21वीं सदी शर्मसार है! New hindi article by mithilesh, richest and poorest people, black money


अमीरी-गरीबी का मुद्दा सर्वकालीन है, इस बात में कोई दो राय नहीं है. हाँ! आज चूँकि हम खुद को आधुनिक, शिक्षित, विकासशील, मानवतावादी और जाने क्या-क्या होने का दावा करते रहते हैं तो ऐसे में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई को नापना जरूरी हो जाता है कि क्या वाकई में हम वह हैं, जिसका होने का दावा करते थकते नहीं? इस सन्दर्भ में गहराई से जाने पर आपको लगेगा कि फ़ोर्ब्स या वेल्थ-एक्स जैसी कंपनियां दुनिया के उन तमाम इंसानों का मजाक उड़ाती हैं, जिन्हें इंसानियत के बुनियादी हक़ भी हासिल नहीं हो सके हैं! पहले की ही तरह, वेल्थ-एक्स की हालिया रिपोर्ट में अमीरों की अमीरी की एक बार फिर झलक दिखलाई गयी है. बड़ा दिलचस्प लगता है यह देखना और समझना कि दुनिया में किस-किस कुबेर के पास क्या-क्या सम्पदा मौजूद है? जरा गौर फरमाइए इन आंकड़ों पर! दुनिया के अमीरों की इस लिस्ट में आईटी की दुनिया के बादशाह और माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स 87.4 अरब डॉलर यानी करीब 5.9 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ फिर से एक बार दुनिया के सबसे अमीर आदमी बन गए हैं. पहले नबंर पर बिल गेट्स के बाद, दूसरे नबंर पर कोई अमाचिओ ओर्टेगा हैं जिनके पास 4.5 लाख करोड़ रुपये है. इसी तरह, तीसरे नबंर पर ब्रेकशिरे हथवे के पास 4.1 लाख करोड़ रुपये है तो चौथे नबंर पर जैफ बेजॉन के पास 3.8 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति है. इसके बाद, पांचवें नबंर पर 3.2 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ कोच इंडस्ट्रीज के डेविड कोचल हैं, छठे स्थान पर कोच इंडस्ट्रीज के चार्ल्स कोच हैं, सातवें स्थान पर ओरेकल कॉरपोशन के लैरी एलिसन और उसके बाद आठवें स्थान पर फेसबुक के मार्क जकरबर्ग हैं जिनकी संपत्ति 2.9 लाख करोड़ रुपये है. 

फेसबुक की बात आयी है तो बताते चलें कि हालिया तिमाही नतीजा आने के बाद फेसबुक के शेयर 6.78 डॉलर या सात प्रतिशत चढ़कर 101.23 डॉलर पर पहुंच गए हैं. हालांकि इनकम के लिहाज से गूगल, फेसबुक की तीन गुनी बड़ी कंपनी बनी हुई है, लेकिन फेसबुक यह अंतराल धीरे-धीरे कम कर रहा है क्योंकि यह कंपनी अपने लोकप्रिय सोशल नेटवर्किंग एप्लिकेशन के जरिए ज्यादा मोबाइल विज्ञापनों की बिक्री कर रही है. साफ़ जाहिर है कि ज़ुकरबर्ग पहले फेसबुक और अब फ्री बेसिक्स के माध्यम से धनाढ्यों में शीर्ष पर पहुँचने की पूरी तैयारी कर चुके हैं. धनवानों की इस लिस्ट में, ब्लूमबर्ग ग्रुप के माइकल ब्लूमबर्ग का नंबर नौवां है तो दसवां स्थान रिटेल कंपनी आईकेईए के इनग्वार कम्पर्ड को मिला है. भारत के सन्दर्भ में इस सूची को देखें तो, 24.8 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ मुकेश अंबानी 27वें पायदान पर, अजीम प्रेमजी 16.5 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ 43वें स्थान पर और फिर दिलिप सांघवी 16.4 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ 44वें स्थान पर विराजमान हैं. यह तो हुई एक बात, किन्तु इससे आगे की कहानी बिलकुल ही अलग और कहीं न कहीं दर्द देने वाली भी है. अमीरों की बात अगर थोड़ा दुसरे शब्दों में करें तो, एक आंकलन के अनुसार, दुनिया में 62 ऐसे लोग हैं जिनके पास इतनी दौलत है जितनी इस धरती पर मौजूद आबादी के आधे सबसे गरीब लोगों के पास भी नहीं है! चौंकिए नहीं, एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ ऑक्सफैम (Oxfam) के अनुसार, 2016 के जनवरी महीने का यह आंकड़ा हमारी इंसानियत और अमीरी को बेहद सटीकता से आइना दिखाती है. बताते चलें कि ऑक्सफेम 90 देशों में काम कर रही 17 संस्थाओं का एक इंटरनेशनल संगठन है जिसका मकसद गरीबी, भुखमरी से लड़ना है. यह संस्था साफ़ कहती है कि दुनिया का हर तीसरा आदमी भारी गरीबी में जी रहा है. यही नहीं, बल्कि इसके आंकड़ों के मुताबिक आर्थिक गैर बराबरी पिछले कुछ सालों में बड़ी ही तेज़ी से बढ़ी है. साफ़ है कि ऐसे में फ़ोर्ब्स या वेल्थ-एक्स की दुनिया के अमीरों की लिस्ट जारी करना मानवता के लिए शर्मसार ही करने वाला है! 

