चीन के आर्थिक विकास से प्रेरणा लेने की आवश्यकता! Real facts of China Development, Hindi Article, New, Economy, Politics, Corruption, SEZ, Open Market, Skilled Resources, Product Development, Small and Medium scale Industries



नोटबंदी को लेकर भारत में खूब होहल्ला मचा हुआ है. लोगबाग इससे उत्पन्न प्रभावों, दुष्प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं तो भारतीय अर्थव्यवस्था के छलांग लगाने की बात भी कही जा रही है, किन्तु मामला इससे कहीं आगे का है. इस बात में रत्ती भर भी संदेह नहीं है कि आज की दुनिया 'अर्थ' की दुनिया हो गयी है और समस्त कवायदें इसी के इर्द गिर्द घूमती रहती हैं. जाहिर है तमाम देशों का स्टैण्डर्ड भी आर्थिक विकास से ही मापा जाता है और यही चाहिए भी! भारत का अगर कोई सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी और कई मायनों में शत्रु (India's Top Enemy and Competitor in whole World) है तो वह चीन ही है. इसके पीछे कारण भी बेहद स्पष्ट है जो 1962 का चीन द्वारा विश्वासघाती हमला है, साथ ही साथ वर्तमान परिस्थितियों में भारत के हितों के विरुद्ध चलने और चलते रहने की उसकी नीतियां भी हैं. उदाहरण दें, तो भारत का अगर पाकिस्तान दुश्मन है तो चीन उसका गहरा दोस्त हो जाता है. ऐसे ही, भारत को अगर अमेरिका समेत तमाम देश न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (India in Nuclear Supplier Group) में शामिल करना चाहते हैं तो चीन उस में टांग अड़ा देता है. इतना ही नहीं, अगर भारत हाफिज सईद और अज़हर मसूद जैसे आतंकवादियों को संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से दबाव में लेना चाहता है, तो चीन वहां भी वीटो कर देता है. चीन भारत का विरोध हद दर्जे तक करता है, इस बात में दो राय नहीं! खैर, यह लेख चीन के भारत विरोध के बारे में नहीं है, बल्कि स्वयं चीन के आर्थिक विकास के बारे में है जिसने कभी गरीब रहे इस देश को मात्र तीन दशकों में ही विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना डाला है. दिलचस्प बात यह है कि चीन की अर्थव्यवस्था केवल कुछ धनाढ्य लोगों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आम जनता को भी इसका बड़ा लाभ पहुंचा है. यदि आंकड़ों में बात करें तो, चीन में 1978 तक जो प्रति व्यक्ति आय मात्र $200 थी, अब 2016 में वह $8000 प्रति व्यक्ति पहुंच चुकी है. गुणा-भाग आप करते रहिए और सोचते रहिए कि चीन ने आखिर 70 से 80 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा (China Growth and its effect on Poor People in Hindi) से कैसे बाहर निकाल लिया. मानव इतिहास में इतनी तेजी से, इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने कभी गरीबी से अमीरी का सफर तय नहीं किया है. ऐसे में अगर चीन की तूती बोल रही है तो किसी को आश्चर्य क्यों होना चाहिए? कहते हैं ज्ञान अगर किसी दुश्मन से भी मिल जाए तो उसे ले लेना चाहिए और बात जब 'अर्थव्यवस्था' जैसे महत्वपूर्ण विषय की हो, तो उस मामले में भारत को तिनका-तिनका सीखने की आवश्यकता है. Real facts of China Development, Hindi Article, New, Economy, Politics, Corruption, SEZ, Open Market, Skilled Resources, Product Development, Small and Medium scale Industries


