महंगाई, सरकारी नीतियां एवं गन्ना किसानों का दुर्भाग्य! Sugarcane Farmers, Inflation, Hindi Article, New, Subsidy, Agriculture in India, Government Policy



भारत दिन पर दिन विकास की ओर बढ़ता चला जा रहा है, लेकिन इसके विपरीत भारतीय किसान और कृषि व्यवस्था पीछे की ओर जा रही है. एक तो परंपरागत खेती और दूसरा मौसम की मार, दोनों ही किसानों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए जिम्मेदार हैं, तो सरकारों की इस सम्बन्ध में बनाई नीतियों से कुछ ख़ास फायदा होता नज़र नहीं आ रहा है. इन सबके बावजूद भी यदि खेतो में पैदावार अच्छी हुई तो साहूकार और कर्जदारों की मनमानी सहना पड़ता है सो अलग! पैदावार अच्छी होने पर एक और मुसीबत जो किसानों को झेलनी पड़ती है, वह मूल्य-नियंत्रण है. ऐसा कई बार देखा गया है कि आलू-टमाटर या प्याज की पैदावार अच्छी होने पर उसकी कीमत 2 रूपये किलो तक पहुँच जाती है और किसान बर्बाद (Farmers in India, Inflation, Hindi Article, New, Agriculture issues) हो जाता है. यह समझने वाली बात है कि जो प्याज या टमाटर कई बार 2 रूपये, 10 रूपये किलो तक चले जाते हैं, वही कुछ दिन बाद 80 और 100 रूपये किलो तक किस प्रकार पहुँच जाते हैं. साफ़ जाहिर है कि खाद्य-दलालों ने किसानों की बर्बादी में अपनी भूमिका खूब निभाई है तो सरकार चुप्पी साधे बैठी रहती है. ज्यादा कुछ हुआ तो थोड़े होहल्ले के बाद एकाध छापेमारी और फिर 'इतिश्री' कर ली जाती है. पिछले कुछ सालो में किसानों की परिस्थितियों पर नजर डालने से उनकी हालत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में कई साल से पड़ रहे सूखे की वजह से कितने किसानों ने आत्महत्या कर ली. 

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एक रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक साल अपनी हालत से हार कर करीब-करीब 10000 किसान तक आत्महत्या कर लेते हैं. कृषि प्रधान कहे जाने वाले हमारे देश में किसानों के पास 62 फीसदी कृषि भूमि है, जबकि उसमें से 90 फीसदी किसानों के पास कुल कृषि भूमि का मात्र 34 फीसदी भूमि ही है. सरकार को इस तरह की असमानता पर भी गौर करना चाहिए, क्योंकि आज कल तमाम किन्तु-परंतु के बाद नए तरह के जमींदार पैदा हो गए हैं जो उद्योग के नाम पर ज़मीन हड़प लेते हैं, और जिसकी ज़मीन होती है, वह बिचारा खेतिहर मजदूर बन कर रह जाता है. चिंता की बात यह भी है कि 1970 के बाद कृषि उत्पादन के कई क्षेत्रों में गिरावट दर्ज हुई है, जिसका लगातार बने रहना निश्चित रूप से चिंतनीय है. पिछले दिनों दाल की महंगाई (Farmers in India, Inflation, Hindi Article, New, Agriculture issues) पर काफी कुछ कहा-सुना गया है. यहाँ तक कि नरेंद्र मोदी के 2014 चुनाव के समय उछले पॉपुलर नारे 'हर हर मोदी' की तर्ज पर राहुल गाँधी ने संसद में 'अरहर मोदी, अरहर मोदी' का नारा लगा दिया. यह अलग बात है कि जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब उसके समय में महंगाई बेहिसाब थी, पर चूँकि वह हार चुकी है और विपक्ष की भूमिका में है, इसलिए महंगाई का जवाब तो केंद्र सरकार को देना ही चाहिए. दाल की महंगाई को कम करने के लिए, किसानों की हालत में सुधार और उत्पादन की समस्या को सुलझाने की बजाय, सरकार ने मोजाम्बिक से दाल के आयत में वृद्धि कर दिया है. अब यह तो 'कोढ़ में खाज' वाली स्थिति है, जो तात्कालिक तो फायदा दे सकती है, किन्तु एक तरह हमारे किसानों को नुक्सान ही पहुंचाएगी तो अर्थव्यवस्था पर बोझ भी बढ़ेगा ही बढ़ेगा! 


