भाजपा के 'बुरे दिन' की सुगबुगाहट! BJP Bad Days, Hindi Article, Acche Din Aa Gaye, Amit Shah, PM Modi, Foreign Trip of Modi, Sushma Swaraj



बचपन से ही हम सब सुनते आ रहे हैं कि "जाको प्रभु दारुण दुःख दीन्हाँ, ताको मति पहले हर लीन्हां". यानि, जब ईश्वर आपको 'बुरे दिन' दिखलाना चाहते हैं तो आपकी 'मति' पहले ही हर लेते हैं और भारतीय जनता पार्टी के साथ पिछले कुछ महीनों से यह बात बख़ूबी साबित हो रही है. किसी अनुभवी व्यक्ति ने 2014 के आम चुनावों से पहले मुझे कहा था कि 'भाजपाइयों-संघियों' को शासन करने का ढंग न आया है, न आएगा! अपने इस तर्क के बदले उसने मुझे जनसंघ के ज़माने से, जनता पार्टी और फिर बाजपेयी जी का कार्यकाल गिना दिया और कहा कि जनता उस पर भरोसा तो करती है, लेकिन वह भरोसा जल्द ही टूट जाता है. हालाँकि, नरेंद्र मोदी के उभार के समय जिस तरह पार्टी समेत कार्यकर्त्ता-नेता एकजुट दिख रहे थे, तब तो ऐसा ही लग रहा था कि अब केंद्र में यह पार्टी स्थायित्व से आगे बढ़ेगी. पर है रे भाजपा! दो साल भी नहीं गुजरा कि 'मोदी-लहर' की हवा निकलती दिख रही है (BJP Bad Days, Hindi Article). एक-एक करके कई जगहों से पार्टी घिरने और कमजोर होते दिखने लगी है. इसके पीछे के कारणों की पड़ताल हम आगे करेंगे, पहले कुछ बड़े विवादों की ओर नज़र डालते हैं, जिसका सीधा असर तमाम राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ 2019 में संसदीय चुनावों के समय भी पड़ सकता है. 

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आने वाले दिनों में 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा-चुनाव को भाजपा अपने लिए बेहद महत्वपूर्ण मान कर चल रही है, किन्तु हिन्दू-मुस्लिम का उसका 'पुरातन' दांव छोड़ दिया जाय तो एक भी स्थिति उसके पक्ष में नज़र नहीं आ रही है. वह इस कंडीशन में भी नहीं है कि किसी नेता को मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी घोषित कर सके. केशव प्रसाद मौर्या को प्रदेश भाजपा की कमान देकर, वह दलित-पिछड़ों को लुभाने की राह पर जरूर थी, किन्तु उसी के प्रदेश उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह ने इस दांव की ऐसी हवा निकाली, जिसकी चोट न केवल अमित शाह को लगी होगी, बल्कि नरेंद्र मोदी भी छटपटा गए होंगे. “यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” (Respect Women) का जाप करने वाले भाजपाई छुपने का स्थान ढूंढ रहे होंगे. गौरतलब है कि मऊ जिले में एक सभा को सम्बोधित करते हुए बलिया के भाजपा नेता दयाशंकर सिंह मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगा रहे थे और इसी उन्माद में उन्होंने कहा कि मायावती ऐसा काम कर रही हैं जैसा एक 'वेश्या' भी नहीं करती. यह बेहद घृणित बयान है और सामाजिक स्तर पर इसकी जितनी निंदा की जाए, कम ही होगा, किन्तु नेता और राजनीतिक पार्टियां तो इसे 'वोट' के लिहाज से काउंट कर रही होंगी. 

