लाल किले से मैं देश का 'प्रधानसेवक' नरेंद्र मोदी बोल रहा हूँ ... Prime Minister Speech on Independence Day, Should be, Hindi Article, Fictitious, Written by Mithilesh, Women Safety, Accountability



मेरे प्यारे देशवासियों,
आज देश और दुनिया में फैले हुए सभी हिंदुस्तानी आज़ादी का पर्व मना रहे हैं. आज़ादी के पावन पर्व पर प्यारे देशवासियों को देश के प्रधानसेवक की अनेक-अनेक शुभकामनाएं! ... ...

हमें आज़ादी कैसे हासिल हुई और कैसे हमारे लाखों स्वतंत्रता सेनानियों (Freedom Fighters) ने अपने जान की बाजी लगाई, इसे आप सभी जानते हैं. हर साल, इस लाल किले से सभी प्रधानमंत्री खुद को, देशवासियों को इस बात की याद दिलाते ही रहे हैं तो साल दर साल हमने क्या पाया, क्या खोया और क्या चुनौतियां हमारे सामने मौजूद हैं इसकी चर्चा भी गंभीरता से करते रहे हैं. पिछले स्वतंत्रता दिवस 2015 पर मैंने भी अनेक विषयों को उठाया, जिसमें स्वच्छता कार्यक्रम का ज़िक्र प्रमुखता से किया गया था. 

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आप सबको यह भी याद होगा कि पिछली बार अपने भाषण की शुरुआत में मैंने कहा था कि "राष्ट्रीय पर्व, राष्ट्रीय चरित्र को निखारने का एक अवसर होता है." हालाँकि, यह पंक्ति बोलने के बाद मैंने इस पर ज़ोर नहीं दिया था, और अपनी उस गलती को इस बार अपने भाषण में (Prime Minister Speech on Independence Day, Hindi Article) दुहराना नहीं चाहता हूँ! निश्चित तौर पर इस विशाल देश में कई जरूरी मुद्दे हैं और उन सभी मुद्दों पर सोशल मीडिया के जरिये, मोदी-एप्प के जरिये, सभा व साक्षात्कारों के जरिये, मन की बात के जरिये आपसे प्रतिक्रियाजनक बातें करता ही रहता हूँ. इस बार 'राष्ट्रीय चरित्र' के अतिरिक्त और कोई मुद्दा लाल किले की इस प्राचीर से कहने योग्य प्रतीत नहीं होता है. आपसे कोई लाग-लपेट की बातें नहीं करूंगा आज, न ही कोई बड़ी भूमिका बाँधने की जरूरत महसूस करता हूँ, बल्कि आप से सीधे-सीधे यह जानना चाहता हूँ कि आज हमारा 'राष्ट्रीय चरित्र' कहाँ है? राष्ट्रीय चरित्र पर बात करने से पहले मैं आपसे 'चरित्र' शब्द की परिभाषा मन में दुहराने की गुजारिश करता हूँ. इसी सन्दर्भ में पूरे भारतवर्ष की बात करने से पहले मैं आपसे आपकी बात करता हूँ, आपके परिवार की बात करता हूँ, आपके गाँव-कस्बे की बात करता हूँ, आपके नगर की बात करता हूँ, आप जिस मेट्रो सिटी में रहते हैं उसकी बात करता हूँ और पूछता हूँ कि इनमें से कौन 'चरित्र' की परिभाषा (Definition of Character) पर खरा उतर सकने लायक है? आखिर, इन्हीं सब से मिलकर तो भारत एक राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित है और अगर 'चरित्र' इन सब में नहीं है तो फिर 'राष्ट्रीय चरित्र' की कल्पना एक 'दिखावा' ही तो है. मैं आज यहाँ किसी राजनीति, नीति, विकास, इन्वेस्टमेंट की बात करने नहीं जा रहा, किसी का नाम भी नहीं लूँगा, न किसी की तारीफ़ करूंगा और न ही किसी की बुराई! इन सबके बावजूद आपसे सिर्फ चरित्र और 'राष्ट्रीय चरित्र' पर ही बात करूंगा और वह बात कोई छुपी नहीं है, बल्कि वह तो इतनी आम हो चली है कि आपको, हमको और हमारे राष्ट्र को उसकी आदत सी पड़ती जा रही है, बेहद 'गलत आदत'! जी हाँ, इस राष्ट्रीय पर्व पर ज़रा सोचिये कि 'रेप, बलात्कार, लड़कियों-महिलाओं से छेड़छाड़' करता हमारा समाज, हमारा राष्ट्र किस दिशा में जा रहा है? न... न... मैं कोई लेक्चरबाजी नहीं करूंगा और न ही कोई बहुत आदर्शवादी बात करूंगा, बल्कि आज इन कुकृत्यों की जवाबदेही तय करने की कोशिश करूंगा. हम सबने अपने बचपन से ही सुना है कि 'कैरेक्टर इज लॉस, एवरीथिंग लॉस' और यह कैरेक्टर 'महिलाओं के सम्मान' से जुड़ा विषय ही तो है. या फिर कुछ और है यह ?? ... 

