झूठ और पक्षपात का पुलिंदा है 'यूएससीआईआरएफ़' की धार्मिक रिपोर्ट! Religious freedom in India, USCIRF report, Hindi Article, Mithilesh

अगर आपको वैश्विक राजनीति के दांव पेंच की समझ विकसित करनी हो तो भारत के सम्बन्ध में यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (USCIRF) की जबरदस्ती तैयार की गयी रिपोर्ट और उसका मंतव्य समझने का यत्न अवश्य ही करना चाहिए. भारत के सम्बन्ध में आज वैश्विक बिरादरी दो तरह से सोच रही है. तमाम अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के एक तरफ तो यह रूख है कि वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के डांवाडोल होने की स्थिति में भारत एक उम्मीद के किरण की तरह है. विश्व बैंक समेत तमाम दुसरे संस्थान रोज भारत की तारीफ़ में कसीदे गढ़ रहे हैं, वहीं 'धार्मिक असहिष्णुता' को आधार बनाकर भारत पर लांछन लगाने का दुष्प्रयास भी 'विशेष हितों' को साधने के लिए जारी रखे गए हैं. हमें यह बात मानने में ज़रा भी हिचक नहीं होनी चाहिए कि अमेरिका की भारत के सम्बन्ध में नीतियां कुछ इस तरह की हैं कि भारत उसके चंगुल में आकर 'अमेरिकी हितों' को सर्वोपरि स्थान देने पर विवश हो जाए और इसके लिए वह प्रत्येक रास्ते का चुनाव करता है और भारत में 'धार्मिक आज़ादी' पर प्रश्नचिन्ह उठाना भी उसके इसी कदम में शामिल है. अमेरिका में आजकल राष्ट्रपति चुनाव से सम्बंधित सरगर्मियां ज़ोरों पर हैं और अगर यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम जैसे संस्थानों में ज़रा भी निष्पक्षता बची होती तो वह यह देख और समझ सकता कि अमेरिकी जनता और वहां के संस्थान किस कदर 'मुस्लिम विरोधी' विचारों से बरगलाये जा रहे हैं. क्या 'डोनाल्ड ट्रम्प' जैसे व्यक्तियों की धार्मिक सोच के बारे में इस संस्था को कुछ खबर है, जो रिपब्लिकन्स की ओर से राष्ट्रपति के उम्मीदवार बनने जा रहे हैं? क्या वाकई मुसलमानों और सिक्ख भाइयों की धार्मिक पहचान पर अमेरिका सहिष्णु है? भारत जैसे देश के बारे में प्रश्न उठाने वाली किसी भी अमेरिकी एजेंसी को यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि खुद राष्ट्रपति बराक ओबामा को अपनी धार्मिक निष्ठा को लेकर कठघरे में खड़ा किया गया है. 

यही नहीं, अमेरिकी स्कूलों तक में मुसलमानों को लेकर किस हद तक नफरत घुली हुई है, यह एक पिछले मामले से पूरी दुनिया के सामने खुलकर आ गया था, जिसमें अमेरिका के टेक्सास में घड़ी बनाकर स्कूल लाने वाले एक 14 साल के मुस्लिम स्टूडेंट को अरेस्ट करने के बाद बवाल मच गया था. गौरतलब है कि डलास काउंटी के इरविंग शहर में अहमद मोहम्मद नाम का एक स्टूडेंट डिजिटल घड़ी बनाकर स्कूल ले गया था, लेकिन कुछ ही देर बाद उसे टेक्सास पुलिस ने अरेस्ट कर लिया और घड़ी के बारे में काफी पूछताछ की. स्कूल अथॉरिटी ने बच्चे को तीन दिन के लिए सस्पेंड भी कर दिया था. क्या वाकई इस दर्जे की असहिष्णुता है कहीं? बड़ी ही ईमानदारी के साथ यह बात कही जा रही है कि मुसलमान बड़ी तेजी के साथ अमेरिका में सबसे ज्यादा नफरत किए जाने वाले अल्पसंख्यकों के रूप में उभर रहे हैं. अफ्रीकी अमेरिकियों और मेक्सिकन मूल के लोगों का स्थान अमेरिका में 'दोयम दर्जे' का हो रहा है और अगर ऐसे में कोई भारत को लेकर छोटी बातें करे तो उसकी जितनी भी आलोचना की जाय, वह कम ही होगी. इस अमेरिकी संस्था को भारत के सन्दर्भ में अपनी राय देने की इतनी जल्दी थी कि भारत में नयी सरकार के गठन के साथ ही यह अति सक्रियता के साथ कार्य करने में लग गयी. पहले इस संस्था ने भारतीय जनता द्वारा भारी बहुमत से चुने गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुलकर आलोचना की, फिर इसने भारत में धार्मिक आज़ादी पर अध्ययन करने के लिए वीजा का आवेदन किया. जाहिर तौर पर कोई भी सम्प्रभु देश किसी दुसरे देश की सरकार द्वारा समर्थित इस प्रकार की संस्थाओं को अपने आतंरिक मामलों में दखल की इजाजत नहीं दे सकता है, खासकर तब जब संस्था निष्पक्ष आंकलन की बजाय दबाव बनने की रणनीति पर कार्य करना चाहती हो! थोड़ा ध्यान से देखा जाए तो भारत में सक्रीय तमाम एनजीओ फर्म्स पर शिकंजा कैसे जाने का इस तरह की रिपोर्ट्स से गहरा सम्बन्ध नज़र आता है. 