ऐसे हालातों में जो सबसे मुश्किल बात उभर कर सामने आती है, वह यह है कि गरीबी और अमीरी के इन आंकड़ों से दुनिया के नीति-निर्धारकों और खुद तथाकथित धनाढ्यों के ऊपर शायद ही किसी बात का फर्क पड़ता है! अभी हाल ही में कॉर्पोरेट के ऊपर सीएसआर (कॉर्पोर्टेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) के तहत भारत सरकार द्वारा अनिवार्य रूप से मुनाफे का दो फीसदी (शायद) खर्च करने की सुगबुगाहट ही उठी थी कि तमाम कॉर्पोरेट घरानों ने इसके खिलाफ दबे स्वरों में मोर्चा खोल दिया! कई आंकलन यह साफ़ बताते हैं कि सीएसआर कई कंपनियों में औपचारिक भर ही हैं और इससे अगर कुछ कंपनियां आगे बढ़ती भी हैं तो वह इससे अपना पीआर मजबूत करके व्यापार बढ़ा लेती हैं! ऐसे में सीधा प्रश्न यही उठता है कि अगर 21 वीं सदी में भी हम गरीबी-अमीरी के बारे में इतनी गहराई से बात कर रहे हैं तो क्या अपने आप में हमारी बुद्धिजीविता के लिए यह शर्मिंदा करने वाली बात नहीं है? अगर हाँ! तो इससे निपटने के ठोस उपाय कहाँ हैं? अगर गरीबी की परतों को और उधेड़ें तो 2011 में दुनिया के 388 सबसे अमीर लोगों के पास आधी ग़रीब दुनिया के बराबर दौलत थी, जो 2012 में ये 177 अमीरों के पास सिमट गई. 2014 में यह 80 लोगों के पास रह गई और 2015 में 62 सबसे अमीर लोगों के पास. मतलब साफ़ है कि पूँजी ख़ास जेबों में बड़ी तेजी से केंद्रित होती जा रहे है! इसके साथ-साथ, ऑक्सफेम की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के गरीब देशों की हालत तो और भी खराब है, क्योंकि दुनिया के रिच पर्सन्स ने 7.6 ट्रिलियन डॉलर संपत्ति दूसरे देशों में छुपा रखी है. इससे सम्बंधित देशों की सरकारों को 190 अरब डॉलर टैक्स का नुक्सान स्वाभाविक ही है. ऑक्सफैम ने गंभीर आर्थिक गैर बराबरी को रोकने के लिए तीन तरफा कोशिशों की वकालत करते हुए कहा है कि टैक्स से बचने के रास्तों पर कार्रवाई, जनसेवाओं में ज्यादा निवेश और कम तनख़्वाह पाने वालों के वेतन में भारी इजाफ़ा समस्याओं से काफी हद तक निजात दिल सकती है. यह सारी बातें हम कुछ टूटे-फूटे आंकड़ों में हम पहले भी जानते रहे हैं! 

आखिर, देश में काले धन के मुद्दे पर सरकार तक बदल गयी और प्रत्येक भारतीय के बैंक अकाउंट में पंद्रह लाख आने की बात यही तो थी! पर हाय रे अमीरी-गरीबी के मुद्दे! तेरा न तब कुछ हुआ, और आज भी कुछ न होगा! भले ही कोई अन्ना, रामदेव या ऑक्सफैम कुछ आंकड़े, कुछ आंदोलन क्यों न हो जाए! इस मामले में हम जितना ही अंदर घुसेंगे, उतनी ही पीड़ा होगी क्योंकि मूल समस्या यह है कि इंसान जब तक पीड़ित रहता है, वह संघर्ष करता है, आवाज उठाता है, किन्तु ज्योंही वह कुछ लेवल ऊपर आता है, वैसे ही उसका स्वभाव अचानक ही परिवर्तित हो जाता है और वह भी काले धन के रूप में गरीबों का हक़ किसी क्रीमी लेयर या कृमी कीड़े की भांति चाटना, हड़पना शुरू कर देता है. फिर मुश्किल यह होती है कि वह पैसा, जो गरीबों का हिस्सा है, उसे अमीर लोग और कंपनियां टैक्स बचाने के लिए टैक्स हेवेन्स में जमा करती जाती हैं और अंततः गरीबी और गैर बराबरी का मुकाबला करने के लिए जरूरी संसाधन सरकारों को नहीं मिल पाते. भ्रष्टाचारी नेता इस मामले में टैक्स हेवेन्स का जान बूझकर संरक्षण करते हैं. अनुमान है कि मल्टीनेशनल कंपनियों की ओर से इस तरह टैक्स बचाने से विकासशील देशों को हर साल 100 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है. साफ़ है कि मुसीबत की जड़ें गहरी जम चुकी हैं और हम तथाकथित बुद्धिजीवी फ़ोर्ब्स या वेल्थ-एक्स की दुनियाभर की अमीरों की लिस्ट देखकर 'रोमांचित' होते हैं! मुकेश अम्बानी जैसे धनाढ्य 'एंटीला' जैसे ऊँचे टावर पर चढ़कर घोषणा करते हैं कि यह क्षण 'रिलायंस परिवार' के लिए गौरव का है! काश वह यह भी बता सकते कि कौन से रिलायंस परिवार के लिए यह गौरव का क्षण है? क्या वह 30 - 40 हजार एम्प्लोयी, जो मुकेश अम्बानी से जुड़े हुए हैं?  अगर हाँ! तो बाकी देशवासियों के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी बनती है या नहीं? और अगर नहीं! तो फिर रिलायंस या दुसरे किसी भी कार्पोरेट घराने का सीधा मतलब तो कोई 'अम्बानी' या 'अमाचिओ ओर्टेगा' ही तो हैं? बाकी जनता और खुद उनके एम्प्लाइज को भी 21वीं सदी में वही तो मिलता है, जिसे कहते हैं ... बाबाजी का ... !!!

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