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मित्रों, याद रखिये 'चरित्र' का कल भी यही अर्थ था और आज सहित आगे भी यही अर्थ रहने वाला है कि कोई व्यक्ति, कोई समाज या हमारा राष्ट्र 'महिला-शक्ति' से किस प्रकार व्यवहार करता है, उसके साथ अगर कोई अपराध हो जाए तो प्रशासन उस पर कैसा रवैया अख्तियार करता है और अगर प्रशासन भी नाकाम हो रहा हो तो समाज किस प्रकार आंदोलित होकर जवाबदेही तय करने की कोशिश करता है. अफ़सोस! महिलाओं के मामले में (Women related issues in Hindi) हम विभिन्न स्तरों पर नाकाम होते जा रहे हैं, बार-बार और लगातार. हम में से कई, व्यक्ति के तौर पर महिलाओं का सम्मान तो छोड़िये, उसके साथ दुर्व्यवहार और कुकृत्य करने के लिए जिम्मेदार हैं, तो सरकारें और प्रशासन दुर्व्यवहार से पीड़ित महिलाओं के साथ सहयोग करने की बजाय उसे टालने और डराने/ धमकाने तक का जिम्मेदार बन गया है, और इन सबसे ऊपर जो जनता है, जो हमारा समाज है, वह चुप्पी ओढ़े बैठ जाता है, मानो यह मसला उसके घर का तो है ही नहीं! पर मित्रों, 'महिला-सुरक्षा' क्या वाकई हमारे घर से जुड़ा मसला नहीं है... ??

मित्रों, अभी हाल ही में एक हृदय-विदारक घटना उत्तर प्रदेश के नेशनल हाईवे नम्बर 91 पर घटी जिसने मुझे कई दिनों तक विचलित रखा. मैं सोचने को विवश हो गया कि क्या हमारे समाज में ऐसे लोग भी हैं जो 'माँ और बेटी' के साथ दुष्कृत्य कर सकते हैं? आखिर ऐसे लोग कहाँ से आ रहे हैं और उन्हें हमारा समाज बर्दाश्त कैसे कर पा रहा है? यह वाकया मैंने सिर्फ उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस की आलोचना करने भर के लिए ही नहीं उठाया, बल्कि उनकी आलोचना और निंदा (Prime Minister Speech on Independence Day, Hindi Article) करने के साथ-साथ यह भी बताने के लिए उठाया कि ऐसी स्थिति कमोबेश पूरे भारत में ही व्याप्त हो गयी है, जिसमें मेरी पार्टी द्वारा शासित प्रदेश भी हैं. अगर आप सबको यकीन न हो तो आप इन्टरनेट सर्च में आंकडें देख लें! ऐसे में, मैं 'पीएमओ' को निर्देश देता हूँ कि महिला सुरक्षा पर वह एक ऐसा तंत्र तैयार करने की शुरुआत करे, जिससे जवाबदेही तय हो. उस तंत्र में चाहे सम्बंधित जिला-प्रशासन / राज्य सरकार से कम्युनिकेशन करना हो, न्याय-प्रणाली तक पीड़ित को पहुंचाना हो, विभिन्न मामलों में 'फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट' का गठन करने कराने की सम्भावना तलाशनी हो, वह सभी जरूरी चीजें शामिल की जाएँ. 

