100% ठीक कहा 'रघुराम राजन' ने! Raghuram rajan statement and Indian economy, hindi article, mithilesh

बॉलीवुड की मशहूर फिल्म उपकार का गाना है, 'कश्में, वादे, प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या'! यदि इसी गाने की कसौटी पर वर्तमान केंद्र सरकार को तौला जाय तो काफी सटीकता नज़र आएगी. केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमण रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन पर खूब लाल-पीली होती रहें, किन्तु उनके नाराज होने से क्या सच बदल जायेगा? बताते चलें कि केंद्रीय मंत्री ने रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘अंधों में काना राजा’ बताने संबंधी बयान की आलोचना की और कहा कि इसके लिए कुछ और 'अच्छे शब्दों' का इस्तेमाल किया जा सकता था. हद है यार, यह अर्थव्यवस्था 'गुड्डे-गुड़ियों' का खेल है क्या कि कुछ अच्छे शब्द बोलकर उन्हें बहला-फुसला दिया जाए. 'अंधों में काना राजा' बोलकर रघुराम राजन ने भारतीय अर्थव्यवस्था की लाज ही बचाई है और उनकी टिपण्णी न केवल सटीक है, बल्कि यथार्थ है. साहित्यिक दृष्टि से भी केंद्रीय मंत्री की नाराजगी नाज़ायज़ ही है. अंधों में काना राजा, लोकोक्ति का प्रयोग अगर सकारात्मक रूप में देखा जाय तो यह और 'सुधार' को प्रेरित करने वाला वक्तव्य है. क्या केंद्र सरकार यह कह रही है कि 'अब भारतीय अर्थव्यवस्था' पूर्ण रूप से सशक्त हो चुकी है? मैडम सीतारमण जी! वैश्विक एजेंसियों की चापलूसी पर न जाइये, वह चढ़ा-चढ़ाकर खाई में गिरा देने पर ही शोध करते हैं. 

इसके साथ आप रघुराम राजन जैसे काबिल व्यक्तियों को 'चापलूसी' करने के लिए विवश न कीजिये, क्योंकि उसके लिए भाजपा में कई नेता और कई दुसरे लोग हैं, जिनका वश चले तो वह भारत को आज ही 'विश्व गुरु' घोषित कर डालें. आज ही देश को 'भ्रष्टाचार से मुक्त', पाकिस्तान के आतंक और चीन के सीमोल्लंघन से मुक्त घोषित कर डालें ऐसे लोग, क्योंकि फिर वही बात दोहराऊंगा 'उपकार' फिल्म से कि 'कश्में, वादे, प्यार, वफ़ा सब बातें हैं, बातों का क्या.... !! यह बात ठीक है कि आज पुरे विश्व की नजर दिन-प्रतिदिन मजबूत होती भारतीय अर्थव्यवस्था पर है और इसमें नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने बेहतर प्रशासन का नमूना पेश करने की कोशिश की है. इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि आने वाले समय में विश्व के सामने भारत आर्थिक रूप से सभी देशों से आगे हो सकता है, किन्तु इसके लिए अभी 'दिल्ली दूर' है! और यह बात निर्मल सीतारमण जैसे मंत्रिमंडल सहयोगियों को ध्यान में रखना ही चाहिए. हालाँकि, भारत अपनी अर्थव्यवस्था में आये दिनों सुधार कर रहा है, जिसका परिणाम अच्छी विकास दर के रूप में दिख भी रही है! हालाँकि, इस विकास दर के साथ-साथ जमीनी हालात में भारी बदलाव नज़र आने के बीच साम्य स्थापित करना और भी आवश्यक है, क्योंकि आप किसी भी इंडस्ट्रियल एरिया में जाकर उद्योगों की हालत का अंदाजा लगाइए, आपको सिर्फ और सिर्फ 'मंदी' की बातें ही सुनने को मिलेंगी. हालाँकि, इसके पीछे दुसरे और भी कारण हो सकते हैं, किन्तु सवाल तो यही है कि जब तक लोगों को रोजगार नहीं मिले, उनका जीवन स्तर न सुधरे, तब तक विकास दर की अहमियत ही कितनी है? 

