लगाम जरूरी थी विदेशी कंपनियों की चालाकी पर! Google, Facebook Advertising, Tax Policy of India, Hindi Article, Mithilesh

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यूं तो गूगल और फेसबुक की उपयोगिता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है, किन्तु पिछले कई सालों से गूगल और फेसबुक जैसी विदेशी कंपनियां बेहद चालाकी से टैक्स बचाने (या चुराने) में लगी हुईं थीं. जी हाँ, इंटरनेट मार्केटिंग से जुड़े व्यक्ति 'गूगल एडवर्ड्स' के बारे में बखूबी जानते हैं, किन्तु क्या आप यह अंदाजा लगा सकते हैं कि कोई भी भारतीय कंपनी जो एडवर्ड्स के माध्यम से विज्ञापन देती है, उस पर गूगल बेहद सफाई से सरकार को टैक्स नहीं देती थी, क्योंकि भारत में यह बिजनेस, गूगल की भारतीय इकाई नहीं करती थी, बल्कि यह सीधे अमेरिका से हैंडल होता रहा है. मतलब, आप कोई भी पेमेंट करते हैं तो वह सीधे अमेरिका चला जाता है और यह एक तरह से फण्ड-ट्रांसफर माना जाता रहा है. यह भी बेहद दिलचस्प है कि ये कंपनियां यह कहकर टैक्स छूट से बच जाती थीं कि यह व्यापार भारत में तो हुआ ही नहीं, इसलिए सरकार की टैक्स लेनदारी बनती ही नहीं है! पर सच तो यह है कि एडवर्ड्स का व्यापार ही गूगल की कमाई की रीढ़ है और अरबों खरबों का व्यापार इसी से होता है. यही हाल फेसबुक या तमाम होस्टिंग इत्यादि सर्विसेज बेचने वाली इंटरनेट कंपनियों का भी है. देखा जाय तो यह कंपनियां अब तक हज़ारों करोड़ का चूना भारत सरकार को लगा चुकी हैं और इसमें दोष भी अब तक सरकार का ही रहा है, क्योंकि इस मामले को समझने और टैक्स की स्थिति सुस्पष्ट करने में केंद्र सरकार की ओर से बड़ा समय लग गया. खैर, देर आयद दुरुस्त आयद की तर्ज पर मोदी सरकार ने इसे अब लागू कर दिया है, जिससे न केवल इन कंपनियों को टैक्स देना पड़ेगा, बल्कि इन्हीं सेगमेंट में कार्यरत भारतीय कंपनियों को भी उभरने का मौका मिलेगा. जी हाँ, मोदी सरकार बाहरी कंपनियां पर इक्वलाइजेशन लेवी लागू कर टैक्स को न्यायसंगत बना रही है, जिससे अंततः बिजनेस का विस्तार ही होगा! वित्त मंत्रालय ने साल 2016 के अपने बजट में इसकी घोषणा की थी, जिसे व्यवहारिक बोलचाल में "गूगल टैक्स" कहा जा रहा है. यह एक तरह का इक्वलाइजेशन लेवी है जोकि 1 जून, 2016 से लागू हो गया है. आप इसके नाम पर मत जाइएगा (गूगल टैक्स), क्योंकि ये टैक्स न सिर्फ गूगल बल्कि इस नियम के तहत, देश के कारोबारियों द्वारा विदेशी ऑनलाइन सर्विस प्रोवाइडरों, मसलन  याहू, ट्विटर, फेसबुक आदि को दिए ऑनलाइन ऐड के लिए भुगतान की गई राशि पर 6% लेवी वसूला जाएगा, जिससे अब तक यह कंपनियां बचती रही हैं. 

