केरल में 'वाम' ने फहराया परचम, कांग्रेस यहाँ से भी निराश! Assembly polls in 2016, Kerala Vidhansabha chunav, Hindi Article, Mithilesh

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पिछले दिनों केरल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली खासी चर्चित रही थी, क्योंकि उन्होंने केरल के विकास की तुलना युद्धग्रस्त और बदहाल देश सोमालिया से कर दी थी. कांग्रेसी तो कांग्रेसी, बल्कि आम जन भी प्रधानमंत्री की इस तुलना पर भड़ास निकालते दिखे थे. खैर, अब चुनाव संपन्न हो चुके हैं, उसके परिणाम भी आ चुके हैं और केरल की हालत सोमालिया जैसी है कि नहीं, यह तो अलग बात है, किन्तु कांग्रेस जरूर 'राजनीतिक सोमालिया' की स्थिति में पहुँच चुकी है. जी हाँ, कांग्रेसनीत यूडीएफ गठबंधन को 140 में मात्र 47 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा है, वहीं लेफ्ट गठबंधन एलडीएफ को 83 सीटों पर भारी बहुमत मिला है. प्रधानमंत्री और आरएसएस कैडर के जान झोंकने के बावजूद भाजपा इस राज्य में मात्र 1 सीट ही जुटा सकी है. जाहिर है, प्रधानमंत्री की 'सोमालियाई' टिपण्णी को राज्य की जनता ने कुछ खास पसंद नहीं किया. यहाँ तक कि पूर्व और चर्चित क्रिकेटर रह चुके एस. श्रीसंत पर भी भाजपा का लगाया दांव बेकार चला गया और वह खुद ही चुनाव हार गए. हालाँकि, 4% का वोट शेयर बढाकर भाजपा ने इसे 10% जरूर पहुंचा दिया है, जो आने वाले दिनों में इस राज्य की सियासत में कुछ उलट फेर जरूर कर सकती है. हालाँकि, दिल्ली दूर है कि तर्ज पर आरएसएस कैडर को यहाँ और भी लड़ाई लड़नी पड़ेगी जो राजनीतिक होने के साथ-साथ खूनी भी होगी ही! बताते चलें कि केरल में लेफ्ट और राइट के बीच जानलेवा फाइट इस राज्य में आम बात रही है, क्योंकि लेफ्ट के गढ़ में सेंध लगाने का यही मतलब है. खैर, भाजपाइयों ने भी हार नहीं मानी है और हर स्तर पर लेफ्ट के साथ भिड़ंत को तैयार दिखे हैं. चुनावी दृष्टि से देखते हैं तो, इस विधानसभा की 140 सीटों के लिए इस बार 109 महिला उम्मीदवारों सहित कुल 1,203 उम्मीदवारों ने चुनाव मैदान में ताल ठोंकी थी. वैसे, केरल में हमेशा की तरह इस बार द्विकोणीय लड़ाई ही थी, जिसमें कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ को वाम मोर्चे के नेतृत्व वाली एलडीएफ ने जबरदस्त पटखनी दी है.

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वैसे इस बार वीएस अच्युतानंदन के नेतृत्व में एलडीएफ सत्ता में वापसी की उम्मीद पहले ही थी, जो आखिरकार सही साबित हुई. पश्चिम बंगाल में अपना अस्तित्व खो चुके वाम मोर्चा को केरल में 92 साल के अच्युतानंदन की रणनीति, जोश और चुनावी गणित का ही सहारा था, जो आखिर में सटीक साबित हुआ. एलडीएफ गठबंधन के लिए केरल विधानसभा चुनाव में प्रचार में अच्युतानंदन ने पूरी ताकत झोंक दी थी. रोज औसत 200 किमी की यात्रा तय करने वाले अच्युतानंदन ने करीब- करीब 70 रैलियों को संबोधित किया, जिसका परिणाम सामने है. केरल के चुनाव में सबसे बड़ा झटका कांग्रेस को लगा है, क्योंकि सोलर घोटाला, शराब घूसकांड जैसे मामले कांग्रेस के गले की हड्डी बन गए. वैसे भी कांग्रेस की समस्या स्थानीय के साथ-साथ केंद्रीय स्तर पर भी है, जो उसके सीनियर नेता खुलकर स्वीकार भी करने लगे हैं. तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने इन चुनाव परिणामों पर कहा कि यह हार काफी निराशाजनक है और यह वक्त कांग्रेस के लिए पुनर्विचार करने का है, तो पार्टी के पुनर्निर्माण की जरूरत पर भी थरूर ने बल दिया है. उन्होंने साफ़ कहा कि केरल में पार्टी के नेता व्यक्तिगत तरक्की की सोचने लगे थे. हालाँकि, कांग्रेस को सलाह दूसरे बड़े नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी दी और कहा है कि पार्टी को आत्मावलोकन की जरूरत है. जो चुनाव नतीजे आए हैं, वो निराशाजनक हैं. सिंधिया के मुताबिक, कांग्रेस पार्टी को अपनी नीतियों पर चिंता करनी होगी, ताकि आम लोग उसके बारे में समझे और आंकलन कर सकें.

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जाहिर हैं, अब सवाल कई ओर से उठेंगे और उनका उत्तर भी कांग्रेस गठबंधन को ही ढूंढना होगा. जहाँ तक वाम मोर्चे का सवाल है तो इस बार उसकी जीत 'सत्ता-रोटेशन' के केरल के स्वाभाव के अनुरूप तो हो गयी है, किन्तु अगर पार्टी विरोधी पार्टियों के कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमलों पर लगाम नहीं लगा पाती है तो न केवल राज्य की बेइज्जती होगी, बल्कि वह जनता की नज़रों से भी उतर सकती है. आखिर, पश्चिम बंगाल में भी तो वाम कार्यकर्त्ता गुंडई का ही सहारा लिया करते थे और आज हालत यह है कि वहां पर हुए चुनाव में कांग्रेस के साथ के बावजूद मात्र एक तिहाई सीटों पर ही सिमटना पड़ा है. आपसी संघर्ष का एक संकेत तो चुनाव परिणाम के दिन ही दिख गया. केरल के कन्‍नूर में एक रैली के दौरान कथित रूप से बीजेपी और वाम दलों के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प में एक शख्‍स की मौत हो गई. बताया जा रहा है कि वामपंथी कार्यकर्ता पार्टी की सत्ता में वापसी का जश्‍न मना रहे थे, जिस दौरान आपसी संघर्ष हुआ. वाम नेताओं को अपने कार्यों पर ज्यादा भरोसा रखना चाहिए और गाँव-शहरों पर राजनीतिक कब्ज़ा करने की बजाय खुले दिल से राजनीति करनी चाहिए. केरल में यह बात एक बड़ी समस्या के रूप में दिखी है, जिसे वाम मोर्चे के साथ-साथ अन्य दलों को भी परहेज के रूप में आजमाना चाहिए, जिससे राजनीतिक संघर्ष की बजाय यह राज्य विकास और खुशियों की नयी इबारत लिख सके!
- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.

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