आज देश के बुंदेलखंड और लातूर जैसे क्षेत्रों में सूखे के कारण 'त्राहिमाम' मचा हुआ है और निर्मल मैडम, आप चाहती हैं कि रघुराम राजन 'सब सुखी हैं' का राग अलापें. जहाँ तक भारतीय रिजर्व बैंक के वर्तमान गवर्नर का सवाल है, तो रघुराम राजन का भारतीय अर्थव्यवस्था को ठीक हालात की ओर अग्रसर करने में बहुत बड़ा हाथ है और इस बात को हर कोई स्वीकार करता है. रघुराम राजन आरबीआई के गर्वनर की हैसियत से घटते -बढ़ते  बैंक दरों को लेकर आम जनमानस ओर उद्योगपतियों के बीच समंजस्य बिठाने का आंकलन करते रहे हैं तो विभिन्न आर्थिक मोर्चों पर उनकी तीक्ष्ण दृष्टि से अर्थव्यवस्था के कील-कांटे ही दुरुस्त हुए हैं. अमेरिका में 'फिशर ब्लैक पुरस्कार से सम्मानित रघुराम राजन कहते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था उस मोड़ की ओर बढ़ रही है, जहां हम अपनी मध्यावधि वृद्धि लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं, क्योंकि हालात ठीक हो रहे हैं, तो निवेश में भी मजबूती आ रही है. राजन के इतने सकारात्मक और सचेत वक्तव्यों से अगर सरकारी 'अहम' को ठेस पहुँचती है तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है. वाशिंगटन में चल रही विश्व बैंक व आईएमएफ की सालाना बैठक में हिस्सा लेने गए रघुराम राजन को बढ़ते भारत की आर्थिक मजबूती के बारे में स्पष्ट कहते हैं कि 'दिल्ली अभी दूर है', मतलब भारत को अब भी वह स्थान हासिल करना है जहां हम संतुष्ट हो सकें! राजन ने चालू खाते व राजकोषीय घाटे की भी बातें कहीं और बताया कि मुद्रास्फीति घटकर पांच प्रतिशत से भी नीचे आयी है,  जो पहले 11 प्रतिशत हुआ करती थी. राजन ने वस्तु व सेवा कर (जीएसटी) के साथ नयी दिवाला संहिता लाने की सरकारी कोशिशों का ज़िक्र भी सकारात्मक ढंग से किये, जिसके लिए इस काबिल अर्थशास्त्री को तारीफ़ के दो 'शब्द' कहने में सरकारी तंत्र को 'तकलीफ' महसूस हो रही दिखती है. 

अरुण जेटली जी और उनकी टीम को इन मामलों में उदार होना चाहिए, क्योंकि दुनिया में 'अर्थ' की गति को समझने वाले कम लोग हैं और मामला तब और गम्भीर हो जाता है, जब बात 'राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था' की हो रही हो! वैसे भी, भारत में शेयर बाज़ार की बढ़त ने करोड़पतियों की संख्या तो बढ़ा दिया है, लेकिन भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था की रीढ़ रही कृषि  में कोई खास बदलाव नहीं आया है. आज भी देश की कुल जनसँख्या का 60 फ़ीसदी कृषि पर आधारित है. बेहद चिंता की बात है कि कृषि महज 2.7 % की विकास-दर पर रुका हुआ है तो भारत के जीडीपी में इसका योगदान 15% तक गिर चुका है. ऐसी स्थिति में अगर हम खुद को 'समृद्ध भारत और समृद्ध अर्थव्यवस्था' कहें तो यह सवा सौ करोड़ देशवासियों के साथ भद्दा मजाक ही होगा. हालाँकि, वर्तमान सरकार कृषि‍ को भी कई योजनाओं द्वारा बढ़ाने की कोशिश कर रही है. सरकार की इसी योजनाओं में से एक है, भारत सरकार की नेशनल एग्रीकल्‍चरल मार्केट योजना, जिसके तहत मुख्य अनाज मंडी में इलेक्ट्रॉनिक धर्मकांटे की व्यवस्था की जाएगी. इसमें किसान और व्यापारी भी  रजिस्टर्ड होंगे. रजिस्टर्ड व्यापारी ही सरकार द्वारा नियुक्त कमीशन एजेंट्स के माध्यम से पूरे देश के फसल का भाव तय करने के लिए बोली लगाएंगे. किसान को जहां अपनी फसल का सबसे ज्यादा भाव मिलेगा, वह उसे वहां बेच सकेगा. इसी  के लिए बीते 14 अप्रैल को नेशनल एग्रीकल्‍चरल मार्केट (NAM) को प्रधानमंत्री द्वारा लांच किया गया. हालाँकि, ऐसी योजनाओं का कार्यान्वयन किस तरह और किस स्तर पर होता है, यह देखने वाली बात होगी. इसके अतिरिक्त सरकार के दुसरे मंत्रालय भी अपनी अपनी गति से बेहतर करने की कोशिश करते दिख रहे हैं, वह चाहे ऊर्जा मंत्री पियूष गोयल हों अथवा ट्रांसपोर्ट और जहाजरानी मंत्रालय देख रहे नितिन गडकरी हों! इस बात में कोई शक नहीं कि अगर सरकार अब तक की भांति, अपनी भ्रष्टाचार-मुक्त छवि के साथ आगे बढ़ती रही, तो ज़मीनी हालात में काफी बदलाव नज़र आ सकते हैं और इसमें रघुराम राजन जैसे काबिल लोगों की क्षमताएं भी जुड़ी होंगी. किन्तु, जब तक देश के आखिरी व्यक्ति को रोटी, रोजगार की सहूलियत नहीं मिलती है, तब तक 'अंधों में काना राजा' की टिपण्णी ही सटीक होगी, इस बात में 'दो राय नहीं'!

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2 comments:

  1. भारतीय अर्थव्यवस्था में को कुछ हद तक ठीक करने में रघुराम राजन का बहुत बड़ा योगदान है जिसे आम जनता के साथ साथ सरकार और सरकार के प्रतिनिधि को भी मानना चाहिए . मोदी सरकार हर क्षेत्र को डिजिटल बनाने में लगी है . कृषि के डिजिटल होने पर किसानों को कितना सहूलियत मिलेगा ये जानने का बिषय है .

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  2. मोदी सरकार के लिए ये किसी उपलब्धि से कम नहीं है की रघुराजन जैसे काबिल व्यक्ति उनके शासन काल में कार्य कर रहे है. जहाँ तक मुझे पता है, योग्य लोगों की क़द्र करना मोदी अच्छे से जानते हैं.

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