किन्नर अधिकारों की लड़ाई में सार्थक कदम! Transgender rights and Mahamandleshwar Lakshi in Simhasth, Hindi Article

पिछले साल जून में बड़ी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट 'फेसबुक' ने जब अपनी प्रोफाइल पिक्चर को छः रंगों में रंगने का ऑप्शन दिया तो वह अमेरिकी अदालत के उस फैसले के पक्ष में था कि अब वहां पर 'सेम सेक्स' आपस में शादी कर सकते हैं. ऐसे समय, वाइट हाउस को भी 'सतरंगी' देखा गया था तो दुनिया भर से इसके समर्थन में लोग आगे आये. यदि व्यक्तिगत रूप से कहूं तो यह थोड़ा अजीब तो है, किन्तु जब बात एक बड़े समूह के अधिकारों और उनके जीवन जीने के ऊपर हो तो फिर यह निर्णय बेहद उचित प्रतीत होता है. भारतीय जीवन दर्शन में तो 'जीव-मात्र' के अधिकारों की बात कही गयी है और 'किन्नरों' के सन्दर्भ में इसे भारतीय समाज में पहले से ज्यादा स्वीकृति भी मिल रही है. उज्जैन के 'सिंहस्थ कुम्भ' में किन्नर समुदाय के 'महामंडलेश्वर' और आचार्यों की घोषणा अपने आप में एक क्रन्तिकारी कदम माना जा रहा है, जिससे आने वाले समय में बड़े बदलावों की शुरुआत हो सकती है. इस विषय पर चर्चा आगे की पंक्तियों में करेंगे, उससे पहले किन्नर समुदाय की सामाजिक स्थिति पर नज़र डालना उचित रहेगा. शादी-विवाहों और बच्चे के जन्म जैसे ख़ुशी के अवसरों पर, नाचते गाते किन्नर आपको जरूर दिख जायेंगे और यही इनका कार्य-क्षेत्र भी अब तक निश्चित रहा है, किन्तु अब हालात बदल रहे हैं और अधिकारों की लड़ाई में माकूल परिवर्तन भी आया है. हालाँकि, अन्य दुसरे समूहों की तरह कभी-कभी कुछ किन्नरों के बारे में आपराधिक ख़बरें भी पढ़ने को मिल जाती हैं तो ज़ोर-ज़बरदस्ती पैसे लेने की इनकी हरकतें इतनी बेहूदा होती हैं कि कइयों को शर्मिंदा होना पड़ जाता है. लेकिन क्या आपने कभी इनकी इस हरकत के कारणों के बारे में सोचा है? 

शारीरिक विकलांगता से ग्रसित इन इंसानों की गिनती न पुरुषों में होती है और न ही महिलाओं में और ऐसे में अपने अस्तित्व को लेकर असमंजस की हालत में ये जानवरों से भी बदतर जीवन जीने के लिए मजबूर हो जाते हैं. चाहे बाजार हो या गली - मोहल्ला हर जगह लोग इन्हें अजीब नजरोंं से घूरते मिल जायेंगे! इन्हें व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, दुकानों आदि में मजदूरी का कार्य भी नहीं मिलता और ऐसे में 'जीवन यापन' के लिए यह लोग सम्मान पूर्वक कार्य भी नहीं कर सकते हैं! अपने परिवार में ही इनकी इतनी उपेक्षा होती है कि इनका स्थान बेहद दयनीय हो जाता है. खुद परिवार के लोग, यह बताते हुए शर्मिंदा महसूस करते हैं कि यह बच्चा उनके परिवार में पैदा हुआ है. इसलिए ऐसे लोग पहले परिवार से फिर समाज से कटने लगते हैं, जो स्वाभाविक ही है. धीरे-धीरे अपने जैसे लोगों की खोज करते हुए ट्रांसजेंडरों ने एक समुदाय बना लिया, जिसे किन्नर समुदाय कहते हैं. ये लोग शादी या बच्चे के जन्म पर किन्नर लोगों के घर जाकर  बधाई देते हैं और बदले में शगुन लेते हैं.  इनकी अपनी गद्दी होती है, जो उन्हें उनके बुजुर्गों से मिलती है और यह परपरा चलती रहती है. हालाँकि हमें यह बात स्वीकारने में ज़रा भी हिचक नहीं होनी चाहिए कि हमारे समाज का अहम हिस्सा होते हुए भी ये हमारे समाज द्वारा उपेक्षित हैं. अबसे लगभग दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडरों को तीसरे लिंग के तौर पर मान्यता दी थी और उस समय माना जा रहा था कि शीर्ष अदालत के फैसले से इस विशेष वर्ग की जिंदगी में काफी अहम बदलाव आएगा. स्कूलों में शिक्षा मिलेगी, रोजगार के अवसर मिलेंगे तो बुजुर्ग ट्रांसजेंडरों को पेंशन भी मिलेगी! लेकिन इनमें से एक भी सुविधाएं न तो कागजों में आईं और न ही जमीन पर, हालांकि कुछ जगहों पर फॉर्म्स में तीसरे जेंडर का विकल्प जरूर मिलने लगा है, जैसेकि निर्वाचन आयोग, पंजाब यूनिवर्सिटी, पीजीआई, जीएमसीएच 32 व एलआईसी. लेकिन इस वर्ग से ताल्लुक रखने वाले लोगो की माने तो सरकार का ये कदम नहीं के बराबर है. 