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सरकार ने इसमें शर्त ये रखी है कि पूरे वित्त वर्ष में पेमेंट की राशि  एक लाख रुपये से अधिक हो. ये लेवी सिर्फ बिजनस टु बिजनस (B2B) ट्रांसेक्शंस पर ही लगेगा, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए. इसे हम इस तरह से भी समझ सकते हैं कि इंटरनेट में भारतीय व्यापारियों या कंपनियों के विज्ञापन या अन्य सेवाओं, जिसमें सेवा प्रदान करने वाली कोई भी कंपनी जो विदेशी हो, उस पर जो कर लगाया जा रहा है उसे 'इक्वालाइजेशन लेवी' कहा जा सकता है. इसे सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस (CBDT) ने नोटिफाई किया है. इस सम्बन्ध में, सरकार ने 8 सदस्यों की एक कमिटी बनायी थी जिसमें सरकार तथा औद्योगिक जगत के प्रतिनिधि शामिल थे. उन्होंने ही सुझाव दिया कि इस कर को एक लाख के ऊपर के ट्रांजेक्सन पर लगाया जाये जिससे उपभोक्ताओं के ऊपर कर का दबाव न पड़े! जाहिर है, यह बेहद सटीक, साहसिक और जरूरी निर्णय था, जिसे अगर अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह की सरकार ले लेती तो देश के खजाने में ज्याद पैसा आता. हालाँकि, पिछली यूपीए सरकार की कौन कहे, क्योंकि उनके आंकलनों के अनुसार तो 2जी जैसे बड़े घोटाले में 'जीरो लॉस' हुआ था. हालाँकि, इस बार सरकार सचेत दिख रही है और इस 'इक्वलाइजेशन  लेवी' के दायरे में वो सारी ग्लोबल इंटरनेट कम्पनियाँ आ गयी हैं, जो टैक्स देने से बचती रही हैं. इससे गूगल, ट्विटर, फेसबुक जैसी बड़ी कंपनियां जिनकी भारत में "परमानेंट इस्टैब्लिशमेंट" नहीं है, लेकिन वो यहाँ के मार्केट में तगड़ी कमाई कर रही हैं, ऐसे में उनके होने वाली इनकम का जायज़ लाभ भारत सरकार को भी मिलना ही चाहिए था, जो  अब मिलेगा! जाहिर है, ऐसी कंपनियां सरकार के इस फैसले से खुश तो नहीं ही होंगी, किन्तु उनकी यह नाखुशी पूरी तरह नाजायज़ है. चूंकि, सरकार ऐसी कंपनियों पर दो बार टैक्स तो लगा नहीं सकती, इसलिए इक्वालाइजेशन लेवी के द्वारा इन्हे दायरे में लाने की कोशिश की गयी है. इस कमिटी ने ऑनलाइन ऐड्स के अलावा दूसरी इंटरनेट सर्विसेज पर भी इक्वलाइजेशन लेवी लगाने का सुझाव दिया था, जिसमें ऑनलाइन कॉन्टेंट (किसी वेबसाइट की डिजाइनिंग, क्रिएटिंग या होस्टिंग) गानों, फिल्मों, गेम्स, किताबें आदि का ऑनलाइन इस्तेमाल या उन्हें डाउनलोड करने एवं ऑनलाइन सर्च, ऑनलाइन मैप्स या ग्लोबल पॉजिशनिंग सिस्ट्मस ( GPS) ऐप्लिकेशंस भी शामिल हैं. 

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जाहिर है, यह एक बड़ा क्षेत्र है और चूँकि पिछले दशकों में इन इंटरनेट सर्विस सेक्टर्स ने अपना दायरा बेहद बढ़ा लिया है, इसलिए टैक्स के नियमों में वर्तमान हालात के अनुसार सोचना जरूरी हो गया था. हालाँकि अमेरिका ने इस टैक्स का कड़ा विरोध किया था, क्योंकि वह क्यों चाहेगा कि उसके यहाँ की कंपनियों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़े और उनकी कमाई पर असर पड़े! बावजूद इसके भारत ने 'बेस इरॉजन ऐंड प्रॉफिट शिफ्टिंग' ऐक्शन प्लान लागू किया और इस तरह वो दुनिया का पहला देश बन गया है जो इक्वलाइजेशन लेवी लागू कर इस ऑप्शन का इस्तेमाल करने जा रहा है! अमेरिका और अमेरिकी कंपनियां इस बात से भी डरी होंगी कि कहीं दुसरे देश भी भारत की इस राह का अनुशरण न कर लें, क्योंकि भारत के इस कदम ने अमेरिकी कंपनियों की प्रतिस्पर्धा बढ़ा दी है, जो भविष्य में और भी स्पष्ट होगी. हालाँकि, भारत सरकार इस मामले में बेहद न्यायसंगत है और इस लेवी से बचने का तरीका भी दे रही है, और वो ये है कि विदेशी सर्विस प्रोवाइडरों का भारत में स्थायी बिजनेस ऑफिस हो और बिल भारत वाले ऑफिस से ही बने या फिर वे भारत में अपने कारोबारी सहयोगियों के जरिए मामले की डील करें! जाहिर है, कंपनियों को व्यापार करने की तो पूरी छूट है, लेकिन चालाकी से टैक्स चोरी की इजाजत अब से नहीं होगी! सरकार के इस प्रावधान का भी बड़े स्तर पर स्वागत होना चाहिए, जिससे इक्वलाइजेशन लेवी से बचा जा सकता है, अगर बाहरी कंपनियां भारत में अपना आधार बनाएं, यहाँ रोजगार दें और यहाँ के सामान्य टैक्स नियमों के दायरे में आएं तब! हालाँकि, कुछ विशेषज्ञों ने इस लेवी को लेकर आशंका जताई है कि विदेशी कंपनियां अपना बिजनस डाटा संभवत: शेयर न करें और जिससे इन पर दबाव न आये, किन्तु यह कदम रेपुटेड कंपनियां नहीं अपनाना चाहेंगी, क्योंकि यह तो सीधा क्राइम के दायरे में आ सकता है! भविष्य में 6% का लेवी और बढ़ेगा ही, क्योंकि इस टैक्स की दर कम है अपेक्षाकृत उन करों से जो भारतीय कारोबारियों की इनकम पर लगाया जाता है, इस बात की ओर 'इक्वलाइजेशन लेवी' के आलोचकों का ध्यान अवश्य ही दिलाना चाहिए. 