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आज स्वतंत्रता दिवस पर मैं देश भर की माताओं / बहनों से कहना चाहता हूँ कि प्रदेश सरकारें, प्रशासन, पुलिस आपकी बात जितनी भी सुने, न सुने, किन्तु केंद्र सरकार का यह तंत्र आपको न्याय दिलाने की अंतिम सीढ़ी तक आपके साथ खड़ा रहेगा. इसके लिए हर जरूरी इनिशिएटिव लिए जायेंगे, तो वेबसाइट, सोशल मीडिया, एप्प, मिस कॉल और दूसरी टेक्नोलॉजी का सहयोग (Technologies for Women Safety, Hindi articles) लिया जाएगा, जिसकी आवश्यकता अपराध से बचाव एवं न्याय दिलाने में पड़ेगी. मैं अपने सहयोगी एवं कानून-मंत्री रविशंकर प्रसाद से भी निवेदन करता हूँ कि महिला-सुरक्षा पर जितने भी कानून हैं, उसकी कमियों और सुधारों पर एक विस्तृत रिपोर्ट जल्द से जल्द तैयार कराएं और अगर इस सम्बन्ध में किसी नए कानून की जरूरत है तो उसकी सम्भावना भी तेजी से तलाशी जाए! इस सम्बन्ध में 'पीएमओ' और 'कानून-मंत्रालय' को हालात में बदलाव के लिए ठीक 1 साल का समय देता हूँ और इसी लाल किले की प्राचीर से अगले 15 अगस्त को यही सवाल उठाऊंगा! मैं राष्ट्रीय महिला आयोग एवं मानवाधिकार देखने वाली संस्थाओं की जवाबदेही तय किये जाने की भी वकालत करता हूँ, जिससे महिलाओं के प्रति हुए अपराध के साथ राजनीति होने की बजाय उन्हें यथोचित न्याय मिल सके. 

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मित्रों, यह तो रही सरकार और प्रशासन की बात, किन्तु यह कहानी क्या यहीं ख़त्म हो जाती है? क्या हमारा 'चरित्र' और 'राष्ट्रीय चरित्र' इतने भर से सही रास्ते पर आ जायेगा. नहीं, कदापि नहीं!
सरकार और राजनीति जो कर रही है सो करेगी और उसकी जवाबदेही भी तय होगी, किन्तु उससे कहीं आगे बढ़कर जिम्मेदारी हमारे समाज की बनती है. आपके गाँव में, आपके समाज में, आपके शहर में अगर महिला के खिलाफ कोई अपराध होता है, तो आपको भी तब तक सक्रिय रहना पड़ेगा जब तक अपराधी पकड़ा नहीं जाता और पीड़ित को न्याय नहीं मिल जाता. मित्रों, किसी विचारक की वह बात याद रखिये कि 'अगर आपके पड़ोसी पर अत्याचार हो रहा हो और आपको नींद आ जाती है तो अगला नंबर आपका है.' इसी विषय पर एक छोटी कहानी, 'अगला नंबर आपका है...! (Short story on rape, Hindi Stories)' किसी ने मुझे भेजी, जो आपको भी जरूर पढ़नी चाहिए! इस कहानी का भी मोरल यही था कि समाज को खड़ा होना ही पड़ेगा, तभी स्थिति में बदलाव संभव है. आखिर, जो घटना कानपूर-बुलंदशहर के राष्ट्रीय राजमार्ग 91 पर एक परिवार के साथ हुई, वह किसी के साथ भी तो हो सकती है! ऐसी स्थिति में जो बात सर्वाधिक दुःखद है, वह यह कि समाज ऐसी घटनाओं पर मौन धारण कर लेता है. मित्रों, आवाज उठाओ और तब तक उठाओ जब तक पीड़िता को न्याय नहीं मिल जाता (Prime Minister Speech on Independence Day, Hindi Article, Women Safety, Justice) और अपराधियों को दण्डित नहीं किया जाता. आपके पास तमाम ऑनलाइन सुविधाएं हैं, सोशल मीडिया है, व्हाट्सप है. एक-दूसरे से प्रश्न पूछो कि नेशनल हाईवे 91 वाली पीड़िता को न्याय मिला या नहीं? पुलिस, जिला-प्रशासन, राज्य सरकार यहाँ तक कि मुझसे जवाब मांगो और तब तक मांगों जब तक जवाब मिल न जाए! यही तो 'राष्ट्रीय-चरित्र' है मित्रों. 16 दिसंबर 2012 को 'निर्भया रेप कांड' हुआ और हमारे असली 'राष्ट्रीय-चरित्र' ने सरकार और प्रशासन को मजबूर किया, जिससे उसके अपराधी तो सींखचों के पीछे हैं ही, इसके साथ महिला-सुरक्षा पर 'निर्भया-फण्ड' भी बना. पर उसके बाद हमारा समाज सो गया, क्यों भाई? आप सो गए तो 'महिला-सुरक्षा' पर की गयी सारी कवायद भी सो गयी न! मुझे किसी ने बताया कि इस फण्ड का मात्र 1% ही खर्च हो सका है और जो सुरक्षा उपाय हो सकते थे, वह सब अधर में ही रह गए! यही सवाल मैं फिर से जनता-जनार्दन से दुहराता हूँ कि प्रशासन से जवाबदेही कौन लेगा? प्यारे देशवासियों, हमें अपने राष्ट्रीय-चरित्र में 'जवाबदेही' की आदत विकसित करनी ही होगी और कोई दूसरा चारा नहीं है.    