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भारत में राजनीतिक नेतृत्व, भ्रष्टाचार और विकास के लिए दृढ़ इच्छा का ना होना, लोगों में आलसी होने की प्रवृत्ति का प्रबल होना हमारे देश को कहीं पीछे धकेल गया है. यह भी बेहद दिलचस्प बात है कि 1978 के समय जब चीन की प्रति व्यक्ति आय $200 थी उस वक्त भारत की प्रतिव्यक्ति (Per capita income of China minimum maximum) आय कहीं अधिक थी. समझना मुश्किल नहीं है कि चीन हमसे काफी आगे निकल चुका है और इसका श्रेय उसे दिया ही जाना चाहिए. श्रेय न भी दें, तो चीन की सेहत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला, किंतु अगर हम उससे प्रेरणा लेकर अपनी आर्थिक नीतियों को दुरुस्त करते हैं, अपने जनता को विकास के लिए प्रेरित कर पाते हैं तो उसमें सार्थकता ज्यादा नजर आएगी. थोड़ा और विस्तृत बात करें तो, 1947 में भारत आजाद हुआ और 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक आफ चाइना बना. कुछ दशकों तक दोनों देश एक ही रफ़्तार से चलते रहे, बल्कि प्रति व्यक्ति आय में भारत आगे ही रहा (Per capita income of India minimum maximum). 1980 में आर्थिक विकास के महत्वपूर्ण पैमाने एवं सकल घरेलु उत्पाद में दोनों देश एक ही पायदान पर थे. पर आज आंकड़े देख लें आप! भारत की अर्थव्यवस्था आज तकरीबन पांच लाख करोड़ डॉलर की है, चीन की साढ़े 12 लाख करोड़ डालर से अधिक की है. बताना आवश्यक नहीं है कि आर्थिक सुपर पावर होने के साथ-साथ, आज चीन दुनिया का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है. वह भी तब, जब सर्वाधिक आबादी और विकास विरोध का पर्याय माना जाने वाला कम्युनिस्ट शासन प्रणाली चीन में लागू है. किन्तु, चीन ने अपने आर्थिक विकास के इस सफर में न अपनी आबादी को बाधा बनने दिया, न कम्यूनिस्ट शासन को. गौरतलब है कि पूंजीवादी सोच को जड़ से खत्म करने के लिए 1966 से 1976 तक माओ ने कम्युनिस्ट आंदोलन (Mao Zedong communist movement) चलाया था, जिसका नतीजा यह हुआ कि देश की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी. तब, तंग श्याओ पिंग (Deng Xiaoping and Communist party of China in Hindi) तब कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ चीन के अहम सदस्य थे, लेकिन माओ की उस विचारधारा के विरोधी थे, पर माओ बेहद ताकतवर थे और इसलिए उनके सामने किसी और की चल नहीं रही थी. समय बदला और 1976 में माओ की मृत्यु हो गई. उसके बाद तंग श्याओ पिंग का कद बढ़ने लगा. यह भी दिलचस्प है कि फॉर्मल तौर पर उन्होंने चीन की कमान नहीं संभाली लेकिन कम्यूनिस्ट पार्टी पर उनका नियंत्रण मजबूत होता गया और यहीं से चीन विकास के पथ पर आगे बढ़ना शुरू हुआ. साफ़ जाहिर है कि एक नेता की सोच और ताकत से इस देश में बदलावों की सुगंध फैली. बदलाव के इस दौर को 'पीरियड ऑफ रिडजस्टमेंट' कहा गया और फिर विदेश से निवेश बढ़ता चला गया, तकनीकी क्षेत्र में चीन प्रगति के मानक स्थापित करता बढ़ चला. Real facts of China Development, Hindi Article, New, Economy, Politics, Corruption, SEZ, Open Market, Skilled Resources, Product Development, Small and Medium scale Industries



माओ के विपरीत इस दौर में दूसरे देशों के साथ चीन के संबंध सुधारने की शुरूआत भी की गयी और इसका सबसे बड़ा सबूत था 1979 में अमेरिका का चीन (America China Relations in Hindi) की कम्यूनिस्ट सरकार को मान्यता देना. इसके साथ ही ब्रिटेन और जापान से भी चीन ने बेहतर रिश्तों की शुरूआत की. वस्तुतः तंग श्याओ पिंग की आर्थिक सोच बिलकुल साफ़ थी और उनके समाजवाद का मतलब गरीबी खत्म करना था, न कि कंगाली में जीना! फिर तो कदम दर कदम चीन आगे बढ़ा और सस्ते मजदूरों (Cheap Labor cost and economic growth of China) का लालच विदेशी निवेशकों को चीन में खींचकर लाया. चीन को आज दुनिया की फैक्ट्री कहा जाता है, तो इसमें शेनचेन जैसे शहरों का महत्वपूर्ण योगदान है, जिसने तकनीकी चुनौतियों को पार किया, जिसका परिणाम है कि दुनिया भर में 'मेड इन चाइना' की धूम मची हुई है. एक अपुष्ट आंकड़े के अनुसार, पिछले दिनों तक दुनिया भर में 1 अरब 10 करोड़ मोबाइल फोन हर साल बनाये जाते हैं और उसमें भी 50 फीसदी से ज्यादा शेनचेन में ही बनते हैं. ऐसे में अगर चीन के पास सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार है, तो आश्चर्य कैसा? विदेश से आये निवेशकों को भारत के स्पेशल इकनोमिक ज़ोन्स (SEZ - Special Economic Zone in China) की तुलना में सैकड़ों गुना बड़ा और मजबूत इंफ्रास्ट्रकचर देकर चीन ने बिजनेस इनवायरमेंट को बेहद फ्रेंडली बनाया और वहां की गवर्नमेंट भारत जैसे देशों के विपरीत निवेशकों के लिए हर तरह की सहूलियतों को वगैर रूकावट देने को तैयार रही है. ऐसे में अगर  लगातार तीन दशक तक चीन का ग्रोथ रेट 10 फीसद से ज्यादा का रहा है, तो किसी को इसमें रत्ती भर भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए. आज हाई एंड टेक्नालाजी (High end technology in China in Hindi) जिस पर कभी अमेरिका, जर्मनी और जापान जैसे देशों का कब्जा था, उसमें भी चीन ने महारत हासिल कर ली है और आज चीन की बुलेट ट्रेन है, टेक्नोलॉजी में किसी से कम नहीं है. इस जबरदस्त विकास के पीछे राजनीतिक स्थिरता भी बड़ी वजह रही, जिसमें नीति बनी, उसके बाद पूरी ताकत झोंक दी गयी 'टारगेट' को पूरा करने में. हालाँकि, चीन के इस तेज रफ्तार विकास का दूसरा पहलू यह भी है कि नीति बनने के बाद वहां विरोध और बहस की कोई गुंजाइश नहीं है. हालाँकि, चीन ने 'ह्यूमन रिसोर्सेस, बल्कि ट्रेंड ह्यूमन रिसोर्सेस (Skilled Human resources in China, Hindi Article) पर जबरदस्त ढंग से कार्य किया, जिससे ज्यादा से ज्यादा कुशल कारीगर तैयार हुए. इतना ही नहीं, स्किल्ड लेबर तैयार करने के साथ साथ चीन लघु और मध्यम उद्योगों को बढ़ावा देता है और यह इस बात से ही समझा जा सकता है कि चीन के निर्यात में करीब 68 फीसदी योगदान स्माल और मीडियम स्केल इंडस्ट्रीज (Small and Medium scale industries in China, Hindi Essay) का ही है. मतलब, भारत की तरह विकास की राह में छोटे उद्योगों ने चीन में दम नहीं तोड़ा, बल्कि उन्नति ही हासिल की. Real facts of China Development, Hindi Article, New, Economy, Politics, Corruption, SEZ, Open Market, Skilled Resources, Product Development, Small and Medium scale Industries