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इसी कड़ी में, इंटरनेट और मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) की वह रिपोर्ट लगभग निरर्थक ही है, जिसमें कहा गया है कि ऑनलाइन ऐडवर्टाइजेमेंट से होने वाली आय पर विदेशी कंपनियों को यदि टैक्स देना पड़ेगा तो इससे भारतीय तकनीकी स्टार्ट-अप्स के 'बिजनस करने की लागत में काफी ज्यादा इजाफा' हो जाएगा. इस संस्था ने अपनी इस रिपोर्ट में आगे कहा कि इस लेवी से छोटी कंपनियों की मुसीबतें बढ़ जाएँगी क्योंकि बड़ी कंपनियां विज्ञापन का रेट बढ़ा कर टैक्स का पैसा इन्ही कंपनियों से वसूलेंगी और इस तरह ऑनलाइन एड देना और महंगा हो जायेगा. हालाँकि इंटरनेट और मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया का यह तर्क इसलिए फिजूल है क्योंकि एक तो इसकी सीमा 1 लाख से ऊपर की है और छोटी स्टार्टअप कंपनियां कम ही हैं जो 1 लाख गूगल एडवर्ड पर लगा दें. चूंकि एडवर्ड का मॉडल सीधे 'लीड जेनेरेशन' पर है, इसलिए नए व्यवसायियों को नुक्सान नहीं होने वाला! गूगल, फेसबुक और बाहरी कंपनियां भी इस टैक्स का सीधा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पाएंगी, क्योंकि इससे उनकी प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ सकता है और दूसरी भारतीय कंपनियां मैदान में आएँगी. जाहिर है, विदेशी कंपनियों को अपने मुनाफे में कटौती करना ही पड़ेगा और उसी से टैक्स का कुछ हिस्सा सरकार को जायेगा! इस कड़ी में भारत सरकार का निर्णय बेहद सही है क्योंकि भारत का उभरता हुआ बाजार बहुत सारी विदेशी कंपनियों को लुभा रहा है, जो यहाँ अपना व्यापार फैलाती हैं और बहुत सारा मुनाफा कमाती हैं. इन कंपनियों से भारतीय गवर्नमेंट को कोई विशेष लाभ नहीं मिलता. आंकड़ों के लिहाज से देखें तो, साल 2014-15 में गूगल ने भारत से 4,108 करोड़ कमाया था और फेसबुक ने 123.5 करोड़ की आमदनी की थी, जो लगातार बढ़ती ही जा रही है. इस तरह भारत में स्थाई ठिकाना न होने से ये कंपनियां टैक्स से बच जाती हैं. इस तरह या तो ये कंपनियां इक्वलाइजेशन लेवी के अंतर्गत भारत से होने वाली कमाई का 6 प्रतिशत टैक्स दें या अपना स्थायी ठिकाना बना कर अपनी होने वाली आय पर इनकम टैक्स दें! मतलब सबके लिए अच्छे दिन और कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार पर लगाम भी! सरकार को इसलिए भी बधाई मिलनी चाहिए, क्योंकि उसने अमेरिका और बड़े कॉर्पोरेट हाउसेज के दबाव के बावजूद इस तरह का साहसिक निर्णय लिया है, जो न केवल जायज़ है, बल्कि व्यापारिक दृष्टि से भी न्यायसंगत है और घरेलु कंपनियों को प्रोत्साहन देने वाला है.
- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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