समुचित शिक्षा व रोजगार नहीं होने से  ट्रांसजेंडरों के पास आय का कोई साधन नहीं है और ऐसे में किन्नर समुदाय के लोग 'अपराध' की तरफ मुड़ जाते हैं. ट्रांसजेंडर में जो किन्नर संस्कृति में चले गए उनके लिए फिलहाल ज्यादा मुश्किलें नहीं हैं क्योंकि वहां लोग समूह में रहते हैं जिससे उनकी सुरक्षा हो जाती है.  लेकिन किन्नर-संस्कृति में के अपने नियम तथा कायदे हैं, जिसे हर किन्नर को मानना पड़ता है, वर्ना समाज से निष्कासन तक हो जाता है. जाहिर है ऐसी व्यवस्था आधुनिक विचारों से हटकर ही होती है और लोगों के अधिकारों को कई बार कुचलती भी है. हालाँकि, असल परेशानी तो उन लोगों की है, जो इस समुदाय से नहीं जुड़े हैं. वे ट्रेन में या फिर बस अड्डे पर रुपये मांगते हैं या फिर सेक्स वर्कर बन जाते हैं. ऐसे बहुत कम लोग हैं, जो मेहनत का रास्ता चुनते हैं और अगर कुछ चुनना भी चाहें तो समाज की स्वीकृति भी नहीं मिलती! ज्यादातर ट्रांसजेंडर मानते हैं कि यदि उन्हें शिक्षा मिलती और सोसाइटी उन्हें स्वीकार करती तो वे भी नार्मल लोगों की तरह जिंदगी बिता रहे होते! ट्रांसजेंडर्स, आरक्षण और वित्तीय सहायता के अधिकारों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 2014 में राज्यसभा में एक प्राइवेट बिल "राइट्स ऑफ़ ट्रांसजेंडर  पर्सन्स बिल 2014" जरूर पास किया गया है, लेकिन इसका प्रभाव कहाँ तक होता है, यह देखा जाना बाकी है! वहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस साल राज्यसभा में ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों के लिए पास बिल में संशोधन की जरूरत बताई है और उनका कहना है कि इसमें विसंगतियां हैं और सरकार को बिल पास कराने से पहले समुदाय के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनानी चाहिए और तभी इन लोगों को अधिकार तथा न्याय मिल पाएगा. जाहिर है कि समाज में बदलाव की लहर चल रही है. समलैंगिकता के मुद्दे पर रूढ़ीवादी कही जाने वाली 'आरएसएस' ने भी अपना रुख साफ कर दिया है कि 'समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने' की आवश्यकता है. 