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हालाँकि, भाजपा ने इस छुटभैये नेता को प्रदेश उपाध्यक्ष से तुरंत हटाया तो 24 घंटे के भीतर पार्टी से भी निलम्बित कर दिया. पर किसी ने फेसबुक पर लिखा कि 'बिहार में मोहन भागवत का आरक्षण पर दिया बयान और यूपी में दयाशंकर के बयान की टाइमिंग एक ही है, तो क्या परिणाम भी एक ही आएगा' (BJP Bad Days, Hindi Article)! हालाँकि, महिलाओं पर अभद्र और अश्लील टिपण्णी पहली बार नहीं हुई है और अभद्रबाजों की लिस्ट में जदयू नेता और राज्यसभा सांसद अनवर अली भी शामिल हैं, जिन्होंने हाल ही में स्मृति ईरानी को लेकर बयान दिया था कि उन्हें तन ढकने वाला (कपड़ा) मंत्रालय दिया गया है. इन्हीं बदज़ुबानों की लिस्ट में जदयू नेता शरद यादव (Sharad Yadav Politician) भी हैं, जिन्होंने दक्षिण भारतीय महिलाओं के शरीर पर अभद्र टिपण्णी की थी, तो सपा मुखिया धरती-पुत्र मुलायम स‌िंह यादव (Mulayam Singh yadav) भी पीछे नहीं हैं. उन्होंने कहा था कि बलात्कार के लिए फांसी की सज़ा अनुचित है, लड़के हैं गलती हो जाती है. और भी कई माननीय हैं, जिन्होंने मर्यादा का सीमोल्लंघन किया है, किन्तु जो नुक़सान इस बयान से भाजपा को हो सकता है, उसकी कल्पना मुश्किल है. यह भी गौर करने वाली बात है कि यह शर्मनाक बयान पूर्वांचल में दिया गया है, जहाँ जातीय-सूचक शब्दों के लिए दलित किसी को जेल भिजवाने में देरी नहीं करते हैं. 


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मायावती ने भी इस मुद्दे की राजनीतिक ताकत को समझा है और लपक कर बसपा कार्यकर्त्ता इस पर बड़ी रैली और प्रदर्शन करने में जुट गए हैं. बहुजन समाज पार्टी इस बात के लिए जी-जान लगा देगी कि दलित-वर्ग का हर व्यक्ति इस बात को चुनाव तक याद रखे कि मायावती का अपमान किसी फॉरवर्ड भाजपाई ने किया है. बसपा के इस चौकन्नेपन से लड़ाई में उसके सबसे आगे रहने की सम्भावना बेहद प्रबल हो गयी है, क्योंकि एंटी-इनकंबेंसी का सीधा लाभ उसे ही मिलेगा, तो दलितों के 100 फीसदी वोट के साथ मुसलमानों और ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा भी बसपा के प्रति झुका हुआ है. वैसे भी, तमाम सर्वे-रिपोर्ट बसपा (UP Election 2017) को ही आगे बता रहे हैं, तो भाजपा तीसरे-चौथे स्थान के लिए जद्दोज़हद करती दिख रही है. जाहिर है, अगर उत्तर प्रदेश से भाजपा अच्छी खबर नहीं जुटा पायी तो 2019 किसके सहारे खड़ी होगी? इससे थोड़ा पीछे जाते हैं तो पंजाब चुनाव से ठीक पहले जिस तरह से नवजोत सिंह सिद्धू जैसा बड़ा चेहरा भाजपा को छोड़ गया है, उससे भी पार्टी के राजनीतिक-प्रबंधन पर सवाल खड़े होते हैं. सवाल वही है कि महराष्ट्र जैसे राज्य में तो शिवसेना जैसे सहयोगी को भाजपा घास नहीं डाल रही है, किन्तु पंजाब में अकालियों का सहयोग 'भाजपा की कीमत' पर ही  क्यों किया जा रहा है? 

चुनावी समय में 'सिद्धू' के भाजपा छोड़ने की जवाबदेही किसकी? 

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यूं भी जब आपका कोई बड़ा नेता असंतुष्ट है तो उसे केंद्र में कोई राज्यमंत्री का पद देने से भला क्या बिगड़ जाता. अरे, सिद्धू अनुप्रिया पटेल से तो बड़े कद के हैं ही, ऊपर से पंजाब में अकालियों की इमेज नशे के व्यापारियों की बन गयी है या बना दी गयी है, उसका राजनीतिक मतलब एक ही है. हालाँकि, अभी सिद्धू के आम आदमी पार्टी में जाने की घोषणा नहीं हुई है, किन्तु विश्लेषक यह बात साफ़ तौर पर कह रहे हैं कि अगर सिद्दू आम आदमी पार्टी से जुड़े तो फिर अरविन्द केजरीवाल की पार्टी का सत्ता में आना पूरी तरह तय हो जायेगा. जाहिर है, भाजपा के राजनीतिक-प्रबंधकों पर यहाँ भी सवाल उठता ही है. इसके अतिरिक्त, कश्मीर में बड़े स्तर पर जो बवाल हो रहा है वह भी भाजपा के गले की हड्डी (BJP Bad Days, Hindi Article) बन गया है. हालाँकि, इसके साथ देशभक्ति का टैग लगा है और इस मुद्दे से भाजपा को कहीं कहीं चुनावी-लाभ जरूर मिल सकता है, किन्तु स्थिति बिगड़ने का आरोप भी उसी के माथे आएगा, इस बात में दो राय नहीं! पाकिस्तान इस मुद्दे पर बेहद आक्रामक दिख रहा है तो तमाम देशों को वह इससे अवगत कराने में जुटा हुआ है. 

