भाजपा को इनका कुछ लाभ भी मिल सकता है, पर सच तो यह है कि राज्यपालों को अपना ध्यान राजनीति की ओर ज़रा भी नहीं लगाना चाहिए, अन्यथा इस पद की गरिमा पर सवाल उठते ही रहेंगे, जो हमारे संवैधानिक मूल्यों के लिए किसी भी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता है.

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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