विदेशी फंड्स से संचालित विभिन संगठनों का देश विरोधी कार्यों में संलिप्त होने की ख़ुफ़िया जानकारी की बातें सामने आने पर मोदी सरकार द्वारा सख्ती बरता जाना कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को नाराज सा कर गया और फिर शुरू हुआ भारत में 'असहिष्णुता का ड्रामा', जिसके तहत सामान्य आपराधिक घटनाओं को भी खूब उछाला गया. अगर यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम की रिपोर्ट्स पर गौर भी करते हैं तो साफ़ जाहिर हो जाता है कि आंकड़ों के खेल में उलझाकर भारत सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की गयी है तो तमाम नेताओं मंत्रियों, यहाँ तक कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का सीधा नाम लेकर अपनी सीमा का उल्लंघन भी किया गया है. इस रिपोर्ट को सरकार ने सीधा खारिज करके ठीक ही किया है. 
अमेरिकी माइनॉरिटीज वाचडॉग की इस रिपोर्ट को भारत सरकार की ओर से खारिज करते हुए फॉरेन मिनिस्ट्री के स्पोक्सपर्सन विकास स्वरूप ने कहा कि एक बार फिर यूएस कमीशन भारत, उसके कॉन्स्टिट्यूशन और सोसाइटी को समझने में फेल साबित हुआ है. जाहिर तौर पर, भारत का संविधान सभी सिटीजन को फंडामेंटल राइट्स और रिलिजियस फ्रीडम की गारंटी देता है तो यहां तमाम धर्मों के लोग भी डेमोक्रेटिक प्रिंसिपल्स का सम्मान करते हैं और यह आज से नहीं है बल्कि सदियों और शताब्दियों से है. यह रिपोर्ट इसलिए भी हास्यास्पद हो जाती है, क्योंकि इसने अपनी रिपोर्ट में कुछ भी ठोस नहीं दिया है, बल्कि साक्षी महाराज जैसे कुछेक नामों का ज़िक्र करके इसने अपनी रिपोर्ट को और भी हल्का बना दिया है. आखिर साक्षी महाराज, साध्वी प्राची और दुसरे कुछ छोटे मोटे संगठनों का कितना प्रभाव है, यह बात किसी से छिपी तो नहीं है! भारतीय जनमानस के 1% वर्ग पर भी तो अतिवादियों का प्रभाव नहीं है और यह बात बार-बार साबित भी हुई है. हाँ, विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर जरूर ही कुछ लोगों की भौंहे टेढ़ी हुई रहती हैं, किन्तु यह संगठन अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए कहीं ज्यादा समर्पित है, जबकि राष्ट्र के प्रति इसकी जिम्मेदारी को लेकर कहीं भी 'किन्तु-परन्तु' नहीं किया जा सकता है. अब कोई राजनीतिक विचारधारा को लेकर 'हीन भावना' से ग्रसित हो जाए तो उस कुंठा का इलाज भी क्या है? वैसे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही माध्यमों से अतिवादियों के खिलाफ नाराजगी जता चुके हैं और साक्षी महाराज जैसे कई लोगों की जुबान बंद भी हुई है. 2016 की पहली तिमाही में तो कोई धार्मिक घटना सुर्खियां बनी हों, ऐसा ध्यान नहीं आता, किन्तु जबरदस्ती की रिपोर्ट बनाकर यह कहा जाना कि भारत में, अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक हिंदूवादी गुटों के हाथों धमकी, उत्पीड़न और हिंसा की बढ़ती घटनाओं का सामना करना पड़ा है, अपने आप में हास्यास्पद ही है. यह कहना भी अजीब ही है कि सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेता इन गुटों का ख़ामोशी से समर्थन करते हैं! अरे भई! ख़ामोशी से कौन क्या करता है, इसका किसको पता है और बात अगर राजनीतिक दलों की करें तो यहाँ कौन दूध का धुला है? 