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साफ़ है कि भारत जैसे देशों में छोटे उद्योगों पर अब तक सरकार के नियमों और लाल फीताशाही (Inspector raaj in India, for small industries) की सर्वाधिक मार पड़ती रही है, जो अंततः नष्ट हो जाते हैं. बड़े उद्योग तो भ्रष्ट प्रशासन और लूटमार करने वाली सरकार को जैसे तैसे झेल जाते रहे हैं, किन्तु छोटे उद्योग तो दम ही तोड़ देते हैं. दुःख की बात यह है कि इस फैक्टर पर आज भी ख़ास ध्यान नहीं दिया जा रहा है तो फिर 'अच्छे दिन' कहाँ से और क्यों आएंगे? देखा जाए तो पिछले तीन दशकों में चीन में एक तरह का बिजनेस कल्चर जन्म ले चुका है. वहां जाने वाले बताते हैं कि वहां कोई भी सौदा छोड़ा नहीं जाता और किसी भी सौदे में नुकसान नहीं उठाया जाता. उदाहरण दें तो अगर आपको मोबाइल खरीदनी है तो चीन में 100 रूपये में भी मिलेगी और 1000 डॉलर में भी वह आपको उपलब्ध होगी. मतलब एक ही प्रोडक्ट के अनगिनत रेंज (Many ranges of Chinese products, Hindi article), अलग-अलग फीचर्स और अगर फीचर्स समान हैं तो अलग-अलग मैटेरियल के साथ! ग्राहक न छोड़ने के कल्चर के कारण चीनी लोग 'घटिया सामान' भी बेच देते हैं, जिससे उन्हें बदनामी भी मिली है, किन्तु अगर प्राइस के हिसाब से आप क्वालिटी की तुलना करें तो आपको कतई निराश नहीं होना पड़ेगा. चीन ने आगे बढ़ने और सामानों की रेंज बढ़ाने के लिए दुनिया भर के सामानों की नक़ल भी की. आपको एप्पल का आईफोन चीनी कंपनी द्वारा आसानी से मिल जायेगा, वह भी पचास गुना कम दाम पर! यह हर तरह के प्रोडक्ट पर चीनी रणनीति है. देखा जाए तो काम के प्रति चीनी लोगों (Work cultures of China, Hindi Essay) का जूनून ही है, जो वह कुछ भी बना डालने के प्रति तैयार रहते हैं. भारत के हर मंदिर और देवी देवता की मूर्ति से लेकर अंतरिक्ष विमानों तक! हालाँकि, तेज विकास के बाद चीन की रफ़्तार में कुछ कमी जरूर आयी है, तो भारत जैसे देश किसी-किसी क्षेत्रों में उसे चुनौती भी दे रहे हैं, पर 'दिल्ली दूर है' की तर्ज पर प्रति व्यक्ति आय और विकास के क्षेत्र में चीन को चुनौती देने में हमें कई दशक लग सकते हैं, वह भी हरामखोरी, राजनीतिक स्थिरता, सामाजिक संतुलन से ज्यादा विकास की प्राथमिकता, अधिकारियों के भ्रष्ट व्यवहार पर पूरी तरह लगाम जैसे फैक्ट्स (Why China and Why not India? Depth analysis of economic growth) पर कार्य किया गया, तो! अन्यथा चीन से मुकाबला दिवाली जैसे त्यौहारों में उसके सामानों पर प्रतीकात्मक विरोध करके ही कर सकते हैं, जबकि ज़मीनी धरातल पर वह हमसे कई मील आगे ही खड़ा रहने वाला है, इस बात में दो राय नहीं!

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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