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अन्य राजनीतिक मुसीबतों की बात करें तो भाजपा के गढ़ गुजरात में हार्दिक पटेल के आरक्षण-आंदोलन से भाजपा पहले ही बैकफुट पर थी, अब वहां दलितों की पिटाई से जुड़ा आंदोलन मोदी को दुःखी किये हुआ है. आरक्षण पर ही हरियाणा में जाट-आंदोलन के दौरान हुई हिंसा, बलात्कार, आगजनी से भाजपा के न केवल हरियाणा में, बल्कि आस पास से भी बड़ा आधार खिसका है, इस बात से शायद ही कोई इंकार करेगा. जाहिर है, इतने बड़े राज्यों में इन मुद्दों से लोग सीधे तौर पर नाराज होंगे अगर हम भाजपा के दुसरे चुनावी वादों जैसे महंगाई, रोजगार, काला धन जैसे मुद्दों को छोड़ दें (Black Money, Employment, Inflation) तब भी उसे ख़ासा नुक़सान हो सकता है! समझ नहीं आता कि अमित शाह जैसे कुशल-प्रबंधक की चातुर्यता कहाँ गुम हो गयी है? इसके अतिरिक्त, उत्तराखंड और अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन के मुद्दे पर जिस तरह इस पार्टी को मुंह की खानी पड़ी है, वह बेहद शर्मिंदा करने वाला वाकया है. आखिर, आप किसके भरोसे बगावत को सपोर्ट कर रहे थे और ज़रा सा अदालती निर्णय क्या आया, वह लोग ही आपके पीछे से भाग खड़े हुए, जिनको आप सपोर्ट कर रहे थे. ऐसा ही प्रबंधन, अगर राजनीतिक-प्रबंधन कहलाता है तो फिर अमित शाह ही क्यों, किसी 'दयाशंकर' जैसे छुटभैये नेता को भाजपा अध्यक्ष बना देना चाहिए. 

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अर्थव्यवस्था के आंकड़ों पर भी जिस तरह प्रश्नचिन्ह उठे हैं, उसे बढ़ा-चढ़ाकर बताने की बात कही गयी है, वह कोई शुभ संकेत नहीं है. आप का दिमाग घूम जायेगा, अगर आप सोचें कि आखिर जो भाजपा कल तक पूरे देश के लिए 'अच्छे दिनों' की बात कर रही थी, खुद उसके लिए ही 'बुरे दिन' कहाँ से आने लगे? इसका जवाब कोई इतना उलझाऊ भी नहीं है और वह खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली से जुड़ा हुआ है. जी हाँ, हमारे पीएम 'आभाषी सफलताओं' के पीछे ज्यादा पड़े हुए हैं और ऐसे में व्यवहारिक रूप से भाजपा और सरकार चूकती जा रही है. एक उदाहरण दें तो, पिछले दिनों एनएसजी (न्यूक्लियर सप्लॉयर ग्रुप - NSG Membership) की सदस्यता के लिए मोदी सहित पूरी सरकार जुट गयी और फिर भी परिणाम 'फुस्स' ही रहा. मैं ये नहीं कहता कि इसके लिए प्रयत्न न किया जाए, किन्तु सारा अमला इसी के पीछे झोंक देना कहाँ की समझदारी (BJP Bad Days, Hindi Article) है? बाकी का काम कौन करेगा भाई? पीएम के विदेश-दौरों को लेकर पहले खूब आलोचना हुई है और ध्यान से देखने पर लगता है कि वह आलोचना कोई गलत नहीं थी. 