जाहिर है, अब धीरे-धीरे नागरिक अधिकारों के प्रति लोग जागरूक हो रहे हैं तो सिस्टम भी उदारवादी रवैया अपना रहा है. सामाजिक लोगों की भी जिम्मेदारी है कि इनको हेय दृष्टि से न देखे तथा उन्हें अपने ही समाज का अंग समझे. इसी तरह सरकार को चाहिए कि ऐसे लोगों को नौकरी के लिए प्रोत्साहन दे, ताकि वे भी एक सम्मानपूर्ण जिंदगी बिता सकें, उनको स्कूलों तथा कालेजों में उचित दाखिला मिले ताकि वो भी पढ़ लिख के सामान्य जीवनयापन कर सकें! ट्रांसजेंडर कोई मेंटल डिस्आर्डर नहीं है यह बात साबित हो चुकी है. इनमें भी एक आम इंसान जैसी फीलिंग होती है. सामाजिक दबावों के बावजूद ट्रांसजेंडर को छिपाने के बजाए उसे स्वीकार करना चाहिए. पहले खुद को फिर पेरेंट्स को और सोसाइटी को भी! विशेषज्ञों के मुताबिक ट्रांसजेंडर एक आम आदमी की तरह होता है. अंतर सिर्फ इतना होता है कि वे उसके अंदर अपोजिट सेक्स यानी महिलाओं जैसा विचार व स्वभाव होगा. यानी ऊपर से वह पूरी तरह से पुरुष होगा, लेकिन अंदर से उसकी भावनाएं महिला की हाेंगी. समाज में मिथ है कि ट्रांसजेंडर के शरीर में आधे अंग पुरुषों के होते हैं तो आधे अंग महिलाओं के, जबकि ऐसा नहीं होता है. इसी क्रम में ट्रांसजेंडरों के लिए लड़ने वालीं और मिशाल कही जाने वालीं लक्ष्मी किन्नर का नाम तो आपने सुना ही होगा! टी.वी.शो 'बिग बॉस' में भी नजर आ चुकी हैं लक्ष्मी. उन्होंने मिठिबाई कॉलेज से आर्ट्स में डिग्री लेने और भरतनाट्यम में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद केन घोष के म्यूजिक वीडियो में काम किया और वो कोरियोग्राफर बन कर सफलतापूर्वक जीवन यापन कर रही हैं. लक्ष्मी का नाम अक्सर ही किन्नरों के उत्थान तथा अधिकार की लड़ाई लड़ने वाले लोगों में लिया जाता है. उन्होंने किन्नरों के सम्मान के लिए कई मंचों से आवाज उठाई तो वो 2008 में संयुक्त राष्ट्र के एशिया पैसिफिक सम्मलेन में प्रतिनिधित्व करने वाली पहली ट्रांसजेंडर हैं.

किन्नरों के लिए यह गौरव का क्षण ही है कि धार्मिक नगरी उज्जैन में चल रहे एक माह के सिंहस्थ कुंभ मेले के दौरान इस प्रसिद्ध अभिनेत्री और भरतनाट्यम नर्तकी किन्नर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी को किन्नर अखाड़े की पहली आचार्य महामंडलेश्वर बनाया गया है. किन्नर अखाड़े के सरंक्षक ऋषि अजयदास ने बताया कि लक्ष्मीनारायण ने सिंहस्थ में धार्मिक जप अनुष्ठान और मंत्रोच्चार के बीच किन्नर अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर का पद संभाला. लक्ष्मी कहती हैं कि किन्नर अखाड़े को महाकुंभ का हिस्सा बनाने के पीछे भी उनकी मंशा किन्नरों को समाज में एक सम्मानजनक स्थान दिलाने की है. उनका स्पष्ट तौर पर कहना है कि "जब हर कोई हमसे आशीर्वाद और दुआ लेता है तो समाज में किन्नरों के लिए सम्मानजनक स्थान क्यों नहीं है?" हालाँकि अब समाज बदल रहा है. अक्सर सुनने में आता है कि कहीं कोई ट्रांसजेंडर टी.वी. एंकर बनी, तो कोई  स्कूल की प्रिंसिपल, तो कोई पुलिस इंस्पेक्टर और चुनी हुई नेता! हालाँकि, बदलाव की लड़ाई अभी काफी लम्बी है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है.
Transgender rights and Mahamandleshwar Lakshi in Simhasth, Hindi Article,
विपरीत लिंगीय,ट्रांसजेंडर के अधिकार,लोकसभा,विधेयक, Transgender, Rights of Transgender Persons Bill, Loksabha,Parliament,Winter Session,दिल्ली हाई कोर्ट, ट्रांसजेंडर, उत्पीड़न, हिंसा, Delhi High Court, transgender, transgender third gender, recognized, supreme court, attained independence,kinnar, transgender laxmi narayan, mahamandaleshwar,private Bill to promote transgender rights, simhasth kumbh, ujjain, facebook colored profile pic, us supreme court decision, marriage, citizen's right

1 comment:

  1. ये सच है की किन्नरों को समाज में तिरस्कार ही मिलता है लेकिन उम्मीद है एक दिन जरूर लोगो का नजरिया बदलेगा उनके प्रति

    ReplyDelete

Powered by Blogger.