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चूंकि, बात आज 'राष्ट्रीय-चरित्र' की हो रही है तो समग्रता की खातिर, प्रशासन और समाज के बाद मैं अपने देश की माताओं, बहनों से भी चंद शब्द कहना चाहता हूँ कि 'महिला-सुरक्षा' के लिए यदि कोई सबसे ज्यादा और महत्वपूर्ण कार्य कर सकता है तो वह आप ही हैं. इन बातों को मैं कुछ स्टेप्स में कहता हूँ. हालाँकि, आत्मनिर्भरता में हमारे देश की महिलाएं कदम बढ़ा चुकी हैं, किन्तु अभी काफी लंबा सफर किया जाना बाकी है. यह एक सार्वत्रिक सत्य है कि अगर आप कमजोर हैं तो आपको दबाने का प्रयास किया जा सकता है और आज के समय में 'आर्थिक आत्मनिर्भरता' एक बड़ी मजबूती है. जो महिलाएं नौकरी कर सकती हैं वह कर रही हैं, जो महिलाएं अपना घर-परिवार संभाल रही हैं उन्हें भी कुछ न कुछ करने की शुरुआत (Women Entrepreneurship, Hindi Article) करनी ही चाहिए. इन्टरनेट ने इसके लिए हज़ारों अवसर पैदा किये हैं कि आप घर बैठकर गंभीरता से एक ब्लॉग चला सकती हैं, शिक्षा दे सकती हैं, ऑनलाइन छोटे-छोटे जॉब ढूंढ सकती हैं. मैं सम्बंधित मंत्रालय को निर्देशित करता हूँ कि घर बैठे महिलाएं आसानी से रोजगार कैसे कर सकती हैं, इस पर कार्य शुरू करें और देश के आर्थिक विकास में जिस आधी आबादी का हम पूरी तरह सदुपयोग नहीं कर पाए हैं, उसका सदुपयोग बड़े पैमाने पर किस प्रकार कर सकते हैं, इसकी संभावनाएं तेजी से तलाशी जाएँ! माताओं, बहनों आज मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि जब तक आप सब पूरी तरह से आर्थिक विकास के लिए ज़ोर नहीं लगाएंगी, तब तक हमारा देश अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देशों से पीछे ही रहेगा. इसके लिए मैं देश के तमाम स्वयंसेवी संस्थाओं का भी आह्वान करता हूँ, जो जागरूकता फैलाने का कार्य करें ताकि बुर्के से बाहर निकलकर एक घरेलु महिला अपना सब कार्य करने के साथ-साथ कम से कम 6 घंटे घर बैठे-बैठे कार्य करने के प्रति प्रेरित हो. निश्चित तौर पर इससे उसकी पारिवारिक जिम्मेदारियां तो निभेंगी ही, साथ ही साथ आर्थिक विकास का आधार भी तैयार होगा. देश की माताओं, बहनों से यह निवेदन भी करना चाहूँगा कि हमारे देश में सदियों से 'मदर इंडिया' वाली परंपरा (Tradition of Mother India concept, against crime) भी रही है. अपने बच्चों, घर के सदस्यों पर कड़ी नज़र रखें एवं जितना भी आपका दायरा हो उसे सँभालने की कोशिश करें और अगर पानी सर से ऊपर जाए तो उसकी कम्प्लेन प्रशासन को करने में संकोच न करें! साफ़ तौर पर समाज में अगर महिलाएं नज़र रखना शुरू कर दें हालात में परिवर्तन जरूर दिखाई देगा. इसके अतिरिक्त, यह बात मुझे कहने की जरूरत नहीं है कि महिलाओं को अपने ही दोस्तों, मित्रों और सहकर्मियों तक से सावधान और चौकन्ना रहने की जरूरत है, क्योंकि तमाम आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि महिलाओं के साथ विभिन्न दुष्कर्मों के मामलों में उसके जानकार ही शामिल रहे हैं. जाहिर तौर पर थोड़ी सावधानी से बचा जा सकता है.