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आपको बता दें कि हमारे देश में जितनी कृषि योग्य भूमि को 'परती' (एक सीजन में कोई बुआई नहीं) छोड़ा जाता है, उससे भी कम भूमि में मोजाम्बिक का उत्पादन इतना है कि वह अपनी जरूरत पूरी करने के साथ-साथ निर्यात भी करता है. ऐसे में अगर हम इन देशों से दाल का आयात करने की बजाय, उनके दाल उत्पादन के तरीकों को अपने देश में लागू कर सकते तो क्या यह बेहतर न होता! हालाँकि मोदी सरकार की तरफ से कुछ कोशिश जरूर की गई है, लेकिन यह कहाँ तक सफल है, इसका अंदाजा सरकार को भी नहीं होगा! किसानों की सहायता के लिए जन-धन योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, सूखा राहत, बजट में ऋण दर पर सब्सिडी के लिए मोटी रकम का प्रावधान, पैदावार का उचित मूल्य के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (Farmers in India, Inflation, Hindi Article, New, Agriculture issues) के निर्धारण जैसी योजनाएं जरूर बनी हैं. इतना ही नही डिजिटल इंडिया के तहत एकीकृत राष्ट्रीय कृषि बाजार की स्थापना और 585 मंडियों को ऑनलाइन करना, जिससे किसानों को उनके पैदवार के लिए उचित मूल्य का सरकारी बाजार मिल सके, भी किया गया है. सरकार ने किसानों को उनके उत्पादन के लिए उचित मूल्य देने के साथ साथ किसानों के पिछले बकाया का भी भुगतान किया है. इसमें उत्तर प्रदेश के गन्ना मीलों के किसानों के बकाये राशि की भुगतान के लिए ऋण तक सरकार मुहैया कराया हैं. उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए सरकार ने ऋण तो मुहैया करा दिया, लेकिन यह किसानों का दुर्भाग्य ही है कि किसानों के बकाया भुगतान करने के बजाय चीनी के दामों में इजाफा कर गन्ना मिल-मालिक खुद मुनाफा कमा रहे हैं. बेहद आश्चर्य है कि चीनी के मूल्य पिछले एक साल के मुकाबले इस साल 60 फीसदी तक बढ़ गए है, जिससे चीनी प्रति क्विंटल 2300 से बढ़ कर 3600 रूपये हो गया है. 

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सरकार के सब्सिडी देने और चीनी के मूल्य में वृद्धि होने के बाद भी किसानों को बकाया नही मिला और इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है. इस पर गन्ना मिल के मालिकों का कहना है कि मिल से कोजेनरेशन के जरिये पैदा की बिजली आपूर्ति के बिल का भुगतान राज्य सरकार ने नही किया है. और इस तरह से चीनी मिलों का 750 करोड़ रुपये का बकाया राज्य सरकार पर है. जो सूचना बाहर आयी है, उसके अनुसार राज्य सरकार जब तक मीलों के बकाया राशि का भुगतान नही करती है, तब तक मिल किसानों का बकाया नही चुका सकेगा. आंकड़ों के अनुसार गन्ना किसानों का बकाया राशि के कारण किसानों की समस्या में इजाफा (Sugarcane Farmers in India, Inflation, Hindi Article, New, Agriculture issues) ही हुआ है. सिर्फ उत्तर प्रदेश में 2656 करोड़ रूपये बकाया हैं, जिसमें बजाज ग्रुप पर 450 करोड़, मोदी ग्रुप पर 356 करोड़, सिंभावली ग्रुप पर 316 करोड़ रुपये , मवाना ग्रुप पर 375 करोड़ रुपये और राणा शुगर पर 220 करोड़ रुपये का बकाया है. यह बात भी बेहद अजीब है कि इनके स्टॉक में 200 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई है. ऐसे में किसानों का बकाया नही चुकाना किसानों के खून चूसने से कम नही हैं. सरकार को ऐसे मामलों की तह तक जाना चाहिए और जो भी व्यवहारिक समस्याएं सामने आएं, उसे निपटा कर किसानों की समस्याएं फौरी तौर पर हल करनी चाहिए. अगर देश का किसान ही खुशहाल नहीं होगा तो फिर #अच्छेदिनों की कल्पना भी मुश्किल है और यहाँ खुशहाल कौन कहे, उनके जले पर नमक छिड़का जा रहा है. 

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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