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अभी इधर कश्मीर जल रहा था और पीएम साउथ अफ्रीका में 'ड्रम' बजा रहे थे. 'नीरो' की तर्ज पर उन्हें सोशल मीडिया पर 'नीमो' कहकर खूब आलोचना हुई. अरे मोदी जी, विदेशों से सम्बन्ध विकसित करने के लिए, संतुलित करने के लिए ही तो विदेश-मंत्री होते हैं. सुषमा स्वराज (Sushma Swaraj and her responsibilities) तो विदेश-मंत्री की बजाय, कोई सपोर्ट-ऑपरेटर हो गयी हैं. विदेश में किसी नागरिक कोई कोई परेशानी हुई, किसी को एयरपोर्ट पर तकलीफ हुई, उसे दूर करने में वह अपना समय लगाती हैं. यह उनका बड़प्पन है और विदेश-मंत्री को नागरिकों की सुविधाओं का भी ध्यान रखना ही चाहिए, किन्तु उसका मूल कार्य देशों के बीच की नीतियों को रूप देना भी है, जो भार पूरे का पूरा मोदी जी उठाये बैठे हैं. नतीजा देश में क्या हो रहा है, पार्टी में क्या हो रहा है, सरकार में क्या हो रहा है, इसकी जिम्मेदारी 'राम भरोसे' है. और भी केंद्रीय मंत्री योग्य तो हैं, किन्तु प्रधानमंत्री ने उनको किसी नौकरशाह से ज्यादा अधिकार नहीं दिया हुआ है, इसलिए सारा मामला खराब होता जा रहा है. 

चुनावी समय में 'सिद्धू' के भाजपा छोड़ने की जवाबदेही किसकी?

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अमित शाह के हवाले 'चरण-पादुका' कर दी गयी है और वह अपना प्रबंधकीय-कौशल बख़ूबी दिखा भी रहे हैं! पर कहते हैं न कि 'मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक'. अमित शाह एक क्षेत्रीय नेता से ज्यादे की योग्यता नहीं रखते हैं और उनके भीतर समस्याओं को व्यापक परिदृश्य में देखने की वह समझ नहीं है, जो भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष में होनी चाहिए. हालाँकि, किसी बड़े पत्रकार ने अपने लेख में लिखा था और ममता बनर्जी ने भी हाल ही के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद कहा था कि 'मोदी की यूएसपी राहुल गाँधी हैं' (Modi USP is Rahul Gandhi). यदि इस कथन को थोड़ा व्यापक ढंग से लेते हैं तो अभी मोदी की यूएसपी बची हुई जरूर दिखती है, किन्तु नितीश, अखिलेश, केजरीवाल जैसे नेता कब उन्हें चुनौती देने की हालत में पहुँच जाएँ, कहा नहीं जा सकता. पंजाब और अगली साल 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद यह भी काफी कुछ साफ़ (BJP Bad Days, Hindi Article) हो जायेगा. इसलिए, प्रधानमंत्री और शीर्ष भाजपा नेता नरेंद्र मोदी को यह बात समझ लेनी चाहिए कि अमित शाह उनके व्यक्तिगत विश्वासपात्र हैं और इसीलिए वह भाजपा अध्यक्ष की कुर्सी पर भी हैं, किन्तु इससे वह मोदी नहीं बन जायेंगे. 

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प्रधानमंत्री को केवल 'विदेश-नीति' और 'योगा डे' जैसी आभाषी सफलताओं से ध्यान हटाकर सरकार और पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान लगाना चाहिए. भाजपा को अच्छे दिनों की राह भी नरेंद्र मोदी ने दिखाई है और उसका पोषण करने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है. मोदी ने ध्यान देना बंद किया और भाजपा के बुरे दिन शुरू हो गए! हालाँकि, सिचुएशन अभी नियंत्रण से बाहर नहीं है और प्रधानमंत्री समझदार (Prime Minister of India, Narendra Modi) होने के साथ-साथ मेहनती भी हैं, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि तमाम समस्याओं पर वह समग्र दृष्टिकोण का परिचय देंगे, न कि किसी एक 'विदेश मंत्रालय' भर की जिम्मेदारी निभाकर 2019 में देशवासियों से वोट मांगने जायेंगे!

- मिथिलेश कुमार सिंहनई दिल्ली.



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