प्यारे देशवासियों, सरकार, समाज, महिलाओं से बात करने के पश्चात मैं समाज के चर्चित व्यक्तित्वों, नेताओं, बुद्धिजीवियों से भी दो बात कहना चाहूँगा. कोई व्यक्ति बलात्कार पर बयान देता है कि 'लड़कों से गलती हो जाती है' तो कोई सेलिब्रिटी अनायास ही बयान देता है कि 'उसे फिल्मों की शूटिंग के समय रेप की फिलिंग होने लगती है.' समझना मुश्किल नहीं है कि ऐसे लोग हमारे 'राष्ट्रीय चरित्र' को दागदार ही करते हैं. ऐसे लोगों पर महिला आयोग जैसी संस्थाओं को सख्ती से पेश आना चाहिए तो स्वयंसेवी संस्थाओं को आगे बढ़कर इनकी पोल खोलनी चाहिए. इसी क्रम में, चरित्र और राष्ट्रीय-चरित्र (Prime Minister Speech on Independence Day, Hindi Article, National Character, Film and Television effect) पर कई विचारक टेलीविजन, इन्टरनेट और फिल्मों में अश्लीलता की बात भी करते हैं. संभव है कि इन सब चीजों से भी असर पड़ता हो और कुछ न कुछ तो पड़ता ही है, किन्तु ऐसी बातों पर हमें थोड़ा व्यवहारिक होकर सोचना होगा. एक तो ग्लोबलाइजेशन को हम रोक नहीं सकते हैं और न ही इन्टरनेट के प्रसार को! ऐसे ही फिल्मों और टेलीविजन पर सेंसर करने से आप में से ही कई बुद्धिजीवी गला फाड़-फाड़कर चिल्ला उठेंगे कि सरकार, देश को पीछे धकेल रही है. ईमानदारी से कहूँ तो अगर हम सरकार, समाज और अपने स्तर पर सजग हैं तो ये माध्यम स्वतः ही अनदेखे हो जायेंगे. हालाँकि, क्रिएटिविटी के नाम पर समाज में गलत सन्देश न जाए इसका प्रयास हर एक को करना चाहिए और अगर कोई स्वार्थवश गलत चीजें दिखाता भी है तो हमारा चरित्र, राष्ट्रीय चरित्र इतना मजबूत होना चाहिए कि वह खुद शर्मिंदा हो जाए! बाकी, इस सम्बन्ध में अगर समाज कहे तो सेंसर/ फिल्म-प्रमाणन बोर्ड को और उपयोगी बनाने की कवायद की जा सकती है.

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प्यारे देशवासियों, कहने को और भी काफी बातें हैं किन्तु 'चरित्र' और 'राष्ट्रीय चरित्र' की यह बातें जनरलाइज न हो जाएँ, इसलिए 'भारत माता की जय' बोलते हुए आप सबसे अनुरोध करता हूँ कि लाल किले पर उपस्थित सभी लोग एवं टेलीविजन के माध्यम से मुझे देख रहे सभी लोग खड़े होकर मेरी कही बातें दुहरायें और शपथ लें कि-

"आज 15 अगस्त 2016 को मैं यह शपथ लेता हूँ कि 'राष्ट्रीय चरित्र' के पुनर्निर्माण के प्रथम चरण में 'नारी-जाति' का हर प्रकार से सम्मान करूंगा (Respect for Women, forever). किसी को उसका अपमान नहीं करने दूंगा और अगर कोई उसका अपमान करता है तो एक नागरिक के तौर पर समाज के बंधुओं के साथ मिलकर कानून उसे सजा दे, इस बात के प्रति जागरूक रहूँगा. भारत की आज़ादी के लिए अपनी जान देने वाले वीरों की शपथ लेता हूँ कि अगर प्रशासन और राजनीति महिला-सम्मान के आड़े आती है तो एक बार फिर 'राष्ट्रीय-चरित्र' की ख़ातिर क्रांति करने को तत्पर रहूँगा!"

जय हिन्द!

लेखक: मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली. 
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(डिस्क्लेमर: इस भाषण/ लेख का भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से कोई सम्बन्ध नहीं है और यह पूरी तरह लेखक की सोच पर आधारित है. चूंकि, हमारे पीएम समय-समय पर सुझावों को आमंत्रित करते रहते हैं तो उनसे गुजारिश है कि अगर इसमें कोई मुद्दा सार्थक लगे तो वह लाल किले से जरूर कहें)

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.




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