जहाँ तक इस रिपोर्ट की बात में पुलिस के पक्षपातपूर्ण रवैए और अदालत से जल्द इंसाफ़ नहीं मिलने के कारण को गिनाया गया है तो यह सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के साथ ही है, ऐसा कहना परले दर्जे की बेवकूफी ही है, क्योंकि पुलिस में भ्रष्टाचार के कारण संपन्न वर्ग अपना दबदबा बनाने में सफल रहता है, जबकि अदालतों में जजों की कमी के कारण अभी भारत के मुख्य न्यायाधीश सार्वजनिक रूप से रो पड़े थे. कुछ समस्याएं भारत में जरूर हैं, किन्तु दुर्भाग्य से यह सबके ही साथ है. हालाँकि, नयी सरकार भ्रष्टाचार से निपटने के लिए पुरजोर कोशिश कर रही है और तमाम संस्थानों की रिपोर्ट में इसमें कमी की बात कही भी गयी है. इस रिपोर्ट में गोहत्या पर पाबंदी के कारण मुसलमानों  को आर्थिक नुक़सान की बात कही गयी है, जो साफ़ जाहिर करती है कि बहुसंख्यक हिन्दुओं की भावनाओं का ज़रा भी ध्यान नहीं रखा गया है. साफ़ है कि इस तरफ की रद्दी-रिपोर्ट चर्चा के लायक भी नहीं है. ईसाइयों पर हिंसा, धर्म परिवर्तन क़ानून, घर वापसी कार्यक्रम जैसे कुछ और मुद्दे इस रिपोर्ट में उठाये गए हैं जिनकी 2016 में कहीं कोई चर्चा नहीं है, जबकि सरकार की ओर से किसी तरह की हिंसा का समर्थन नहीं किया गया है. यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (USCIRF) की असल छटपटाहट इस बात से साफ़ हो जाती है कि अप्रैल 2015 में भारत के गृह मंत्रालय ने लगभग 9000 ग़ैर-सरकारी संस्थाओं का लाइसेंस रद्द कर दिया था, जिन्हें स्पष्ट तौर पर फ़ेरा क़ानून के उल्लंघन का दोषी पाया गया था. जाहिर है इतनी बड़ी संख्या में यह संस्थाएं कोई देशहित का कार्य तो कर नहीं रही थीं. ऐसे में बीमारी का लक्षण साफ़ तौर पर दिख जाता है. यह भी गौर करने वाली बात है कि यूएससीआईआरएफ़ ने अपनी रिपोर्ट में अमरीकी सरकार को कुछ सुझाव भी दिए हैं, जिनमें भारत के साथ द्विपक्षीय वार्ता में धार्मिक आज़ादी का मुद्दा उठाने की बात शामिल है. अब जब कुल मिलाकर खुद ही जज, खुद ही कोतवाल बना जाता है तो बहुत कुछ नहीं किया जा सकता है. ऐसी स्थिति में ऐसी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर खुद ही बड़ा सवाल उठ जाता है, लेकिन कुछ लोग और कुछ संस्थाएं भी कव्वे की तरह 'कांव कांव' करने को ही अपनी बहादुरी समझ बैठते हैं. 
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